महाराष्ट्र और जम्मू कश्मीर के बाद बिहार- राहुल गांधी इंडिया गठबंधन को संभाल क्यों नहीं पा रहे हैं?

By संतोष कुमार पाठक | Oct 16, 2025

2024 के लोकसभा चुनाव में सहयोगी दलों की मदद से कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लड़ने के लिए राहुल गांधी ने उस यूपीए के नाम को भी त्याग दिया जिसके बैनर तले कांग्रेस ने वर्ष 2004 से 2014 तक देश में राज किया था। लोकसभा चुनाव से पहले यूपीए की जगह पर राहुल गांधी ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर एक नया मोर्चा बनाया जिसे इंडिया गठबंधन का नाम दिया गया।

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा मुखिया अखिलेश यादव से लेकर तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री एवं डीएमके सुप्रीमो स्टालिन तक से उनके व्यक्तिगत संबंध मजबूत होते नजर आए। जम्मू कश्मीर में भी विधानसभा चुनाव जीतने में राहुल गांधी और नेशनल कांफ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला की व्यक्तिगत केमिस्ट्री का जबरदस्त योगदान माना जाता है। बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने तो खुलकर राहुल गांधी को इंडिया गठबंधन की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार तक बता दिया। 

लेकिन इन सबके बावजूद अचानक देश की राजनीति तेजी से बदलती हुई नजर आने लगी है। जम्मू कश्मीर में राज्यसभा सीट और विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस आमने-सामने आ गए है। जम्मू कश्मीर से राज्यसभा सांसदों के लिए होने वाले चुनाव में उमर अब्दुल्ला की पार्टी ने तीनों सेफ सीट पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं और कांग्रेस को जो चौथी सीट ऑफर की है, उसे जीतना बहुत मुश्किल है। कांग्रेस पहले से ही इसे लेकर अपने सहयोगी दल से नाराज चल रही है वहीं अब विधानसभा की जिन 2 सीटों पर उपचुनाव होना है, उसे लेकर भी मामला फंसता हुआ ही नजर आ रहा है। राज्य में विधानसभा की 2 सीटों- बडगाम और नगरोटा में 11 नवंबर को चुनाव होना है। जम्मू कश्मीर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष तारिक हामिद कर्रा ने उमर अब्दुल्ला की पार्टी पर गठबंधन के सिद्धांतों का अनादर करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि वह राज्यसभा की एक सेफ सीट देने के अपने वादे से मुकर गई। कांग्रेस ने गठबंधन धर्म की याद दिलाते हुए सख्त शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि या तो नेशनल कांफ्रेंस उन्हें विधानसभा की एक सीट दे या फिर कांग्रेस दोनों ही सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार देगी।

महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव के समय से ही शुरू हुई खटास कम होने का नाम नहीं ले रही है। जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद मोदी सरकार द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर और दुनिया भर में भेजे गए सांसदों के प्रतिनिधिमंडल को लेकर एनसीपी और कांग्रेस के सुर अलग-अलग तो नजर आए ही। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के जेल जाने के बाद इस्तीफे की बाध्यता वाले बिल पर गठित की जाने वाली जेपीसी में शामिल नहीं होने को लेकर भी कांग्रेस इंडिया गठबंधन में शामिल सहयोगी दलों को अपने साथ ला पाने में नाकामयाब होती नजर आ रही है।

वहीं बिहार का मामला तो राहुल गांधी के नेतृत्व की स्वीकार्यता को लेकर सबसे बड़ा झटका साबित होता हुआ नजर आ रहा है। एक तरफ आरजेडी है जिसके नेता तेजस्वी यादव ने खुल कर राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का समर्थन कर दिया है तो वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी है जो लगातार पूछे जाने के बावजूद भी तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं कर रहे हैं। जबकि राजनीतिक सच्चाई तो यही है कि बिहार में विपक्षी गठबंधन में आरजेडी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। कांग्रेस और आरजेडी में सीटों के बंटवारे को लेकर भी घमासान मचा हुआ है। सहयोगी दलों के साथ कांग्रेस की यह खींचतान और महत्वपूर्ण मौकों पर राहुल गांधी की गैरमौजूदगी उनके नेतृत्व पर ही सवालिया निशान लगाती नजर आती है। पता नहीं राहुल गांधी इस तथ्य को समझ पा रहे हैं या नहीं और इससे भी बड़ा सवाल यह कि आखिर राहुल गांधी को इस तरह की सलाह कौन देता है कि उन्हें दिल्ली में होने के बावजूद तेजस्वी यादव से मुलाकात नहीं करनी चाहिए। केसी वेणुगोपाल और तेजस्वी यादव की जगह पर अगर राहुल सीधे तेजस्वी के साथ बैठकर बात करते तो शायद मामला इतना उलझता नहीं।

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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