प्रियंका के हाथ जाने वाली थी कमान, ऐन मौके पर सोनिया ने संभाला अध्यक्ष पद

By अजय कुमार | Aug 14, 2019

सोनिया गांधी के बाद राहुल और राहुल के बाद फिर सोनिया गांधी। सोनिया ने जब अध्यक्ष पद छोड़ा तो यही समझा जा रहा था कि स्वास्थ्य कारणों से सोनिया अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी से मुक्त हो रही हैं। कांग्रेस ने कभी इस बात का खंडन भी नहीं किया। सोनिया गांधी भी अपने अध्यक्षी के आखिरी समय में निष्क्रिय हो गई थीं। न वह किसी मीटिंग या जनसभा में दिखाई देती थीं, न ही उनकी सदन में उपस्थिति पहले की तरह रह गई थी। सारी जिम्मेदारी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने संभाल ली थी। यहां तक कि सोनिया गांधी अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली भी नहीं के बराबर आती जाती थीं। उनके लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने तक की अटकलें लगाई जा रहीं थीं।

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कांग्रेस को सब कुछ हरा−हरा दिख रहा था, लेकिन नजीते चौंकाने वाले रहे। कांग्रेस का एक बार फिर सूपड़ा साफ हो गया। प्रियंका वाड्रा, जिन्हें कांग्रेस अपना ट्रम्प कार्ड समझती थी, वह भी कोई चमत्कार नहीं कर पाईं। राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की गई वह नहीं माने। राहुल ने अध्यक्ष पद छोड़ा, इस पर इतना हंगामा नहीं होता, मगर उन्होंने यह भी कह दिया कि अगला अध्यक्ष गांधी परिवार से नहीं होगा। सोनिया गांधी अध्यक्ष बनने की अवस्था में नहीं थीं, इसलिए राहुल के गैर गांधी अध्यक्ष वाले बयान का यही अर्थ निकाला गया कि गांधी परिवार नहीं चाहता है कि पार्टी की चाबी प्रियंका के मार्फत वाड्रा परिवार तक पहुँच जाए।

दरअसल, राजीव गांधी की हत्या के बाद ऐसे कई मौके आए थे, जब गांधी परिवार सरकार या पार्टी की चाबी अपने पास नहीं रख पाया था तो उसने गांधी परिवार के प्रति वफादार और उनके इशारे पर चलने वाले नेताओं को अपनी जगह सत्ता या पार्टी की चाबी सौंपना उचित समझा था। इसीलिए तो कांग्रेस के कोषाध्यक्ष सीता राम केसरी पार्टी के अध्यक्ष बन गए तो नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हुए, जबकि पार्टी में प्रणब मुखर्जी सहित तमाम नेता केसरी, नरसिम्हा और मनमोहन सिंह से काफी योग्य समझे जाते थे।

  

बहरहाल, बात गांधी परिवार और वाड्रा परिवार की करें तो राहुल गांधी के यह स्पष्ट करने के बाद भी कि कोई गैर गांधी ही अध्यक्ष बनेगा, प्रियंका का कांग्रेस अध्यक्ष बनने का सपना चूर−चूर हो गया था, लेकिन प्रियंका ने हार नहीं मानी वह तमाम मंचों पर दबी जुबान से अध्यक्ष बनने क इच्छा जाहिर करती रहीं। उधर, कांग्रेसी भी जोरदार तरीके से प्रियंका को अध्यक्ष बनाए जाने की वकालत कर रहे थे। क्योंकि ज्यादातर कांग्रेसियों को यही लगता है कि पार्टी बिना गांधी परिवार के चल ही नहीं सकती है। प्रियंका की दावेदारी मजबूत होती देख सोनिया गांधी सक्रिय हो गईं। वह जानती थीं कि अगर प्रियंका को अध्यक्ष बना दिया गया तो कांग्रेस की बागडोर दस जनपथ से निकल जाएगी। इसीलिए सोनिया गांधी एक बार फिर आगे आईं और करीब ढाई महीने तक चले ड्रामे का क्लाईमेक्स खत्म करते हुए स्वयं अंतरिम अध्यक्ष बन गईं। सोनिया के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस को कई फायदे हो सकते हैं, बशर्ते सोनिया का स्वास्थ्य साथ दे।

