By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 14, 2026
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को कहा कि यदि भारत की आजादी के समय नरेन्द्र मोदी, भारत के प्रधानमंत्री रहे होते तो कोई भी भारत को नुकसान नहीं पहुंचा सका होता था। योगी ने यह भी कहा कि यदि सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसा व्यक्ति उस समय प्रधानमंत्री होता तो कोई भी भारत को खंडित नहीं कर पाता। मुख्यमंत्री ने देश के विभाजन और उस समय हुए नरसंहार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया।
मुझे आश्चर्य होता है कि जो जमीन पाकिस्तान समर्थकों ने नहीं मांगी.. पंजाब की जमीन या बंगाल की जमीन, पाकिस्तान को जबरदस्ती दे दी गई।” उन्होंने कहा कि सिंध एक हिंदू बाहुल और सिंधियों के दबदबे वाला क्षेत्र था जिसे जबरदस्ती पाकिस्तान को दे दिया गया। इसी तरह से पंजाबियों के प्रभुत्व वाला पंजाब भी दे दिया गया। बंगाल पर बंगालियों का प्रभुत्व था।
सभी हिंदू गांव जबरदस्ती बांग्लादेश को दे दिए गए। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह शर्मनाक हरकत कांग्रेस ने की जो सत्ता के लिए बेताब थी और जिस पर देश ने भरोसा किया था। इसने उस भरोसे का बदला धोखे से दिया।
आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि जो लोग 1947 में चुप रहे, जिनकी आवाज तब भी नहीं उठी, उनकी नजर सत्ता पर थी। उन्होंने देश की कीमत पर सत्ता हासिल करने की कोशिश की और आज भी उनके काम वैसे ही हैं। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के संदर्भ में उन्होंने कहा, “आपने कुछ दिनों पहले बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले देखे।
तब भी यह पार्टी चुप रही। उन्हें भय है कि बांग्लादेश में इन घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने से यहां उनका वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। उनके लिए दलित हिंदुओं की हत्या कोई मायने नहीं रखती।
उनके लिए उनका वोट बैंक मायने रखता है।” मुख्यमंत्री ने कहा, “वे भविष्य में भी चुप बने रहेंगे क्योंकि उनकी प्राथमिकता, उनके निहित स्वार्थों के लिए सत्ता हासिल करना है। वे इस देश के साथ गद्दारी कर रहे हैं जैसा कि वह पूर्व में कर चुके हैं। इसी इरादे से उन्होंने अराजकता फैलाई है।” इस अवसर पर, आदित्यनाथ ने कहा कि यह देश आपसी लड़ाई झगड़ों, जाति, धर्म और के आधार पर बंटवारे के कारण गुलाम बना।
जब इस तरह की आपसी कलह होती है तो साजिश आसानी से पनप जाती है। उन्होंने कहा, “भारत के विभाजन की कीमत चुकानी पड़ी, निर्दोष नागरिकों को कीमत चुकानी पड़ी, भारत आज तक नक्सलवाद, माओवाद या उग्रवाद के रूप में इसकी कीमत चुका रहा है। हालांकि, यह 1947 से पूर्व की उस चुप्पी की ओर भी हमारा ध्यान खींचता है जो अब भी बनी हुई है।” मुख्यमंत्री ने कहा, “आज भी ये लोग समाज के सामने ऐसा अभिनय कर रहे हैं मानो उन्होंने ही भारत का निर्माण किया और उनके बिना भारत का अस्तित्व नहीं होता।
यह सचमुच एक अजीब स्थिति है।” आदित्यनाथ ने विभाजन को मानवता के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक बताते हुए कहा कि इस देश की आजादी के लिए बलिदान देने वाले क्रांतिकारी भुला दिए गए, जबकि सत्ता और स्वार्थ के लिए देश का बंटवारा करवाने लोग सबसे प्रमुख व्यक्ति बन गए। उन्होंने कहा, “इस देश में हर संस्थान का नाम उसी कुल के नाम पर रखा गया और हम सभी चुपचाप खड़े रहकर इसे देखते रहे। आज भी वे क्या कर रहे हैं।
अब उनके कार्य क्या हैं।” सीएए (नागरिक संशोधन विधेयक) के संदर्भ में आदित्यनाथ ने कहा कि उस कानून के विरोध का कोई औचित्य नहीं था। उस कानून में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के संबंध में प्रावधान थे जो कभी अखंड भारत का हिस्सा थे। इसमें कहीं नहीं कहा गया कि हम मुस्लिमों, कांग्रेस या समाजवादी पार्टी की जमीन जब्त करेंगे।
फिर भी देशभर में आंदोलन भड़काने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा, “आपने लखनऊ, कानपुर, मेरठ, संभल, अलीगढ़, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में आगनजी के प्रयास देखे। सौभाग्य से प्रदेश में डबल इंजन की सरकार थी।
कल्पना करें कि यदि सपा सत्ता में रही होती तो प्रदेश कभी उन दंगों की आग से उबर नहीं पाता।” आदित्यनाथ ने कहा, “हम पूछते रहे कि इस विरोध का क्या कारण है। यदि भारत सरकार विस्थापित हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों और पारसियों को जमीन और नागरिकता देकर उनका पुनर्वास करना चाहती है तो आपको क्या दिक्कत है। फिर भी विपक्ष अड़ा रहा और पर्दे के पीछे कांग्रेस और सपा का मजबूत समर्थन था।” मुख्यमंत्री ने पार्टी के अन्य नेताओं के साथ लखनऊ में विभाजन विभीषिका के मौके पर निकाले गए मौन मार्च में हिस्सा लिया।
यह मार्च सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा से लोक भवन तक निकाला गया।