योगी का राजनीतिक धर्मः दीवाली पर अयोध्या में रहे, जन्माष्टमी पर मथुरा रहेंगे

By अजय कुमार | Aug 21, 2019

धर्म और राजनीति दो अलग−अलग विषय हैं। संविधान निर्माताओं ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया था ताकि किसी समुदाय की भावनाएं आहत न हों। सब जानते हैं कि भारत विभिन्न धर्मों, भाषाओं−जातियों वाला देश है। अनेकता में एकता भारत की शक्ति है। ऐसे में किसी एक या सभी धर्मों को साथ लेकर राजनीति करना मुश्किल ही नहीं असंभव था। मगर कड़वी सच्चाई यह भी है कि भले ही हमारे संविधान निर्माताओं ने दूर की सोच रखते हुए देश का तानाबाना धर्मनिरपेक्ष के रूप में तैयार किया था, लेकिन सियासतदारों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए समय−समय पर धर्म और राजनीति में घालमेल करने का कभी कोई मौका नहीं छोड़ा।

 

नेता तो नेता अपने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को धता बताते हुए यहां की तमाम सरकारें तक रोजा इफ्तार, नवरात्रों पर कन्याओं को भोजन जैसे धार्मिक आयोजन कराते दिख जाती हैं। थानों और सरकारी कार्यालयों में जन्माष्टमी, होली मिलन, ईद मिलन, कांवड़ यात्रा सहित तमाम धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन सामाजिक समरसता के नाम पर होता रहता है। तमाम जातियों के महापुरूषों की जयंती के नाम पर खूब राजनीति की जाती है।

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संविधान निर्माताओं ने कभी इसकी कल्पना नहीं की होगी कि धर्मनिरपेक्षता नए−नए धर्मों की नियंता बनेगी, लेकिन आज ऐसा ही हो रहा है। जस्टिस नागमोहन दास समिति की संस्तुति पर कर्नाटक सरकार का लिंगायत भक्ति परंपरा को अलग धर्म स्वीकार करने का प्रस्ताव एक ऐसा ही क्षण था। यह साफ दिख रहा है कि आज क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ से वशीभूत होकर लोग कुछ भी करने को तैयार हैं। उन्हें इसकी परवाह नहीं कि धर्म समाज पर इसका क्या और कैसा असर होगा ?

 

यहां प्रसिद्ध सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान के विचार को सुनना−समझना भी जरूरी है, जिनका मानना है कि 21वीं सदी मानवता के लिए सबसे बुरा समय है, एक ऐसा दौर है जहां लोग धर्म के नाम पर एक दूसरे की हत्या कर रहे हैं। खान ने कहा, 'हमें विश्व में शांति की जरूरत है लेकिन दुर्भाग्य से राजनीति अब धर्म पर आधारित हो गई है, नेता अपने स्वार्थ की खातिर धर्म के इर्द−गिर्द राजनीति करते हैं। इसलिए यह न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।' खान ने यह बात कोलकाता में चल रहे 'कोलकाता साहित्य उत्सव' में कही थी।

 

बहरहाल, ऐसा लगता है कि धर्म अब व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं रह गया है। इसीलिए तो नेताओं के धार्मिक क्रियाकलापों को भी राजनीति के रंग में रंग दिया जाता है। हाल ही में लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद और चुनाव नतीजे आने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बाबा केदारनाथ के दर्शन करने गए थे तो उसको मीडिया ने इवेंट बना दिया था। इससे पहले भी यही नजारा तमाम नेताओं के धार्मिक आयोजनों के समय देखा जाता रहा है।

 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो राजनीति और धर्म को एक मंच पर ही ले आए हैं। उनका एक कदम सरकारी तो दूसरा धार्मिक होता है। वह स्वयं तो धार्मिक आयोजनों में हिस्सा लेते ही हैं, उनकी सरकार की धार्मिक आयोजन कराने में भी विशेष रूचि रहती है। खैर, यह सब पहली बार नहीं हो रहा है। वैसे तो तमाम दलों की सरकारें समय−समय पर धार्मिक आयोजन करती रहीं हैं, लेकिन जब से योगी सरकार आई है तब से धार्मिक आयोजनों की बाढ़-सी आ गई है। योगी जी, भगवान (कुल देवताओं), तमाम जातियों के महापुरुषों, धर्म गुरुओं और प्रतीकों के सहारे खूब सियासत कर रहे हैं। इसी कड़ी में योगी सरकार, यादवों को लुभाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी धूमधाम से मना रही है। श्रीकृष्ण महोत्सव कार्यक्रम संबंधी आयोजन 17 अगस्त से शुरू हो गए हैं। योगी जी जन्माष्टमी पर विशेष तौर पर मथुरा−वृंदावन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे।

 

हर साल लाखों भक्त श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर यहां पहुंचते हैं। पर इस बार यहां खुद प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दर्शन के लिए पहुंचेंगे। योगी जन्माष्टमी महोत्सव के दौरान दो दिन तक मथुरा में रहेंगे और कृष्ण जन्मभूमि में अभिषेक करेंगे। मथुरा के रामलीला मैदान और वृंदावन में वैष्णो देवी मंदिर के पास सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। त्योहार के साथ−साथ आदित्यनाथ की यात्रा के लिए भी विशेष सुरक्षा व्यवस्था की गई है।

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इसी के साथ योगी सरकार प्रदेशभर में भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी धूमधाम से मनाएगी। जन्माष्टमी उत्सव 25 अगस्त तक चलेगा। उत्सव में इंडोनेशिया, मलेशिया के अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों के साथ असम, मणिपुर और गुजरात के कलाकार भी प्रस्तुति देंगे। कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश और बिहार के 1000 से ज्यादा लोक कलाकार भी विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति देंगे। आठ दिवसीय इस आयोजन के मुख्य आर्कषण में नई दिल्ली स्थित श्रीराम भारतीय कला केंद्र के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली 'कृष्ण लीला' भी शामिल है।

 

-अजय कुमार

 

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