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बहरहाल, सोनिया गांधी का एक बार फिर कांग्रेस की कमान संभालना इस पार्टी की गांधी परिवार पर निर्भरता को तो दर्शाता ही है, यह भी बताता है कि उसके लिए इस परिवार के बाहर किसी अन्य के नेतृत्व को स्वीकार करना कितना मुश्किल है। इसमें संदेह है कि अंतरिम अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी के चयन से कांग्रेस का संकट काफी हद तकं दूर हो गया है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि अब कांग्रेस के सामने मोदी और शाह जैसी विराट चुनौती है, जो राजनीति का चाल−चरित्र और चेहरा सब कुछ बदलने में लगे हैं। मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के शुरूआती महीनों में ही तीन तलाक खत्म करने के साथ कश्मीर से धारा 370 और 35ए को एक झटके में खत्म कर दिया और कहीं कोई हिंसा की खबर भी नहीं आई।

खैर, इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि राहुल गांधी द्वारा अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद जिस तरह पार्टी लगभग ढाई माह तक अनिश्चितता में फंसी रही और फिर सोनिया गांधी पर ही उसकी आस टिकी उससे उसकी कमजोरी और अधिक स्पष्ट रूप में सामने आई है। कांग्रेस यह कह सकती है कि सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष ही बनाया गया है, लेकिन इससे कहीं न कहीं यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि गांधी परिवार के बगैर पार्टी का गुजारा नहीं है। इस फैसले के जरिये कांग्रेस का आगे बढ़ पाना मुश्किल ही है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस घूम−फिर कर वहीं पहुंच गई है जहां से चली थी। कांग्रेस की इससे फजीहत ही हुई। बेहतर होता अगर राहुल गांधी गैर गांधी परिवार के अध्यक्ष बनने का झुनझुना बजाने से पहले यह तय कर लेते कि कांग्रेस में गांधी परिवार के नेतृत्व के बिना आगे बढ़ने का सामर्थ्य है या नहीं ?

   

राजनीति के जानकारों को अच्छी तरह से पता है कि कांग्रेस का गांधी परिवार से अलग होना आसान नहीं है और जब−जब ऐसा हुआ है तो कांग्रेस मजबूत होने की बजाय कमजोर ही हुई है। उसके अस्तित्व पर संकट आ गया। कांग्रेस की बुनियाद ही जब गांधी परिवार बन गया हो तो कोई कुछ नहीं कर सकता है।

कांग्रेस के रणनीतिकार भी कम जिम्मेदार नहीं हैं, जिनका गांधी परिवार के बिना हाथ−पाँव फूलने लगता है। जब राहुल गांधी ने कह दिया था कि गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को नेतृत्व सौंपा जाना चाहिए तब यह आवश्यक हो जाता था कि पार्टी के रणनीतिकार और बड़े नेता उसी दिशा में आगे बढ़ें। यह अजीब है कि कांग्रेस, गांधी परिवार के रूप में जिसे अपनी ताकत समझती है वही उसकी कमजोरी भी है। इसी ताकत और कमजोरी के कारण कांग्रेस गांधी परिवार को लेकर अपनी दुविधा से उबर नहीं पाती। कांग्रेस की इस दुविधा का नुकसान देश को भी उठाना पड़ रहा है। इसी दुविधा की वजह से हाल में कांग्रेस धारा 370 और 35ए के मुददे पर दोफाड़ दिखी। राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने के साथ ही पार्टी के नेताओं को यह मौका दिया था कि वे नए नेतृत्व की तलाश करें, लेकिन वे इसके लिए आवश्यक साहस नहीं जुटा सके और उन्होंने सोनिया गांधी को फिर आगे कर दिया। किसी भी पार्टी का अध्यक्ष होना एक बात है और उसकी जिम्मेदारी संभालना दूसरी बात। कांग्रेस को इस समय अपनी प्रतिद्वंद्वी बीजेपी से निपटने के लिए कड़ी मेहनत करने की जरूरत है। उम्र के इस पड़ाव पर सोनिया गांधी से ऐसी मेहनत की उम्मीद करना बेमानी होगी।

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गौरतलब है कि बीजेपी ने तो सोनिया से काफी छोटी उम्र के नेताओं तक को सक्रिय राजनीति से किनारे कर दिया है। इसके पीछे की वजह यही थी कि बढ़ती उम्र के कारण अक्सर जनप्रतिनिधि अपने संसदीय क्षेत्र और राजनीति से ईमानदारी नहीं कर पाते हैं। सोनिया गांधी को सबसे पहले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को खड़ा करना होगा, जहां पार्टी एक सीट पर सिमट गई है तो दूसरी तरफ बीजेपी मोदी−शाह की अगुवाई में यूपी में बढ़ती ही जा रही है।

-अजय कुमार

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