हिंदी का राष्ट्रभाषा का दर्जा कुछ लोगों को आखिर पचता क्यों नहीं है?

By नीरज कुमार दुबे | Apr 28, 2022

क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है? यह सवाल आजकल काफी उठ रहा है। इसे उठा भी वही लोग रहे हैं जो जब-तब हिंदी विरोध की राजनीति करते हैं। वैसे तो अक्सर हिंदी के खिलाफ बयानबाजी की शुरुआत राजनीतिक क्षेत्र से होती है लेकिन इस बार विवाद सिनेमा जगत से शुरू हुआ जिसमें नेता भी कूद पड़े हैं। दरअसल बॉलीवुड अभिनेता अजय देवगन और कन्नड़ भाषी फिल्मों के कलाकार किच्चा सुदीप के बीच ट्विटर पर हिंदी को लेकर हुई दोस्ताना बहस ने तब राजनीतिक रंग ले लिया जब इसमें कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और एच.डी. कुमारस्वामी भी शामिल हो गए और दोनों नेताओं ने कहा कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है और वह देश की किसी भी अन्य भाषा की तरह ही है। आइये पहले आपको बताते हैं इस विवाद की शुरुआत कैसे हुई और फिर बताएंगे कौन इस पर क्या कह रहा है।

लेकिन इस पर अभिनेता अजय देवगन ने कहा, ‘‘किच्चा सुदीप, मेरे भाई, आपके अनुसार हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है, तब आप अपनी मातृ भाषा में बनी फिल्म को हिंदी में डब करके क्यों रिलीज कर रहे हैं। हिंदी थी, है और हमेशा हमारी मातृ भाषा और राष्ट्रभाषा रहेगी, जन गण मन।’’ इस पर सुदीप ने जवाब दिया, ‘‘अजय देवगन सर, जिस संदर्भ में मैंने उक्त बयान दिया, मुझे लगता है कि वह पूरी तरह उससे अलग है, जिस रूप में यह आप तक पहुंचा। यह बयान किसी को ठेस पहुंचाने, उकसाने या कोई बहस शुरू करने के लिये नहीं दिया गया था।’’

सुदीप ने आगे कहा कि वह देश की हर भाषा का सम्मान करते हैं और उम्मीद करते हैं कि जल्द ही उनसे (अजय देवगन से) मिलेंगे। इसके जवाब में देवगन ने ट्वीट किया, ‘‘किच्चा सुदीप, आप मित्र हैं, गलतफहमी दूर करने के लिए धन्यवाद। मैं हमेशा से फिल्म उद्योग को एक समझता रहा हूं। हम हर भाषा का सम्मान करते हैं और उम्मीद करते हैं कि हर व्यक्ति हमारी भाषा का भी सम्मान करे। शायद अनुवाद में कुछ गुम हो गया था।''

तो इस तरह आपने देखा कि दो अभिनेताओं के बीच एक विषय पर हंसी मजाक में बहस हुई लेकिन राजनीति करने वाले कहां चूकते हैं। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सिद्दारमैया ने कहा, ''हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा ना कभी थी और न कभी होगी।'' उन्होंने कहा कि हमारे देश की भाषाई विविधता का सम्मान करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है। प्रत्येक भाषा का अपना समृद्ध इतिहास है, और उस भाषा के लोगों को उस पर गर्व है। मुझे कन्नड़भाषी होने पर गर्व है।’’ सिद्धारमैया की तरह ही जनता दल (सेक्युलर) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने अपने विचार रखते हुए सुदीप का समर्थन भी किया।

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कुमारस्वामी ने कहा कि अभिनेता सुदीप का कहना सही है कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है। उनके बयान में कुछ भी गलत नहीं है। उन्होंने कहा कि अभिनेता अजय देवगन आक्रामक स्वभाव के हैं और उन्होंने अपने इस अजीब व्यवहार को प्रदर्शित किया है। कुमारस्वामी के अनुसार, हिंदी भी कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम और मराठी जैसी भाषाओं की तरह एक भाषा है। कुमारस्वामी ने सिलसिलेवार ट्वीट में कहा, ''भारत में कई भाषाएं बोली जाती हैं। देश विभिन्न संस्कृतियों से समृद्ध है। इसमें खलल उत्पन्न करने की कोशिश ना करें।’’ कुमारस्वामी ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि एक बड़ी आबादी हिंदी बोलती है, इसे राष्ट्रभाषा नहीं कहा जा सकता। कश्मीर से कन्याकुमारी तक नौ राज्यों से कम में हिंदी दूसरे या तीसरे नंबर की भाषा है या ऐसे भी राज्य हैं, जहां उसे यह मुकाम भी हासिल नहीं हैं। कुमारस्वामी ने कहा, ''अगर स्थिति यह है तो अजय देवगन के बयान में क्या सच्चाई है? फिल्म को ‘डब’ नहीं करने से अजय देवगन का क्या मतलब है?’’ कुमारस्वामी के अनुसार, केंद्र में ‘हिंदी’ भाषी राजनीतिक दल शुरू से ही क्षेत्रीय भाषाओं को खत्म करने का प्रयास करते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने क्षेत्रीय भाषाओं को ‘‘दबाना’’ शुरू किया था और अब भारतीय जनता पार्टी भी ऐसा ही कर रही है।

अब दक्षिण के नेता तो इस विषय पर राजनीति कर ही रहे थे। जम्मू-कश्मीर से उमर अब्दुल्ला भी इस विवाद में कूद पड़े हैं। उन्होंने कहा है कि भारत एक राष्ट्रभाषा के लिए बहुत विविध देश है। उन्होंने कहा कि भारत का विचार यह है कि यह सभी को स्थान देता है। उमर ने कहा कि अगर भारतीय करेंसी नोट सभी भाषाओं को जगह देता है, तो यह समझा जाता है कि हम सिर्फ एक भाषा, संस्कृति और धर्म से बढ़कर हैं।

बहरहाल, हिंदी विरोधी लोगों को यह समझना चाहिए कि राष्ट्रभाषा को किसी पर थोपा नहीं जाता। भारत में कई भाषाएं हैं, लेकिन उन सभी में एक ही भाव है, जो देश की एकता का स्रोत है। माना जाता है कि भारत में बोलियां सहित करीब 3,800 भाषाएं हैं लेकिन भाषाएं अलग-अलग होने पर भी भाव एक ही है। यही भारत की एकता है।

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