तेल-स्मार्टफोन, ज्वेलरी, दवाईयां... Trump के 100% 'टैरिफ बम' से हिल जाएगा भारत का व्यापार सिस्टम? क्या-क्या हो सकता है महंगा

By अभिनय आकाश | Sep 17, 2026

भारत ने ब्रिक्स समिट करवाया। रूस के राष्ट्रपति पुतिन आए। चीन के राष्ट्रपति शी जिंनपिंग आए। तमाम दुनिया भर के जो सदस्य देश थे, जो इनवाइटेड कंट्रीज थे, पार्टनर कंट्रीज थे, वो पहुंचे। बहुत चर्चा हुई। ईरान पहुंचा। ईरान, यूएई की मीटिंग हो गई। दुनिया भर में इस बात पर बात हो रही है। अब अमेरिका जो है वैसे तो चीख चिल्ला नहीं रहा है ब्रिक्स पर लेकिन वो तिलमिला चुके हैं। क्यों खुन्नस खा चुका है यह हम आपको आगे बताएंगे। दरअसल ब्रिक्स की बैठक संपन्न हो गई। चर्चा चारों तरफ हुई कि भैया बैठक तो जो है बड़ा बढ़िया रहा। वेस्ट जलने लगा, अमेरिका जलने लगा और उसने जलन में सबसे पहले हमला किसकी तरफ करने का सोचा? भारत और रूस की दोस्ती पर। दरअसल अमेरिकी सांसदों ने रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले बिल में जो है वो संशोधन के लिए पेश कर दिया है। बताया जा रहा है इसमें से एक ऐसा संशोधन भी है जिसको में भारत को टारगेट किया जा रहा है। क्यों किया जा रहा है? क्योंकि वो रशिया का दोस्त है और भावना तो यह रही होगी कि ये भारत ने कैसे इतना बढ़िया ब्रिक्स का समिट करा लिया। चीन के राष्ट्रपति आ गए। रूस के राष्ट्रपति आ गए। ईरान के राष्ट्रपति आ गए। चर्चा हो गई। ईरान यूएई की मीटिंग हो गई। बताओ इतना कुछ हो रहा है। तो ये जो भाव है कोई कह नहीं रहा है कि मुझे ब्रिक्स से दिक्कत है। अमेरिका में कोई हल्ला नहीं है इसको लेकर। सब उसको अंडरप्ले करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह खुन्नस है क्योंकि खुन्नस जो है वह यह संशोधन पे दिखाई देता है। जानकारी यह है कि जो संशोधन है उसमें भारत सहित रूस के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के नए कानून में शामिल करने की मांग की गई है। 100% टेरिफ वाला बिल पूरी तरह से पास हो गया। अमेरिका के इस कड़े फैसले से पूरी दुनिया के बाजारों  में खलबली मच गई। लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका ने सख्त फैसला लिया क्यों? दरअसल  इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई बड़े कारण हैं। एक तरफ जहां ब्रिक्स देशों में डीडोलराइजेशन की सिर्फ चर्चा मात्र से अमेरिका में डर का माहौल बन गया वहीं दूसरी तरफ अमेरिका का बढ़ता व्यापार घाटा यानी कि ट्रेड डेफिसिट और उसकी अमेरिका फर्स्ट नीति भी इसका बड़ा कारण है।

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भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
अमेरिकी संसद में पारित नया विधेयक भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल या प्राकृतिक गैस का आयात करने वाले शीर्ष 5 देशों पर 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का अधिकार देता है।  वर्तमान में भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 88 फीसदी हिस्सा आयात करता है, जिसमें रूस एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है। वर्ष 2022 में यूक्रेन पर रूस के सैन्य हमले के बाद से रूसी कच्चा तेल भारत के आयात बास्केट का एक बड़ा हिस्सा बन गया। 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (GTRI) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में भारत ने रूस से 40.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जो उसके कुल कच्चे तेल आयात का लगभग एक-तिहाई है। वहीं, कमोडिटी डेटा ट्रैकर 'केपलर' (Kpler) के अनुसार, अगस्त में भारत ने रोजाना 20.8 लाख बैरल (bpd) रूसी तेल का आयात किया, जो उसके कुल तेल आयात का करीब 45 प्रतिशत था।  हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि इस विधेयक के पारित होने से भारत पर स्वतः 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हो जाता। यह कानून केवल राष्ट्रपति ट्रंप को यह तय करने का कानूनी अधिकार देता है कि शुल्क कब, किस दर पर और किस स्तर पर लगाया जाए।  यदि अमेरिकी राष्ट्रपति वास्तव में 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का फैसला करते हैं, तो यह आयात शुल्क का उच्चतम स्तर होगा। यह शुल्क उस मौजूदा 10 प्रतिशत टैरिफ के अतिरिक्त होगा, जो अमेरिका ने जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) से बने सामानों के आयात को रोकने में नाकामी के दंड स्वरूप भारतीय उत्पादों पर लगाया हुआ है।आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कड़े कदम से भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लग सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA Ltd) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने 'फॉर्च्यून इंडिया' से बातचीत में कहा, "अमेरिका द्वारा किसी भी प्रकार के उच्च शुल्क लगाए जाने और उससे पैदा होने वाली अनिश्चितता का सीधा नकारात्मक असर भारत के विकास परिदृश्य पर पड़ेगा।"GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने भी इस विधेयक को भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से बात करते हुए उन्होंने कहा, "यह विधेयक भारत पर एकतरफा शर्तों पर द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर हस्ताक्षर कराने का एक सीधा और खतरनाक दबाव बनाने का प्रयास है। भारत युद्ध के लिए फंडिंग करने नहीं, बल्कि अपनी 1.4 अरब आबादी के लिए किफायती ऊर्जा सुरक्षित करने के लिए रूसी तेल खरीदता है; और इन खरीदों ने वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को स्थिर रखने में अहम मदद की है।"  उन्होंने आगे आगाह किया कि यदि ट्रंप भारतीय सामानों पर 100 प्रतिशत शुल्क लागू करते हैं, तो इससे न केवल भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान होगा, बल्कि दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार संबंधों पर भी गंभीर असर पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया, "भारतीय निर्यात पर नए शुल्कों के वास्तविक असर का सही आकलन तभी किया जा सकेगा, जब अमेरिका औपचारिक रूप से शुल्क दरों की घोषणा करेगा।

