Bishkek में पहलवान Sujit का 'Mission Gold', 7 साल का सूखा खत्म करने की बड़ी चुनौती।

By Ankit Jaiswal | Apr 07, 2026

कुछ ही दिनों में एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता शुरु होने वाली है और भारत की नजरें एक युवा पहलवान पर टिकी हुई हैं। हरियाणा के सुजीत जब बिश्केक में मैट पर उतरेंगे तो उनसे बड़ी उम्मीदें जुड़ी होंगी, क्योंकि पिछले सात साल से 57 किलो वर्ग के अलावा किसी और फ्रीस्टाइल वजन वर्ग में भारत को स्वर्ण पदक नहीं मिला है। बता दें कि साल 2019 में बजरंग पुनिया ने यह कारनामा किया था और उसके बाद से यह इंतजार जारी है।

गौरतलब है कि इस वर्ग में मुकाबला आसान नहीं रहने वाला है। जापान के ताकारा सूदा, उज्बेकिस्तान के उमिदजोन जलोलोव और ईरान के पेयमान नेमाती जैसे पहलवान कड़ी चुनौती पेश कर सकते हैं। हालांकि सुजीत का आत्मविश्वास उनके हालिया प्रदर्शन से साफ झलकता है और वह दबाव से दूर रहकर अपने खेल पर ध्यान देने की बात करते हैं।

हरियाणा के चरखी दादरी जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने की उनकी कहानी भी काफी प्रेरणादायक है। शुरुआती दौर में उन्हें जिला स्तर पर हार का सामना करना पड़ा, लेकिन लगातार मेहनत और परिवार के समर्थन से उन्होंने खुद को निखारा। बता दें कि उनके पिता भी राष्ट्रीय स्तर के पहलवान रहे हैं, जिससे उन्हें खेल की बारीकियां समझने में मदद मिली है।

साल 2021 में सोनीपत शिफ्ट होने के बाद उनके खेल में बड़ा बदलाव आया। वहां बेहतर प्रशिक्षण और अनुभवी खिलाड़ियों के साथ अभ्यास ने उनकी तकनीक और आत्मविश्वास दोनों को मजबूत किया। इसके बाद उन्होंने जूनियर स्तर से लेकर सीनियर स्तर तक लगातार प्रगति की और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।

मौजूद जानकारी के अनुसार सुजीत ने अलग-अलग देशों में प्रशिक्षण लेकर अपने खेल में विविधता भी जोड़ी है। उन्होंने जापान, रूस और मंगोलिया जैसे देशों में अभ्यास किया, जहां से उन्होंने नई तकनीक और रणनीति सीखी। उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता के लिए केवल ताकत नहीं बल्कि तकनीक और गति भी बेहद जरूरी है।

गौरतलब है कि ओलंपिक क्वालीफिकेशन में मिली निराशा के बाद उन्होंने खुद को संभाला और वापसी की मजबूत कहानी लिखी। अंडर-23 विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतकर उन्होंने दिखा दिया कि वह बड़े मंच के खिलाड़ी बन चुके हैं।

अब बिश्केक में होने वाली प्रतियोगिता उनके लिए एक बड़ा अवसर है, जहां वह न सिर्फ खुद को साबित करना चाहेंगे बल्कि देश के लिए लंबे समय से चले आ रहे इंतजार को भी खत्म करना चाहेंगे। अगर वह यहां स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहते हैं तो भारतीय कुश्ती को एक नया सितारा मिल सकता है और 65 किलो वर्ग में भारत की स्थिति और मजबूत हो सकती है।

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