By शुभा दुबे | Aug 31, 2026
भारतीय संस्कृति पर्वों और उत्सवों की संस्कृति है। प्रत्येक त्योहार अपने साथ धार्मिक आस्था, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक परंपराओं का संदेश लेकर आता है। इन्हीं प्रमुख पर्वों में कजरी तीज का विशेष स्थान है। यह पर्व मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ भागों में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत विवाहित महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य तथा अविवाहित कन्याओं के लिए मनोवांछित वर की प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।
कजरी तीज के दिन महिलाएँ प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेती हैं। घरों और मंदिरों में भगवान शिव तथा माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। कई स्थानों पर मिट्टी से प्रतिमाएँ बनाकर उनकी आराधना की जाती है। पूजा में फल, फूल, दूर्वा, बेलपत्र तथा विशेष रूप से सत्तू का भोग लगाया जाता है। रात्रि में कथा-श्रवण और भजन-कीर्तन के साथ व्रत का समापन किया जाता है।
कजरी तीज का सबसे आकर्षक पक्ष कजरी लोकगीत हैं। वर्षा ऋतु की मादकता, विरह, प्रेम और प्रकृति की सुंदरता का मनोहारी चित्रण इन गीतों में मिलता है। गाँवों में महिलाएँ समूह बनाकर झूले झूलती हैं और कजरी गीत गाती हैं। इन गीतों में लोकजीवन की भावनाएँ, पारिवारिक स्नेह और भारतीय संस्कृति की आत्मीयता झलकती है।
कजरी तीज केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाला उत्सव भी है। यह पर्व पति-पत्नी के पारस्परिक विश्वास, प्रेम और समर्पण को सुदृढ़ करता है। साथ ही महिलाओं को एक-दूसरे से मिलने, लोकगीतों और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का अवसर प्रदान करता है। यह पर्व प्रकृति, वर्षा ऋतु और हरियाली के प्रति सम्मान का भी संदेश देता है।
कजरी तीज भारतीय लोकजीवन की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यह पर्व नारी की श्रद्धा, धैर्य, समर्पण और पारिवारिक मूल्यों का उत्सव है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच भी कजरी तीज हमारी परंपराओं, लोककला और सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
शुभा दुबे