क्या भारत में पेट्रोल की कीमतें बढ़ेंगी?
इसका जवाब अभी साफ़ नहीं है। हमें यह देखना होगा कि क्या भारत अमेरिका से टैरिफ़ के खतरे को टालने के लिए अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करता है। भारतीय रिफ़ाइनर दूसरे उत्पादकों से तेल ले सकते हैं, जिनमें पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के देश शामिल हैं। असल में, अगस्त में वेनेज़ुएला से भारत का कच्चा तेल आयात 2020 के बाद से सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया, जो जुलाई के मुक़ाबले 64 प्रतिशत बढ़कर 358,000 बैरल प्रति दिन हो गया। Kpler के डेटा के अनुसार, जहाँ रूस कच्चे तेल का सबसे बड़ा सप्लायर बना रहा, वहीं अगस्त में उस देश से तेल आयात चार महीने के निचले स्तर 2.06 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) पर आ गया, जो जुलाई से 27 प्रतिशत की भारी गिरावट है। इस बीच, UAE 542,000 bpd के साथ दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर था, जो जुलाई के 470,000 bpd से 15 प्रतिशत ज़्यादा है। Kpler में तेल बाज़ारों के सीनियर मैनेजर सुमित रितोलिया ने पहले 'द प्रिंट' को बताया था कि भारतीय कच्चे तेल के आयात पर असर तुरंत नहीं पड़ेगा। अतीत में प्रतिबंधों के काम करने के तरीके के आधार पर, उन्हें 45-60 दिनों की 'विंड-डाउन' अवधि (धीरे-धीरे काम बंद करने की अवधि) की उम्मीद है, जिसके दौरान पहले से कॉन्ट्रैक्ट किए गए और रास्ते में मौजूद कार्गो की डिलीवरी हो सकती है। रितोलिया ने कहा कि शुरुआती असर नई बुकिंग पर पड़ेगा, न कि जल्द आने वाले कार्गो पर। इसका मतलब है कि भारत रूसी तेल सप्लाई की जगह दूसरे स्रोत से तेल ले सकता है, लेकिन सवाल यह है कि किस कीमत पर।

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भारत ने क्या जवाब दिया
भारत नेकहा कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। भारत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट पारित किया है। यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर 100 प्रतिशत तक दंडात्मक शुल्क लगाने की अनुमति देता है। यह विधेयक ट्रंप को रूस पर प्रतिबंध लगाने और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर भारी शुल्क लगाने का अधिकार देता है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और अपने व्यापार तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिकी कांग्रेस में विधेयक पारित होने के बाद भारत इस मामले में आगे होने वाले घटनाक्रम पर नजर रख रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद में काफी वृद्धि हुई है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि जैसा कि पहले भी कई मौकों पर कहा गया है, भारत अपने 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के वास्ते पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने कहा कि भारत स्रोतों में विविधता लाने और बदलती बाजार परिस्थितियों के आधार पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता रहेगा। विदेश मंत्रालय ने बताया कि इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में अमेरिका के विभिन्न अधिकारियों और प्रतिनिधियों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा हुई है। उसने कहा कि भारत ने अमेरिका के सामने इस कदम के संभावित प्रभावों को स्पष्ट रूप से रखा है-न केवल भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी। भारत ने अमेरिका को यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने के लिए दृढ़ है। उसने कहा कि सरकार इन घटनाक्रम के प्रभावों से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी। यह प्रतिबंध विधेयक पिछले महीने अमेरिकी सीनेट से पारित हुआ था। बुधवार शाम अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इसे 262-159 मतों से मंजूरी दी। ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन जाएगा। इसमें रूस के नेतृत्व और ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस को तेल की आपूर्ति पर लगे प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले जहाजों के ‘छद्म बेड़ों’ पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, विधेयक ट्रंप को चीन, भारत और अन्य देशों पर कड़े शुल्क लगाने का अधिकार देता है, ताकि इन देशों की रूसी तेल और गैस पर निर्भरता कम की जा सके। विधेयक में ईरान पर अतिरिक्त प्रतिबंधों का भी प्रावधान है।

क्या क्या हो सकता है महंगा
अगर अमेरिका ने 100% टैरिफ लागू कर दिया, तो इसका बुरा असर सिर्फ कच्चे तेल पर ही नहीं, बल्कि भारत से अमेरिका जाने वाले निर्यात पर भी पड़ेगा। अमेरिका, भारत के कई सामानों पर टैक्स बढ़ा सकता है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान हमारे इलेक्ट्रॉनिक्स (खासकर स्मार्टफोन), दवाइयों (फार्मास्यूटिकल्स), कपड़ा उद्योग, गहने (रत्न और आभूषण) और ऑटोमोबाइल पार्ट्स के निर्यात को झेलना पड़ सकता है।

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