By अभिनय आकाश | Sep 24, 2026
जर्मनी की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जिस देश ने हिटलर के नाजी शासन का दौर देखा, जिस देश में 1945 के बाद यह कोशिश रही कि ऐसी हार्ड लाइन राइट विंग पॉलिटिक्स दोबारा मजबूत ना होने पाए। आज उसी जर्मनी में एएफडी यानी कि अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी नाम की एक फार राइट पार्टी लगातार बड़ी हो रही है। सितंबर में पहले एक राज्य में चुनाव हुआ। फिर अब मैक्लिनबर्ग और वेस्टर्न पोमेरनिया में चुनाव हुआ और वहां एएफडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर जो है वह सामने आई। सनोग्जी में जो चुनाव हुआ था वहां 44% वोट जो है वो एएफडी को मिला लेकिन बहुमत से वो दूर रह गई। वहीं एएफडी जो है अब जर्मनी में राजनीति में ऐसी जगह पहुंच गई है जहां उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। लेकिन यहां दिलचस्प बात ये है कि इतने वोट मिल रहे हैं उसके बावजूद भी ये एएफडी सरकार नहीं बना पा रही है।
जर्मनी की जो मुख्यधारा की पार्टियां हैं उसने एएफडी के साथ गठबंधन या राजनीतिक सहयोग नहीं करने की नीति बनाई हुई है। यानी कि चुनाव में एएफडी कितनी भी सीटें जीत ले अगर उसके पास अकेले बहुमती है यानी कि 51% नहीं है तो सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों के साथ उसको जाना होगा। लेकिन यहां यही खेल हो जाता है कि दूसरी पार्टियां एएफडी के साथ जाने से इंकार कर देती हैं। इसी राजनीतिक दीवार को फायर वॉल कहा जाता है। जैसे किसी इमारत में आग लगने को एक हिस्से से दूसरे हिस्से में फैलने से रोकने के लिए दीवार बनाई जाती है। वैसे ही जर्मनी में यहां राजनीतिक फायर वॉल एएफडी को चुना की चुनावी ताकत को सीधे सत्ता की साझेदारी तक पहुंचने से रोकने के लिए काम करती है। इसके पीछे जो जर्मनी का नाजी अतीत है वो भी एक बड़ी वजह है। द्वितीय विश्व युद्ध और अडॉल्फ हिटलर के नाजी शासन के भयावह इतिहास के बाद जर्मनी में यह स्पष्ट राजनीतिक सहमति रही है कि देश में फिर कभी अति राष्ट्रवाद या फांसीवाद का फिर सिर ना उठाने दिया जाए क्योंकि एएफडी की विचारधारा नीतियां अत्याधिक राष्ट्रवादी है। अप्रवासी विरोधी है। कई बार नस्लवादी उसे माना तक जाता है। इसलिए मुख्यधारा के दल इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा मानते हैं। यानी कि वह चुनाव में देखिए हिस्सा ले रहा है। लेकिन उसके साथ नहीं जाना चाहते। एएफडी को नाजी पार्टी कहना सही नहीं होगा लेकिन दोनों अलग संगठन है और अलग दौर की पार्टियां हैं। लेकिन एएफडी की जो दक्षिणपंथी राजनीति है और उसके कुछ नेताओं के जो बयान है उसको लेकर जर्मनी में लंबे समय से विवाद रहा है। इसलिए मुख्यधारा की पार्टियां उससे दूरी बनाए रखती हैं।