By अभिनय आकाश | Aug 10, 2026
तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा इस प्रसिद्ध हिंदी मुहावरे के बारे में तो आपने जरूर सुना होगा। इसका अर्थ है कि जहाँ तीन लोग मिल जाते हैं या जहाँ तीन का समूह होता है, वहाँ अक्सर काम खराब हो जाता है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर जो नया त्रिपक्षीय गठबंधन बनाया है, उसने वैश्विक कूटनीति और दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन में एक नई हलचल पैदा कर दी है। पाकिस्तान का सऊदी अरब के वित्तीय प्रभाव और तुर्की की उन्नत सैन्य तकनीक के साथ जुड़ना, सतह पर देखने में एक साधारण रक्षा-समझौता लग सकता है, लेकिन इसके दूरगामी रणनीतिक मायने हैं। क्या यह 'तीन तिगाड़ा' वास्तव में भारत की सुरक्षा, कूटनीति और क्षेत्रीय प्रभुत्व पर कोई बड़ा प्रहार करने की क्षमता रखता है, या फिर यह गठबंधन खुद अपने ही विरोधाभासों के बोझ तले दब जाएगा? आइए, इस गठजोड़ के हर पहलू, इसके संभावित खतरों और भारत की मजबूत रणनीतिक स्थिति का बारीक विश्लेषण करते हैं।
पाकिस्तान के पास न्यूक्लियर बम है। सऊदी के पास पैसा है। उसका डिफेंस बजट ही करीब 100 बिलियन डॉलर का है। और टर्की के पास क्या है? तुर्की के पास है पहली चीज। नाटो की दूसरी सबसे बड़ी आर्मी फौज है और दूसरी चीज है उनके पास एक डिफेंस इंडस्ट्री है जिसमें वो कई आधुनिक हथियार तैयार करते हैं। ड्रोंस उनका सबसे घातक हथियार इस वक्त दुनिया में माना जाता है। तो तीनों देशों की जो ताकत है वो साथ लेकर आ रहे हैं और तीनों देश मिलकर अब ये समझौता किया है।
मौजूदा हालात सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। ईरान सबसे बड़ा इस वक्त फैक्टर है, जिसकी वजह से तुर्किए को इसमें आना पड़ा। यहां पर पाकिस्तान के साथ पहले सऊदी अरब को ये ट्रीटी करनी पड़ी इसकी वजह भी ईरान है। क्योंकि इस वक्त जो हालात मिडिल ईस्ट के बने हुए हैं उसमें एक बात तो ईरान ने दुनिया के सामने साबित कर दी है कि अमेरिका जैसा दुनिया का सुपर पावर ईरान को घुटनों पर लाने में नाकामयाब रहा। 150 दिन का वक्त हो चुका है। 28 फरवरी 2026 को पहला हमला हुआ था। जिसके बाद से हमले होते रहे, संघर्ष होता रहा, समझौता भी हुआ। माना गया कि शायद डील हो गई है। अब सब कुछ नॉर्मल हो जाएगा। लेकिन अमेरिका जो चाहता है ईरान वो करने को तैयार नहीं है। क्योंकि ईरान अपनी शर्तों पर ही ट्रीटी करेगा। और पूरी दुनिया को ईरान ने बता दिया कि वो सुपर पावर के सामने झुकने को तैयार नहीं है और सरेंडर अमेरिका करवा भी नहीं सकता। यानी कि जो दबदबा है इस वक्त मिडिल ईस्ट में वो ईरान का साफ नजर आ रहा है। और जिस तरह से उसने स्टेट ऑफ होर्मुज पर नाकेबंदी करके पूरे अरब देशों को गल्फ कंट्रीज को धूल चटा दी है। उसके बाद सऊदी अरब के लिए यह बड़ा मसला हो गया कि क्योंकि पूरे इस अरब वर्ल्ड का इस पूरे अरब वर्ल्ड का खाड़ी देशों का सबसे मजबूत देश माना जाता था। सबसे अमीर देश है। दूसरी बड़ी बात है कि पिछले कुछ दिनों में देखा गया जिस तरह से होर्मुज के बाद बाब अल मंदेब या जो रेड सी का इलाका पड़ता है इस इलाके से भी जहाजों की आवाजाही पर रोक लगा दी है। हैं।
