Bihar में बदलाव की बयार, जाति-धर्म तोड़ न्याय के लिए एक हुआ समाज

By उमेश चतुर्वेदी | Jul 08, 2026

जाति और धर्म के बिना आज राजनीति की कल्पना बेमानी है, लेकिन बिहार में जातिवाद का असर कुछ ज्यादा ही दिखता है। यहां मानस किस कदर जातिवाद के घेरे में है, इसे समझने के लिए किसी खास जाति के अपराधियों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई को देखना होगा। तब उस अपराधी के जाति विशेष द्वारा उसे बेकसूर बताने और कार्रवाई को जातिवादी बदला बताने की होड़ लग जाती है। लेकिन इसी बिहार में हाल ही में हुई एक घटना की प्रतिक्रिया में उभरा जनाक्रोश इसके ठीक उलट है। इसमें जाति और धर्म की सीमाएं टूट गई हैं। भोजपुर पुलिस के कथित एनकाउंटर में मारे गए सवर्ण युवक भरत तिवारी के इंसाफ के लिए उतरे लोगों के बीच कोई जातीय दीवार नजर नहीं आ रही। हालांकि इसे भी जातीय रंग देने की कोशिश की गई, तो उसके खिलाफ उसी दलित समाज के स्त्री और पुरूष मैदान में उतर आए, जिनकी रहनुमाई का दावा करने वाली राजनीति हस्ती ने यह रंग देने का प्रयास किया था। 

बिहार में ठीक साढ़े इक्कीस साल पहले इसी तरह जाति और धर्म का बंधन टूटा था। झारखंड के अलग होने के बाद राज्य में पहला विधानसभा चुनाव हो रहा था। इसी दौरान बारह जनवरी 2005 को पटना के पटेल नगर से दिनदहाड़े पंद्रह साल के किसलय का अपहरण कर लिया गया। इस अपहरण के खिलाफ तब बिहार का पूरा समाज उतर आया था। बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार में उतरे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का बयान तब जन-जन की जुबान पर चढ़ गया था। उन्होंने कहा था, मेरा किसलय लौटा दो। किसलय की वापसी का सवाल जाति और धर्म की सीमाओं को तोड़ समूचे बिहार की आवाज बन गया था। भोजपुर जिले के बिलौटी गांव के भरत तिवारी की कथित मुठभेड़ में हत्या के बाद एक बार फिर बिहार का समाज ठीक उसी तरह जाति और समुदाय के खांचों को तोड़ सत्य और न्याय के साथ खड़ा नजर आ रहा है।

भोजपुर जिले का जवानिया गांव गंगा के ठीक किनारे है। इस गांव को पिछले साल गंगा की लहरों ने तकरीबन लील लिया। कटान से प्रभावित लोगों को अपने घर-खेत गंवाना पड़ा, तब से ज्यादातर लोगों की स्थिति बदहाल है। प्रभावितों को घर के लिए जमीन और पैसे तो दिए गए, लेकिन जो जगह उन्हें मिली, वह गड्डे वाली है। बाकी सहूलियतें भी ना के बराबर मिली हैं। इनकी बस्ती में हाल के दिनों तक पानी का चापाकल तक नहीं थे, कुछ थे भी तो उनमें पानी नहीं आ रहा था। इन्हीं बदहाल लोगों की आवाज बनकर भरत तिवारी सक्रिय थे। भरत तिवारी के न रहने के बाद बिलौटी और जवानिया के उजड़े लोगों का कहना है कि उन्हें भरत तिवारी की ही वजह से थोड़ी-बहुत सुविधाएं मिली हैं। इनके लिए वे ही प्रशासन से लड़ते रहे। कटान पीड़ित जवानिया गांव वालों का दर्द है कि उन्हें पानी से निकालकर फिर से पानी में ही बसा दिया गया है। उन्हें डर है कि फिर बारिश और बाढ़ आई तो उन्हें उजड़ना पड़ सकता है। भरत तिवारी इन्हीं मुद्दों को उठा रहे थे। भरत के गांव वालों का कहना है कि वह थोड़े तुनक मिजाज जरूर थे, लेकिन लोगों के सहयोग के लिए हमेशा तैयार रहते थे। प्रशासन के यहां कटान पीड़ितों की सुनवाई ना होने से भरत गुस्से में थे। गांव वाले मानते हैं कि प्रशासन के प्रति भरत के मन में गुस्सा था। उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट में एक पुलिस वाले का एनकाउंटर करने की भी बात कही थी। इसके वायरल होने के बाद पुलिस ने भरत के खिलाफ जांच शुरू की थी। गांव पहुंची पुलिस के सामने भरत के माता-पिता ने भी उन्हें डांटा था। पुलिस से भरत की नोकझोक और झूमाझटकी भी हुई थी। इसके बाद 16 जून को एक बयान में पुलिस ने उन्हें मानसिक रूप से अस्थिर बताया था। लेकिन अगले ही दिन यानी सत्रह जून को पुलिस ने उन्हें घेर लिया। तब भरत के हाथ में पिस्तौल थी। उन्होंने जवानियां के गड्ढे भरने के साथ तीन मांगें रखीं थी। जब प्रशासन ने उनकी मांगें मानने का भरोसा दिया तो उन्होंने पिस्तौल फेंक कर सरेंडर कर दिया था। जिसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया था। पुलिस वहां से उन्हें ले गई और बाद में उन पर पंद्रह-बीस फायर करने का आरोप लगाते हुए उनके मुठभेड़ की बात कही थी। इसके बाद उन्हें अस्पताल में दाखिल करा दिया था, जहां सत्रह जून को उनकी मौत हो गई। लेकिन पुलिस की थ्योरी पर लोगों को भरोसा नहीं हुआ और इलाके का गुस्सा फूट पड़ा। लोगों का कहना है कि जब भरत ने पिस्तौल पुलिस को सौंप दी तो फिर वे गोली कैसे चला सकते हैं। 

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भरत की शव यात्रा में उमड़ी भीड़ बिहार के नए समाज का आइना कही जा सकती है। हालांकि बिहार सरकार का रवैया पारंपरिक रहा। वह प्रशासन के ही बचाव में नजर आई। लेकिन जनाक्रोश देखते हुए उसे झुकना पड़ा। भरत की हत्या की जांच के लिए पटना हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश विनोद कुमार सिन्हा की अगुआई में जांच आयोग गठित किया गया है। इसी बीच आरोपी पुलिस वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है, जिनमें डीएसपी और शाहपुर के थानेदार भी शामिल हैं। स्थानीय स्तर पर सवर्ण के पक्ष में दलित और पिछड़ों के उतरने से जाति और धर्म के आधार पर चाल चलने वाली राजनीति को परेशानी जरूर महसूस हो रही होगी। लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि समाज की सोई सकारात्मक आत्माएं ऐसे ही जागती हैं और बदलाव की बुनियाद बनती हैं। बस उसके लिए चिंगारी की जरूरत होती है। उम्मीद की जा सकती है कि भरत की हत्या के बाद उभरा जनाक्रोश प्राचीन भारतीय सामाजिक सोच को उभारने का प्रस्थान बिंदु बनेगा, जिसमें समायोजन होगा और मेलजोल भी।

उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं। 

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