पंजाब ने बड़ी कीमत देकर शांति पाई, सतलुज के जरिये पुराने जख्मों को कुरेदना गलत है

By नीरज कुमार दुबे | Jul 07, 2026

पंजाब के अशांत दौर, राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की बहस के बीच एक बार फिर विवादों के केंद्र में आई फिल्म सतलुज ने देशभर में तीखी बहस छेड़ दी है। अभिनेता दिलजीत दोसांझ अभिनीत यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। लेकिन यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि पंजाब के उस संवेदनशील और खून से सने दौर की कहानी को दोबारा सामने लाने की कोशिश है, जब आतंकवाद, अलगाववाद और सीमापार से प्रायोजित हिंसा ने पूरे राज्य को भय और अस्थिरता में धकेल दिया था। ऐसे समय में केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर इस फिल्म को भारत में ओटीटी मंच से हटाने का फैसला न केवल उचित दिखाई देता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी जिम्मेदार लोकतंत्र का कर्तव्य होता है।

देखा जाये तो इन तथ्यों से किसी को इंकार नहीं हो सकता कि पंजाब ने उस दौर में अत्यंत पीड़ा झेली। हजारों निर्दोष लोग मारे गए, परिवार उजड़ गए और भय का वातावरण पूरे राज्य पर छाया रहा। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, उनके दर्द के प्रति संवेदना व्यक्त करना हर संवेदनशील समाज का दायित्व है। लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उस समय पंजाब किस परिस्थिति से गुजर रहा था, इसे भी ईमानदारी से समझा जाए। सीमापार से आतंकवाद को खुला समर्थन मिल रहा था। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां पंजाब को अस्थिर करने के लिए सक्रिय थीं। अलगाववादी संगठन खुलेआम हथियारबंद हिंसा चला रहे थे। पुलिसकर्मियों, पत्रकारों, नेताओं और आम नागरिकों की हत्याएं रोजमर्रा की खबर बन चुकी थीं।

ऐसे भयावह दौर में पंजाब पुलिस ने जिस कठोर अभियान को चलाया, उसी के कारण राज्य धीरे धीरे सामान्य स्थिति में लौट सका। उस समय के पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल को लेकर आज अलग अलग राय हो सकती है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अगर पंजाब पुलिस और सुरक्षा बल कठोर कार्रवाई नहीं करते, तो शायद पंजाब आज भी आतंकवाद की आग में झुलस रहा होता। जिन्होंने उस दौर को अपनी आंखों से देखा है, वह जानते हैं कि हालात कितने गंभीर थे। केपीएस गिल और उनकी टीम ने आतंकवाद के खिलाफ जो अभियान चलाया, उसी ने पंजाब को अलगाववाद और बंदूक की राजनीति से बाहर निकालने में निर्णायक भूमिका निभाई।

आज कुछ राजनीतिक दल और कथित बुद्धिजीवी पुलिसिया कार्रवाई को केवल एकतरफा तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि उस समय पंजाब में किस दल की सरकार थी। उस समय राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर सत्ता किसके हाथ में थी और निर्णय कहां से लिए जाते थे, यह इतिहास का हिस्सा है। साथ ही जो लोग आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई दे रहे हैं, उन्हें अपने अतीत में भी झांकना चाहिए। खासतौर पर कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि आपातकाल के दौरान देश की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्यों कुचल दी गई थी? अखबारों पर सेंसरशिप क्यों लगाई गई थी? विपक्षी नेताओं को जेलों में क्यों डाला गया था? यदि आज कोई सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर कोई कदम उठाती है, तो उसे तानाशाही कहना इतिहास के साथ अन्याय होगा।

