कर्नाटक चुनावों में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय की अहम भूमिका क्यों रहती है?

By टीम प्रभासाक्षी | Apr 01, 2023

देश के चुनावी इतिहास में जातियों की गोलबंदी नतीजों को हमेशा से प्रभावित करती रही हैं। चर्चा अक्सर बिहार और उत्तर प्रदेश की होती है लेकिन दक्षिण का राज्य कर्नाटक भी इससे अछूता नहीं है। इस चुनावी राज्य की राजनीति को समझने के लिए यहां की प्रमुख जातियों को समझना जरूरी है, खासकर यहां के प्रभावशाली लिंगायत या वीरशैव-लिंगायत समुदाय के महत्व का विश्लेषण महत्वपूर्ण है। क्योंकि यहां के नतीजे तय करने में इस समुदाय की भूमिका प्रमुख होती है और हर दल उसे लुभाने की कोशिशों में जुटा है।

वोक्कालिगा भी कर्नाटक का एक प्रभावी समुदाय है। एक आकलन के मुताबिक इनकी संख्या कुल आबादी का 15 प्रतिशत है। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) 35 प्रतिशत, अनुसूचित जाति व जनजाति 18 प्रतिशत, मुस्लिम लगभग 12.92 प्रतिशत और ब्राह्मण लगभग तीन प्रतिशत हैं। हालांकि, 2013 और 2018 के बीच की गई एक जाति जनगणना, जिसे अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, के अनुसार लिंगायत और वोक्कालिगा की आबादी क्रमशः नौ और आठ प्रतिशत से बहुत कम है। वर्तमान विधानसभा में सभी दलों के 54 लिंगायत विधायक हैं, जिनमें से 37 सत्तारूढ़ भाजपा के हैं। इसके अलावा, 1952 के बाद से कर्नाटक के 23 मुख्यमंत्रियों में से 10 लिंगायत रहे हैं, इसके बाद छह वोक्कालिगा, पांच पिछड़ा वर्ग से और दो ब्राह्मण।

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आगामी 10 मई को होने वाले मतदान में जीत के लिए लिंगायतों का समर्थन हासिल करना कितना महत्वपूर्ण है, यह इसी से समझा जा सकता है कि सभी राजनीतिक दल इस प्रभावशाली समुदाय को लुभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। साल 1989 तक लिंगायत कांग्रेस के पाले में थे और इस वजह से पार्टी का राज्य में एक मजबूत जनाधार भी था, लेकिन राजीव गांधी द्वारा 1990 में तत्कालील मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को बर्खास्त किए जाने के बाद से यह समुदाय उसके खिलाफ हो गया। पाटिल के नेतृत्व में 1989 के चुनाव में कुल 224 सीटों में से 178 सीटें जीतने वाली कांग्रेस अगले चुनाव में 34 सीटों पर सिमट गई थी।

जनता परिवार के विघटन और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में बी एस येदियुरप्पा के उभरने के साथ, समुदाय का एक बड़ा हिस्सा भगवा पार्टी की ओर स्थानांतरित हो गया, और फिर कर्नाटक इसका दक्षिणी गढ़ बन गया। यह तब और मजबूत हो गया जब पूर्व मुख्यमंत्री और जद (एस) नेता एचडी कुमारस्वामी ने 2007 में येदियुरप्पा को सत्ता हस्तांतरित करने से इनकार कर दिया। इससे भाजपा-जद (एस) गठबंधन के सत्ता साझेदारी समझौते का उल्लंघन हुआ और फिर इसके परिणामस्वरूप सरकार गिर गई। अगले विधानसभा चुनावों में भाजपा को सहानुभूति मिली। नतीजा हुआ कि 2008 के विधानसभा चुनावों के बाद, भाजपा ने येदियुरप्पा के नेतृत्व में 110 सीटें जीतकर अपनी पहली सरकार बनाई। हालांकि पांच साल बाद 2013 के चुनावों में, भाजपा 40 सीटों पर सिमट गई। क्योंकि येदियुरप्पा तब तक भाजपा से अलग हो गए थे और उन्होंने एक नया राजनीतिक दल कर्नाटक जनता पक्ष (केजीपी) का गठन किया था।

