Chai Par Sameeksha: Gyanesh Kumar के चलते बंपर वोटिंग के पुराने रिकॉर्ड टूट रहे हैं, फिर Vote Chori कैसे हो गयी?

By नीरज कुमार दुबे | Sep 26, 2026

इस सप्ताह हमें बहुत से पाठकों/दर्शकों की ओर से अनुरोध आये कि चुनाव आयोग को लेकर उठे विवाद पर हम पूरी स्थिति का विश्लेषण करें इसलिए तमाम सवालों के जवाब देने वाला यह कार्यक्रम आपके समक्ष लेकर प्रस्तुत हुए हैं।

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यानी सवाल यह नहीं है कि आयोग के भीतर किसी ने असहमति जताई या नहीं। असली सवाल है कि अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया से हुआ, क्या वह कानून के मुताबिक हुआ और क्या चुनाव निष्पक्ष रूप से सम्पन्न हुए?

साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि वर्ष 1993 में चुनाव आयोग को स्थायी रूप से तीन सदस्यीय संस्था बनाए जाने के बाद से ही उसके भीतर मतभेद सामने आते रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन और निर्वाचन आयुक्त एम.एस. गिल तथा जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति के बीच तीखे मतभेद हुए थे। शेषन ने दोनों आयुक्तों की नियुक्ति तक को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। वर्ष 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि तीनों सदस्यों की निर्णय प्रक्रिया में समान भूमिका है।

साल 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी और राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल उठाया था। बाद में चावला स्वयं मुख्य चुनाव आयुक्त बने।

2019 में निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के विरुद्ध आदर्श आचार संहिता की शिकायतों पर आयोग के बहुमत से अलग राय दर्ज की थी। उन्होंने अपने असहमति नोटों को अंतिम आदेशों में दर्ज नहीं किए जाने पर भी आपत्ति जताई थी और 2020 में आयोग से इस्तीफा दे दिया।

तो आज यदि दो निर्वाचन आयुक्त किसी प्रक्रिया पर टिप्पणी या आपत्ति दर्ज करते हैं, तो इसे अपने आप में संवैधानिक संकट घोषित कर देना इतिहास और कानून दोनों की अनदेखी है।

इस बार हुआ क्या है? यदि इसको देखें तो तस्वीर साफ है कि भारतीय चुनाव आयोग के अनुसार, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े कुछ निर्णयों पर पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 बार आपत्तियां या टिप्पणियां दर्ज कीं। आयोग ने इन टिप्पणियों को आंतरिक विचार-विमर्श और संस्थागत नियंत्रण-व्यवस्था का हिस्सा बताया है तथा कहा है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

यहां एक बात बेहद महत्वपूर्ण है कि असहमति दर्ज करना और कदाचार करना दो अलग बातें हैं। यदि किसी संस्था में सवाल पूछने की अनुमति ही न हो तो वह संस्था मजबूत नहीं होती। लेकिन सवाल पूछे जाने के बाद कानून के मुताबिक अंतिम फैसला हो, उसका रिकॉर्ड रहे और उस फैसले को चुनौती देने की वैधानिक व्यवस्था हो, तो मतभेद को भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं कहा जा सकता।

सवाल उठता है कि चुनाव आयोग के काम का मूल्यांकन आंकड़ों से क्यों न हो? अब जरा चुनावी भागीदारी के आंकड़े देखिए।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में 67.13 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 1951 के बाद राज्य में सबसे अधिक था। महिला मतदाताओं की भागीदारी 71.78 प्रतिशत रही। चुनाव में कोई पुनर्मतदान नहीं हुआ और आयोग के अनुसार विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची में गलत तरीके से नाम जोड़ने या हटाने के संबंध में कोई अपील प्राप्त नहीं हुई।

2026 में तमिलनाडु में लगभग 85.05 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ। केरल में 78.03 प्रतिशत मतदान हुआ, जो पिछले विधानसभा चुनाव से अधिक था। असम में 85.38 प्रतिशत और पुडुचेरी में 89.83 प्रतिशत मतदान हुआ। दोनों राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश ने विधानसभा चुनावों में अपने अब तक के सर्वोच्च मतदान का रिकॉर्ड बनाया। पश्चिम बंगाल में पहले चरण में मतदान 91 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया और निर्वाचन आयोग के अपडेटेड आंकड़ों में यह 92.72 प्रतिशत तक दर्ज हुआ।

यदि चुनाव आयोग मतदाताओं को मतदान से रोकने के लिए इतने बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से नाम काट रहा था, तो बिहार में रिकॉर्ड मतदान कैसे हुआ? तमिलनाडु में करीब 85 प्रतिशत मतदान कैसे हुआ? केरल में 78 प्रतिशत, असम में 85 प्रतिशत से ज्यादा, पुडुचेरी में करीब 90 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 90 प्रतिशत से ऊपर मतदान कैसे पहुंच गया?

यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं काटा गया। लेकिन यह जरूर बताता है कि केवल नाम हटाए जाने के आंकड़े को लेकर पूरे चुनाव को ही चोरी या साजिश घोषित कर देना तथ्यों से कहीं आगे की छलांग है।

सवाल उठता है कि नाम काटे गए तो कितनों ने चुनौती दी? देखा जाये तो यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है और यहां आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की बजाय ईमानदारी से देखना चाहिए।

बिहार की बात करें तो अंतिम सूची में लगभग 47 लाख की कमी आई लेकिन चुनाव आयोग के अनुसार शून्य अपील की गयी। तमिलनाडु में पुनरीक्षण के दौरान 97.37 लाख नाम हटे और अंतिम सूची में शुद्ध कमी लगभग 74.07 लाख रही। वहां दावों-आपत्तियों के दौरान 27.53 लाख पात्र मतदाता जोड़े गए। वहीं केरल में 8.57 लाख नाम हटे और लगभग 4.01 लाख विभिन्न प्रकार के आवेदन आये जिनमें समावेशन और सुधार के आग्रह थे। असम में अंतिम सूची में 2.43 लाख नाम कम हुए और वहां भी दावों-आपत्तियों की प्रक्रिया नियमानुसार पूरी हुई। पश्चिम बंगाल में 27.16 लाख मतदाता न्यायिक निर्णय के बाद हटाए गए। इनमें से 22.21 लाख, यानी लगभग 82 प्रतिशत ने पुनः शामिल किए जाने के लिए अपील की। बंगाल का आंकड़ा यह भी दर्शाता है कि पूरी प्रक्रिया में चुनौती देने का रास्ता मौजूद था और बड़ी संख्या में लोगों ने उसका इस्तेमाल किया।

यहां एक और सवाल यह उठता है कि गैर-नागरिक को वोट का अधिकार देने पर कुछ पार्टियां क्यों तुली रहती हैं? जबकि भारत में चुनावी कानून इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट है। चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार भारत का नागरिक न होने वाला व्यक्ति मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं हो सकता। यहां तक कि जिसने किसी दूसरे देश की नागरिकता ले ली हो, वह भी भारतीय मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं हो सकता।

यह सिद्धांत केवल भारत की विशेषता नहीं है। अमेरिका में संघीय चुनावों में गैर-नागरिक मतदान नहीं कर सकते। कनाडा में संघीय चुनाव के लिए कनाडाई नागरिक होना अनिवार्य है। ब्रिटेन में संसदीय चुनावों के लिए ब्रिटिश, आयरिश या पात्र राष्ट्रमंडल नागरिकों की श्रेणियां निर्धारित हैं। साथ ही यहां पश्चिम बंगाल से सामने आये उदाहरण को भी देखना चाहिए। पश्चिम बंगाल की सरकार ने कुछ समय पहले खुलासा किया था कि सरकारी योजनाओं का लाभ गैर भारतीय नागरिक भी बड़ी संख्या में ले रहे थे।

इसके साथ ही ज्ञानेश कुमार का रिकॉर्ड भी बहस का हिस्सा होना चाहिए। ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल संवर्ग के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी रहे हैं और 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त बने। इससे पहले उन्होंने केरल सरकार में जिलाधिकारी, नगर आयुक्त और कई विभागों में सचिव जैसी जिम्मेदारियां संभालीं। केंद्र में उन्होंने रक्षा उत्पादन मंत्रालय में संयुक्त सचिव, गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव, संसदीय कार्य मंत्रालय के सचिव तथा सहकारिता मंत्रालय के सचिव के रूप में काम किया।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर से अभियांत्रिकी की पढ़ाई के अलावा उन्होंने व्यावसायिक वित्त और पर्यावरणीय अर्थशास्त्र का भी अध्ययन किया। चुनाव आयुक्त बनने के बाद उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव जैसी विशाल चुनावी प्रक्रिया में भूमिका निभाई और बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त बने। साथ ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर ने उनके प्रशासनिक और चुनावी योगदान के लिए उन्हें विशिष्ट पूर्व छात्र सम्मान भी दिया। इस पूरे रिकॉर्ड को नजरअंदाज करके केवल वर्तमान राजनीतिक विवाद के आधार पर किसी अधिकारी की पूरी सार्वजनिक सेवा पर फैसला सुना देना भी उचित नहीं है।