इसी के साथ पंजाब में सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। जिस तरह उसके कुछ नेता सतलुज फिल्म के पक्ष में खुलकर बयान दे रहे हैं, उससे यह आशंका भी पैदा होती है कि कहीं यह प्रयास राज्य सरकार की कथित नाकामियों से जनता का ध्यान हटाने की रणनीति तो नहीं है। कहीं आम आदमी पार्टी यह तो नहीं चाहती कि विधानसभा चुनावों में उसके कामकाज की बजाय इतिहास की घटनाएं ही मुद्दा बन जायें? सभी को यह समझना होगा कि इतिहास से सीख लेना आवश्यक है, लेकिन इतिहास को वर्तमान पर इस तरह हावी कर देना कि भविष्य ही प्रभावित होने लगे, किसी भी राज्य और समाज के लिए उचित नहीं माना जा सकता। पंजाब को आज विकास, रोजगार, नशे के खिलाफ कड़े कदम और कानून व्यवस्था सुधारने जैसे वास्तविक मुद्दों पर आगे बढ़ने की जरूरत है, न कि पुराने घावों को बार बार कुरेदकर राजनीतिक लाभ लेने की।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि पंजाब कोई सामान्य राज्य नहीं, बल्कि देश का सीमावर्ती और अत्यंत संवेदनशील प्रदेश है। यहां के सामाजिक और धार्मिक तानेबाने को बिगाड़ने की कोशिशें पहले भी होती रही हैं और आज भी दुश्मन ताकतें मौके की तलाश में रहती हैं। ऐसे में पुराने घावों को इस प्रकार कुरेदना, जिससे समाज में नई वैमनस्यता पैदा हो, बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि किसी भी संवेदनशील विषय को बिना व्यापक सामाजिक परिणामों पर विचार किए प्रस्तुत कर दिया जाए।

फिल्म के प्रदर्शन को लेकर जिस प्रकार विवाद बढ़ा, उसने यह भी दिखाया कि ओटीटी मंचों के लिए स्पष्ट और कठोर नियमों की आवश्यकता है। फिल्म को केंद्रीय प्रमाणन बोर्ड ने अनेक कट लगाने के सुझाव दिए थे। पहले 21 कट और बाद में 120 से अधिक संशोधनों की बात सामने आई। इसके बावजूद फिल्म निर्माताओं ने नया नाम देकर इसे ओटीटी मंच पर जारी कर दिया। ऐसे में सरकार द्वारा हस्तक्षेप करना स्वाभाविक था। यदि किसी सामग्री से सामाजिक तनाव या अलगाववादी भावनाओं को हवा मिलने की आशंका हो, तो सरकार का कर्तव्य है कि वह समय रहते कदम उठाए।

दिलचस्प बात यह भी रही कि अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने स्वयं पहले ही आशंका जता दी थी कि फिल्म को भारत में हटाया जा सकता है। बाद में उन्होंने लोगों से इसे डाउनलोड कर दूसरों को दिखाने की अपील भी की। यह रवैया कई सवाल खड़े करता है। जब मामला इतना संवेदनशील हो, तब जिम्मेदार कलाकारों को समाज में शांति और संतुलन बनाए रखने का संदेश देना चाहिए, न कि विवाद को और भड़काने वाला व्यवहार करना चाहिए।

यह सही है कि इतिहास के कठिन अध्यायों पर चर्चा होनी चाहिए। पीड़ितों को न्याय और सम्मान मिलना चाहिए। लेकिन किसी भी चर्चा का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि सीख देना होना चाहिए। पंजाब ने बहुत खून बहते देखा है। वहां की नई पीढ़ी शांति, विकास और भाईचारे के साथ आगे बढ़ना चाहती है। ऐसे समय में किसी भी प्रकार की ऐसी प्रस्तुति, जिससे अलगाववादी मानसिकता को बल मिले या सुरक्षा बलों के मनोबल पर आघात पहुंचे, उसे गंभीरता से देखने की आवश्यकता है।

बहरहाल, सरकार का निर्णय इसी व्यापक राष्ट्रीय हित और सुरक्षा के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी ऊपर राष्ट्र की एकता, सामाजिक सद्भाव और सीमावर्ती राज्यों की स्थिरता है। पंजाब ने कठिन संघर्ष के बाद शांति हासिल की है। यह शांति किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं पड़नी चाहिए। देश की जनता भी यही चाहती है कि अतीत की त्रासदियों से सीख लेते हुए आगे बढ़ा जाए, न कि उन्हें राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष का नया हथियार बनाया जाए।

-नीरज कुमार दुबे

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