ईरानी महिलाओं की आर या पार की लड़ाई देख कट्टरपंथियों के पैरों तले जमीन खिसक गयी है

By नीरज कुमार दुबे | Sep 24, 2022

रुढ़िवादी देश ईरान ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जिन महिलाओं को वह अपनी पुरुष प्रधान सत्ता के तहत हर तरह से दबाकर रखता है वही महिलाएं आजादी आजादी के नारे लगाने लगेंगी। ईरान ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जिन मजहबी दुहाइयों को देकर वहां महिलाओं को पूरी तरह पर्दे में कर दिया गया था वह पर्दा वहां सरेआम जलाया जायेगा और सामूहिक रूप से वह पर्दे उतार कर फेंक दिये जायेंगे। हम आपको बता दें कि ईरान में इस समय महिलाओं ने हिजाब के विरोध में जोरदार आंदोलन छेड़ा हुआ है। यह आंदोलन इतना हिंसक हो गया है कि अब तक संघर्ष में 40 लोग मारे जा चुके हैं। महिलाएं जिस तरह अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए इस बार आर या पार की लड़ाई के मूड़ में हैं उसको देखते हुए ईरान सरकार को समझ नहीं आ रहा है कि वह करे तो क्या करे।

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देखा जाये तो शहंशाह-ईरान के राज में ईरान में महिलाओं को हर तरह की स्वतंत्रता थी। ईरान की कुछ पुरानी तस्वीरों पर गौर करें तो पता चलता है कि वहां महिलाओं को पश्चिमी देशों की तरह ही कोई भी वेश-भूषा पहनने की छूट थी। ईरान में बिकनी में या अन्य छोटे कपड़ों में महिलाओं का दिखना आम था। लेकिन समय ने करवट ली और ईरानी महिलाओं को पूरी तरह दबा दिया गया। इतिहास पर नजर डालें तो सामने आता है कि 1979 में ईरान में धर्मगुरु सैयद रुहोल्लाह मुसावी उर्फ अयातुल्लाह खोमैनी के नेतृत्व में धर्म के नाम पर क्रांति हुई थी उसने ईरान को पूरी तरह से बदल दिया। खोमैनी ने सत्ता में आने के बाद ईरान के बहुत-से कानूनों में बदलाव कर दिया और महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की बना दी। इस्लाम में बहुत-सी चीजें अनिवार्य बता कर महिलाओं को पूरी तरह पर्दे में कर दिया गया। उनके संगीत बजाने या सुनने पर पाबंदी लगा दी गयी, सागर तटों पर स्त्री-पुरुष के एक साथ स्नान पर पाबंदी लगा दी गयी, ईरान में महिलाएं भले 65 की उम्र की क्यों ना हों, वह बिना हिजाब के सड़क पर नहीं आ सकतीं, अगर ऐसा किया तो पुलिस उन्हें कड़ा दंड देती है। यही नहीं ईरान में बुर्का नहीं पहनने पर मौत की सजा तक का प्रावधान भी है।

देखा जाये तो ईरान में ऐसा नहीं है कि महिलाओं ने पहली बार आवाज उठाई है। पिछला हिजाब विरोधी आंदोलन मार्च 2019 में हुआ था जिसका नेतृत्व मानवाधिकार कार्यकर्ता नसरीन कर रही थीं। उनके आंदोलन को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए ईरानी अदालत ने उन्हें 33 साल की जेल और 148 कोड़ों की सजा सुनाई थी। इसके अलावा 2015 में ईरानी युवा महिला खातून मसीह अलीनेजाद ने भी हिजाब के विरोध में आवाज उठाई थी। अलीनेजाद ने हिजाब पहनने से इंकार करते हुए कहा था कि उसे हवा में उड़ते अपने खुले बाल बहुत पसंद हैं। उसके इस बयान से ईरान में मानो भूकंप आ गया था। हालात ऐसे हो गये थे कि अलीनेजाद को जान से मारने की धमकियां मिलने लगी थीं और काफी समय तक उसे छिप कर रहना पड़ा था। अलीनेजाद ने हिजाब फ्री कैंपेन भी चलाया था जिसे लाखों ईरानी लड़कियों का समर्थन मिला था। इसके बाद हालात ऐसे बन गये थे कि अलीनेजाद को ईरान ही छोड़ना पड़ गया था।

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बहरहाल, ईरान में इस समय जो विद्रोह चल रहा है उसको पूरी दुनिया से समर्थन मिल रहा है। भारत में भी इस मामले को लेकर तमाम प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं क्योंकि इस सप्ताह कर्नाटक के हिजाब विवाद पर उच्चतम न्यायालय में 10 दिन तक बहस चली। सुनवाई के दौरान मुस्लिम याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने इस बात पर अधिक जोर दिया कि लड़कियों को हिजाब पहनने से रोकने से उनकी शिक्षा खतरे में पड़ जाएगी, क्योंकि वे कक्षाओं में भाग लेना बंद कर सकती हैं। लेकिन इन वकीलों ने शायद ईरानी महिलाओं के हिजाब उतारने और जलाने के वीडियो नहीं देखे। इन याचिकाकर्ताओं को पता होना चाहिए कि नैतिकता के नाम पर जो पर्दे लाद दिये गये थे वह अब ईरान में उतरने लगे हैं, भारत में कट्टरपंथी हिजाब के पक्ष में इसलिए खड़े हो रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि आज यदि हिजाब उतरा तो कल को महिलाएं और भी अधिकार मांग सकती हैं जिससे मौलानाओं और कट्टरपंथियों की सत्ता हिल जायेगी।

-नीरज कुमार दुबे

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