By नीरज कुमार दुबे | Jun 27, 2025
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों की समीक्षा करने का आह्वान किया तो कांग्रेस आग बबूला हो गयी। कांग्रेस शायद भूल गयी है कि आपातकाल के दौरान जब सारा विपक्ष जेल में ठूँस दिया गया था तब इंदिरा गांधी की तत्कालीन सरकार ने संविधान की प्रस्तावना में जबरन दो शब्द जोड़ दिये थे। कांग्रेस को समझना चाहिए कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्द जब बाबा साहेब आंबेडकर के लिखे गये संविधान की प्रस्तावना में थे ही नहीं तो उस पर सवाल उठेंगे ही। ऐसा भी नहीं है कि आरएसएस ने ही पहली बार इन दोनों शब्दों पर सवाल उठाया हो। समाज के कई वर्गों की ओर से इन दोनों शब्दों को संविधान की प्रस्तावना में शामिल करने को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी थी।
आरएसएस पर सवाल उठा रही कांग्रेस को यह भी पता होना चाहिए कि साल 2023 में नये संसद भवन में कामकाज के पहले दिन सांसदों को दी गई संविधान की प्रति में प्रस्तावना में ‘‘समाजवादी’’ और ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ शब्द नहीं थे। उस समय केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि यह मुद्रित प्रति ही मूल प्रस्तावना थी। कांग्रेस को समझना होगा कि संविधान में सामान्य संशोधनों और प्रस्तावना में किये गये संशोधन में बड़ा फर्क है। कांग्रेस ने आपातकाल के दौरान अलोकतांत्रिक रूप से जो कार्य किया था अब उसे ठीक करने का आह्वान किया जा रहा है तो इसमें गलत क्या है? संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द रहें या नहीं रहें, यदि इस पर संसद के दोनों सदनों में चर्चा के बाद फैसला करने की मांग की जा रही है तो इसमें गलत क्या है? यह वाकई हास्यास्पद है कि कांग्रेस आरएसएस के आह्वान को बाबा साहब के संविधान को नष्ट करने की साजिश बता रही है जबकि इसी पार्टी की सरकार ने बाबा साहेब के संविधान की प्रस्तावना से छेड़छाड़ की थी। बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि डॉ. बीआर अंबेडकर के नेतृत्व में संविधान सभा ने विश्व का उत्तम संविधान भारत को दिया जिससे हमारे लोकतंत्र की नींव मजबूत हुई।
-नीरज कुमार दुबे