विश्व स्वास्थ्य दिवस विशेष: बिहार के ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल

By सर्वेश तिवारी | Apr 07, 2022

पूरे विश्व में स्वस्थ जीवन तथा इसके लिए जरूरी स्वास्थ्य एवं पोषण सुविधाओं को विकास का मापदंड माना गया है। किसी भी देश के विकास के लिए वहां के मानव का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य आवश्यक है अर्थात् किसी भी राष्ट्र के सरकार की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वे अपने नागरिकों के लिए सर्वसुलभ स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करायें।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के संविधान में यह भी कहा गया है कि अच्छा स्वास्थ्य प्रत्येक मनुष्य का मूल अधिकार हैं। इस विषय पर जाति, धर्म, राजनीति, विश्वास, धार्मिकता सामाजिक आधार पर कोई भेदभाव नही किया जा सकता।

स्वास्थ्य के महत्व को स्वीकारते हुए कहा गया है कि समस्त प्रकार के संसाधनों का भरपूर उपयोग तभी संभव है जब आम आदमी के लिए चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो। स्वस्थ समाज से ही किसी भी देश की प्रगति संभव है। जब इंसान स्वस्थ रहेगा तभी वह किसी कार्य को पूर्ण ऊर्जा के साथ कर सकता है। 

  

यदि हम बिहार के परिपेक्ष्य में बात करें तो आज़ादी के बाद से ही आबादी के हिसाब से इस तीसरे बड़े राज्य में यहाँ स्वास्थ्य देखभाल हेतु बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया गया। विशेष रूप से ग्रामीण इलाके, हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामलों में वर्षों से मानकों के बहुत नीचे हैं। यहाँ प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत सड़कें बनीं, बिजली की सुविधा भी मिलने लगी, यहाँ तक की अस्पतालों के भवन भी बनें लेकिन इन अस्पतालों में डॉक्टर और अन्य मानव संसाधन की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही। किसी मरीज के इलाज के लिए भवन और सुविधाओं के साथ ही डॉक्टर्स और अन्य सहयोगी पैरामेडिकल स्टाफ की जरुरत होती है। जिला व अनुमंडल स्तर के कई अस्पतालों के नए भवन बनाए गए हैं तो कई का विस्तार किया गया है। किंतु कई प्राइमरी हेल्थ सेंटर पीएचसी आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे कई अस्पताल हैं जो एएनएम के भरोसे चल रहा है।

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विभागीय आंकड़ों (2021) के मुताबिक प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में चिकित्सकों के 5674, शहरी क्षेत्रों में 2874 तथा दूरस्थ इलाकों में 220 पद खाली पड़े हैं। जबकि शहरी, ग्रामीण व दूरस्थ इलाकों में क्रमश: 4418, 6944 व 283 कुल सृजित पद हैं वहीं पटना हाईकोर्ट को सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार राज्य के सरकारी अस्पतालों में विभिन्न स्तर के 91921 पदों में से लगभग आधे से अधिक 46256 पद रिक्त हैं। इनमें विशेषज्ञ चिकित्सकों के चार हजार तथा सामान्य चिकित्सकों के तीन हजार से ज्यादा पद रिक्त पड़े हैं। डब्लूएचओ के मानकों के अनुसार प्रति एक हजार की आबादी पर एक चिकित्सक होना चाहिए, किंतु बिहार में 28 हजार से अधिक लोगों पर एक डॉक्टर है। आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 1899 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) हैं। इनमें महज 439 केंद्र पर ही चार एमबीबीएस चिकित्सक तैनात हैं, जबकि तीन डॉक्टरों के साथ 41, दो के साथ 56 तथा एक चिकित्सक के साथ 1363 पीएचसी पर काम हो रहा है।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) ने 2005 में ही ग्रामीण इलाकों में नियुक्त किए जाने वाले डॉक्टरों के लिए वेतन बढ़ाने, उनकी सेवानिवृति आयु बढ़ाने, उनकी पत्नी को उसी जगह पर योग्यतानुसार नौकरी देने, पति-पत्नी को एक जगह नियुक्त करने जैसी अनुशंसा की थी। किंतु इन पर कोई काम नहीं हुआ। और आज हालात यह हैं कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था लचर है। पिछड़े और वंचित तबके के लोगों को सरकारी अस्पतालों से ही उम्मीद रहती है, यदि वहां भी उनकी उम्मीद पर पानी फिर जाये तो स्वस्थ्य रहने के लिए क़र्ज़ लेकर प्राइवेट अस्पतालों में जाना होगा। प्राइवेट अस्पतालों में सुविधाएं तो मिलेंगी लेकिन क़र्ज़ लेकर इलाज आखिर कब तक संभव है। विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर मैं केंद्र और राज्य सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराना चाहता हूँ की ग्रामीण स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेष ध्यान देने के साथ आम जन जीवन को स्वस्थ रहने के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत बनायें।

- सर्वेश तिवारी 

(लेखक सक्षम चंपारण के संस्थापक और निर्भया ज्योति ट्रस्ट के महासचिव हैं और कृषि, पर्यावरण, शिक्षा एवं अन्य सामाजिक कार्य के लिए लगातार आवाज उठाते हैं।)

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