कुल मिलाकर ईरान ने जिस तरह से पूरी घेराबंदी की है और जिस तरह से वो पूरी दुनिया के सामने एक मजबूत ताकतवर मुल्क के तौर पर मिडिल ईस्ट में निकल कर आया है। यह कहीं ना कहीं सऊदी के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट चीज है वो है शिया और सुन्नी। क्योंकि ये तीनों देश जो हैं चाहे वो पाकिस्तान हो, पाकिस्तान, सऊदी और टर्की ये तीनों देश सुन्नी हैं। जिसमें से एकलौता है ईरान जो शिया देश है और ये शिया एक देश है जिसने पूरे मिडिल ईस्ट में इस वक्त सबको धूल चटा के रखी हुई है।
नाटो का सदस्य, अमेरिका के बाद सबसे बड़ी सेनाओं में एक। मजबूत रक्षा उद्योग और उन्नत सैन्य तकनीक। ड्रोन, मिसाइल, युद्धपोत व बख्तरबंद वाहन बनाने की क्षमता। पाकिस्तान के साथ पहले से रक्षा और तकनीकी सहयोग। पाकिस्तान के एफ-16 विमानों के आधुनिकीकरण में मदद। तकनीकी और सैन्य विशेषज्ञता देने की भूमिका। तुर्किये तकनीक, पाकिस्तान सैन्य क्षमता और सऊदी अरब आर्थिक व रणनीतिक सहयोग प्रदान करेगा।
14 देशों के समुद्री रक्षा गठबंधन में बांग्लादेश भी एक प्रमुख सदस्य के रूप में शामिल हुआ है। इस का उद्देश्य लाल सागर, बाब अल-मंदेब और अदन की खाड़ी जैसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा करना है।
ईरान ने रक्षा समझौते पर तंज कसा है। ईरान के सांसद इब्राहिम रजाई ने कहा कि यह कागजी समझौता सऊदी को सुरक्षा नहीं दे सकता। अमेरिका की तरह यह भी नाकाम रहेगा।
समझौते पर भारत की भी नजर है। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि भारत इसके प्रभावों का आकलन कर रहा है। अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थिति पर नजर रखेगा। नई दिल्ली इस पूरे घटनाक्रम में चीन के पहलू पर भी कड़ी नजर बनाए हुए है। बीजिंग के पाकिस्तान और सऊदी अरब दोनों के साथ गहरे आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं, वहीं तुर्की इस समीकरण में उद्योग स्तर पर अपनी अत्याधुनिक स्वदेशी रक्षा क्षमता को जोड़ता है। इसी वजह से भारतीय खुफिया एजेंसियां इस नए त्रिस्तरीय ढांचे को भारत की पश्चिमी समुद्री सीमा पर चीन-समर्थित सुरक्षा गठबंधन के रूप में देख रही हैं। हालांकि, नई दिल्ली के लिए तत्काल कूटनीतिक चिंता का मुख्य विषय कश्मीर है। खुफिया सूत्रों का मानना है कि इस्लामाबाद, रियाद के साथ अपने मजबूत होते रिश्तों का इस्तेमाल सऊदी अरब पर दबाव बनाने के लिए करेगा, ताकि वह कश्मीर और भारत के आंतरिक सुरक्षा मुद्दों पर खुलकर बयान दे। यह कदम भारत के साथ अपने संबंधों में सऊदी अरब के पारंपरिक और संतुलित रुख की परीक्षा ले सकता है। फिलहाल, मक्का समझौता NATO जैसी एकीकृत सैन्य व्यवस्था के बजाय एक राजनीतिक प्रतिबद्धता अधिक दिखाई देता है। इसकी वास्तविक सार्थकता "किसी एक पर हमला सभी पर हमला" जैसी पंक्तियों से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से सिद्ध होगी कि अगली किसी बड़ी चुनौती या संकट के आने पर ये तीनों देश धरातल पर एक-दूसरे के लिए क्या कदम उठाने को तैयार होते हैं।