हालांकि येदियुरप्पा की केजेपी उस चुनाव में केवल छह सीटें हासिल करने में कामयाब रही, लेकिन उसे लगभग 10 प्रतिशत का वोट हासिल हुए। इस वजह से भाजपा को करारा झटका लगा। बाद में, येदियुरप्पा 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा में फिर से शामिल हो गए। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 104 सीटें जीतने में कामयाब रही और ‘‘लिंगायत स्ट्रॉन्गमैन’’ येदियुरप्पा एक बार फिर मुख्यमंत्री बने।

लिंगायत समुदाय के महत्व से अवगत, भाजपा ने यह सुनिश्चित किया कि उसने एक अन्य लिंगायत बसवराज बोम्मई को येदियुरप्पा का उत्तराधिकारी बनाया। उम्र और पार्टी की व्यवस्था का हवाला देते हुए उन्होंने 2021 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। येदियुरप्पा द्वारा हाल ही में चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा के बाद भी अपने लिंगायत जनाधार को बरकरार रखने के उद्देश्य से भाजपा उन्हें चुनाव प्रचार के केंद्र में बनाए हुए हैं। हालांकि कांग्रेस दावा कर रही है कि भाजपा ने येदियुरप्पा को किनारे लगा दिया है। भाजपा ने लिंगायत समुदाय के एक वर्ग द्वारा आरक्षण की मांग पर उनके कोटे में 2 प्रतिशत की वृद्धि कर समुदाय को साधे रखने की भी कोशिश की है।

जद (एस) की उपस्थिति कुल मिलाकर वोक्कालिगा समुदाय के प्रभुत्व वाले पुराने मैसूर क्षेत्र तक ही सीमित है जबकि पूरे कर्नाटक में मौजूदगी रखने वाली कांग्रेस लिंगायतों के बीच अपने खोए हुए जनाधार को फिर से वापस पाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। हालांकि, तत्कालीन सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को 'धार्मिक अल्पसंख्यक' का दर्जा देने के लिए केंद्र से सिफारिश करने का फैसला किया था, जिसके परिणामस्वरूप 2018 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को चुनावी हार का सामना करना पड़ा था। लिंगायत बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। साथ-साथ उसके अधिकांश नेता जो ‘अलग लिंगायत धर्म’ आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे, उन्हें भी पराजय का मुंह देखना पड़ा।

इससे संदेश यह गया कि कांग्रेस ने लिंगायतों को अल्पसंख्यक समुदाय घोषित करके समाज को विभाजित करने का प्रयास किया और उसकी यह कोशिश येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनने से रोकने की थी। नतीजतन, लिंगायत समुदाय भाजपा के पक्ष में लामबंद हो गया। अखिल भारत वीरशैव महासभा के नेतृत्व वाले एक वर्ग ने अलग धर्म का दर्जा देने की मांग करते हुए कहा था कि वीरशैव और लिंगायत समान हैं, जबकि दूसरा समूह केवल लिंगायतों के लिए ऐसा चाहता है क्योंकि उनका मानना है कि वीरशैव शैव के सात संप्रदायों में से एक है, जो हिंदू धर्म का हिस्सा है। कांग्रेस ने 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले लिंगायत समुदाय के वरिष्ठ विधायक एम बी पाटिल को अपनी चुनाव प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया है, जबकि एक अन्य विधायक ईश्वर खांडरे को राज्य इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। लिंगायत समुदाय को सामाजिक और राजनीतिक रूप से दिशा देने में मठ भी प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। राज्य भर में कई लिंगायत मठ राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हैं ।

एक अन्य कारक समुदाय के भीतर विभिन्न उप-जातियां हैं। बनजिगा (जिससे येदियुरप्पा संबंधित हैं), सदर (बोम्मई की उप-जाति), गनिगा और पंचमसाली लिंगायत राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लिंगायतों में संख्या के लिहाज से उच्च माने जाने वाले पंचमसालियों ने अपने संत बसव जया मृत्युंजय स्वामीजी के नेतृत्व में हाल तक रोजगार और शिक्षा में उच्च आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन किया था, जिसने विधानसभा चुनावों से पहले सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को मुश्किल में डाल दिया था, क्योंकि उन्होंने धमकी दी थी कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं तो उन्हें चुनावी परिणाम भुगतने होंगे। उन्हें साधने के उद्देश्य से सरकार ने हाल ही में राज्य की ओबीसी सूची के तहत लिंगायतों के लिए कोटा दो प्रतिशत बढ़ाने का फैसला किया है।

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