कांग्रेस के लिए कितना फायदेमंद रहेगा ''मुंबई से आया हुआ दोस्त''

By नीरज कुमार दुबे | Jul 10, 2019

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे पिछले काफी समय से पार्टी में अकेलेपन से जूझ रहे हैं। ऐसे में वह एक अदद सहयोगी की तलाश में हैं। पिछले दिनों वह दिल्ली आये, खास बात यह रही कि वह 14 साल बाद दिल्ली आये। उत्तर भारतीयों को मुंबई से मार कर भगाने को आतुर रहने वाली पार्टी के प्रमुख राज ठाकरे ने दिल्ली में संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की तो अटकलें तेज हो गयीं कि वह महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन चाहते हैं। ऐसा होता है तो कोई आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि राज ठाकरे की विभाजनकारी राजनीति कांग्रेस की ही देन है। और राज ठाकरे भले अब तक सीधे तौर पर कांग्रेस के साथ नहीं थे लेकिन एक तरह से उसके पैरोल पर ही काम कर रहे थे। लेकिन अभी देखना होगा कि लोकसभा चुनावों के लिए एमएनएस से गठजोड़ नहीं करने वाली कांग्रेस क्या विधानसभा चुनावों के लिए गठजोड़ करती है। उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र खासकर मुंबई में उत्तर भारतीयों की बड़ी संख्या को देखते हुए कांग्रेस के अधिकतर नेता एमएनएस से सीधे तौर पर कोई गठजोड़ करने के खिलाफ हैं हालांकि यही नेता एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे को भाजपा और शिवसेना के खिलाफ मोर्चा संभाले रखने के लिए फंडिंग भी करते हैं।

राज ठाकरे की राजनीति का स्टाइल

राज ठाकरे ने सन् 2006 में शिवसेना छोड़कर अपनी अलग पार्टी बड़े दमखम के साथ बनाई थी लेकिन जनता ने उनका सारा गुरूर चुनावों में निकाल दिया। राज ठाकरे को शुरू में सफलता मिलती लग रही थी जब 2009 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के 13 उम्मीदवार विधानसभा पहुँचने में कामयाब रहे साथ ही पार्टी ने कुछ नगरपालिकाओं के चुनावों में भी जोरदार प्रदर्शन किया। लेकिन राज ठाकरे की राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। वह पार्टी को अपनी जागीर के तौर पर चलाते हैं। राज ठाकरे विवादित बयान देने के लिए जाने जाते हैं तो उनकी पार्टी के कार्यकर्ता कहां पीछे रहने वाले हैं। वह भी समय-समय पर विभिन्न आरोपों से घिरे रहते हैं। राज ठाकरे की पार्टी ने महाराष्ट्र के नवनिर्माण की बजाय तोड़फोड़ की राजनीति ही ज्यादा की है। कभी एमएनएस कार्यकर्ता उत्तर भारतीयों को पीटते हैं तो कभी मुंबई में रह रहे गुजरातियों पर हमला करने के लिए 'मोदी मुक्त भारत' अभियान चलाते हैं। कभी एमएनएस कार्यकर्ता किसी फिल्म के विरोध में तोड़फोड़ करते हैं तो कभी मॉरल पुलिसिंग के नाम पर युवाओं को पीटते हैं। इसीलिए जनता ने इस पार्टी को सिरे से खारिज कर दिया और पिछले विधानसभा चुनाव जोकि 2014 में हुए थे, उसमें बड़ी-बड़ी रैलियां और जनसभाएँ करने के बावजूद राज ठाकरे की पार्टी मात्र एक सीट पर विजयी रही और यह एकमात्र विधायक भी बाद में राज ठाकरे का साथ छोड़ गया।

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कागजी शेर हैं राज ठाकरे

राज ठाकरे की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह हालिया लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतार सकें। अपनी पार्टी के पास कुछ नहीं बचा लेकिन राजनीति तो करनी है तो मोदी विरोध की राजनीति ही की जाये। यही सोचकर राज ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के लिए लोकसभा चुनावों में जमकर प्रचार किया। लेकिन हश्र क्या रहा ? महाराष्ट्र में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चव्हाण हों या मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा, जब यह दोनों ही अपनी सीट नहीं बचा पाये तो बाकी से तो उम्मीद भी क्या थी। एनसीपी की भी करारी हार हुई और शरद पवार को जनता की ताकत एक बार फिर समझ आ गयी।

कभी गांधी परिवार के विरोधी रहे राज ठाकरे अब शरण माँग रहे

राज ठाकरे सोनिया गांधी से मिले और चुनावी सहयोग की बात की। यहां जरा दो बातों पर गौर कीजिये। पहली तो यह कि इससे पहले भी राज ठाकरे ने कई बार सोनिया गांधी से मुलाकात करने की कोशिश की थी लेकिन उन्हें टाइम नहीं दिया गया था। कारण यही था कि राज ठाकरे ने शिवसेना में रहते हुए कथित रूप से सोनिया गांधी के विदेशी मूल के खिलाफ कई बार बयान दिये थे, राहुल गांधी का मजाक उड़ाया था और गांधी परिवार के खिलाफ अनेकों बार 'कड़वे शब्द' इस्तेमाल किये थे। इसके अलावा कांग्रेस सार्वजनिक रूप से राज ठाकरे के साथ कभी खड़ी नहीं दिखना चाहती थी क्योंकि उसे भय था कि उत्तर भारतीय लोग पार्टी से नाराज हो सकते हैं। लेकिन अब जब राज ठाकरे और सोनिया गांधी की मुलाकात हो ही गयी है तो कई तरह की अटकलें लगायी जा रही हैं। माना जा रहा है कि राज ठाकरे ने बताया होगा कि कैसे उन्होंने लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए जमकर मेहनत की थी। राज ठाकरे ने सोनिया गांधी को बताया कि यदि मतपत्र से चुनाव हो जायें तो भाजपा-शिवसेना को मात दी जा सकती है। राज ठाकरे की बात को सोनिया ने तो सुन लिया लेकिन ठाकरे को इस बात की नाराजगी है कि चुनाव आयोग ने उनकी बात ढंग से नहीं सुनी। राज ठाकरे का कहना है कि वह ईवीएम के खिलाफ शिकायत देकर अपना फर्ज निभा आये हैं लेकिन उन्हें चुनाव आयोग से कोई उम्मीद नहीं है।

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बहरहाल, राज ठाकरे हर चुनावों से पहले अपना वजूद बनाये रखने और बचाये रखने के लिए तरह-तरह के प्रयास करते ही हैं। सोनिया गांधी से उनकी मुलाकात को भी ऐसे ही एक प्रयास के रूप में लिया जाना चाहिए। राज ठाकरे के पास ना तो महाराष्ट्र में कुछ हासिल करने की ताकत बची है ना ही उनके पास कुछ खोने के लिए है। कांग्रेस की हालत भी राज्य में एकदम खराब है ऐसे में पार्टी शायद हर वो कदम उठा कर देख लेना चाहती है जिसमें पार्टी की संभावना सुधारने की जरा-सी भी ताकत दिखती हो। देखना होगा कि कांग्रेस के लिए मुंबई से आया यह दोस्त कितना फायदेमंद रहता है?

-नीरज कुमार दुबे

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