जहां तक राहुल गांधी की राजनीति का सवाल है तो वह लगातार इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों को “ब्लैक बॉक्स” बताते हुए उनकी पारदर्शिता पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर मतदाता चोरी और चुनावी हेरफेर के आरोप लगाए तथा बाद में चुनाव आयोग को भविष्य में जवाबदेही की चेतावनी भी दी। देखा जाये तो यहां आलोचना करना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। विपक्ष को चुनाव आयोग से सवाल पूछने, आंकड़े मांगने और न्यायालय जाने का पूरा अधिकार है। लेकिन बहस का अगला चरण होना चाहिए कि दस्तावेज कहां हैं, प्रमाण क्या है, शिकायत किस निर्वाचन क्षेत्र में दर्ज हुई, कितने मामलों में जांच हुई और कितने मामलों में आरोप सही पाए गए? इसलिए बहस को व्यक्ति बनाम व्यक्ति बनाने की बजाय प्रमाण बनाम आरोप बनाना ज्यादा जरूरी है।

इस तरह चुनाव आयोग से सवाल पूछना गलत नहीं है; लेकिन आयोग के भीतर मतभेद को कदाचार का प्रमाण बताना गलत है। और सबसे बड़ी बात यह है कि भारत के चुनाव आयोग का मूल्यांकन नारों से नहीं, चुनाव के वास्तविक आंकड़ों से कीजिए। बिहार में 67.13 प्रतिशत का रिकॉर्ड मतदान, तमिलनाडु में करीब 85 प्रतिशत, केरल में 78.03 प्रतिशत, असम में 85.38 प्रतिशत, पुडुचेरी में 89.83 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 90 प्रतिशत से ऊपर की भागीदारी इस बात का ठोस संकेत है कि करोड़ों भारतीय मतदाता चुनाव प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रहे हैं।

विपक्ष को भी एक बार अपने गिरेबां में झांकना चाहिए। लोकतंत्र में हार या राजनीतिक असफलता के बाद दूसरों पर उसका ठीकरा फोड़ना सबसे आसान है। अक्सर देखने में आता है कि चुनाव में हार के बाद विपक्षी दल अपनी कमियों की समीक्षा करने की बजाय सिस्टम को ही दोषी ठहराने लगते हैं। इसे एक कमजोर विद्यार्थी के उदाहरण से समझिए। परीक्षा में नंबर कम आने के बाद एक विद्यार्थी अगर यह सोचने की बजाय कि उसने पढ़ाई में कहां कमी छोड़ी, शिक्षक, प्रश्नपत्र, परीक्षा व्यवस्था, समय और यहां तक कि अपनी किस्मत को दोष देने लगे, तो बहाने शायद उसे उस क्षण राहत दे दें, लेकिन अगली परीक्षा में उसकी स्थिति नहीं बदलेंगे। सुधार के लिए उसे आखिरकार अपनी किताब खोलनी ही पड़ेगी।

राजनीति में भी यही सिद्धांत लागू होता है। अगर किसी दल को लगातार मतदाताओं का समर्थन नहीं मिल रहा, तो उसे सबसे पहले यह देखना चाहिए कि जनता उससे दूर क्यों जा रही है? संगठन कहां कमजोर है, जमीन पर कार्यकर्ता कितना सक्रिय है, उम्मीदवारों का चयन कैसा है, नीतियों और नारों का जनता पर क्या असर है और क्या मतदाता उस दल पर भरोसा कर रहा है। इन सवालों के जवाब खोजने की बजाय हर चुनाव के बाद ईवीएम, चुनाव आयोग, मतदाता सूची और संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर देना आसान जरूर है, लेकिन इससे अपनी राजनीतिक कमियों का इलाज नहीं होता।

चुनाव आयोग से सवाल पूछिए, उसकी गलतियां सामने लाइए, जहां किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया हो वहां आवाज उठाइए और जहां अनियमितता का प्रमाण हो वहां कार्रवाई की मांग कीजिए। लेकिन हर असहमति को साजिश और हर चुनावी नतीजे को चोरी बताने की राजनीति अंततः उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती है, जिसके सहारे सत्ता में आने की लड़ाई लड़ी जाती है।

इसलिए अब वक्त विपक्ष के लिए भी आत्ममंथन का है। हर हार का कारण चुनाव आयोग नहीं हो सकता, हर असफलता का कारण ईवीएम नहीं हो सकती और हर राजनीतिक कमजोरी के पीछे कोई संवैधानिक साजिश नहीं हो सकती। कभी-कभी समस्या सामने वाले की व्यवस्था में नहीं, अपनी तैयारी में भी होती है।

-नीरज कुमार दुबे

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