'भारत छोड़ो' आंदोलन नारा यूसुफ मेहर अली ने दिया था

By बाल मुकुन्द ओझा | Jul 02, 2021

आज दो जुलाई को कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक यूसुफ मेहर अली की पुण्य तिथि है। प्रसिद्ध समाजवादी स्वतंत्रता सेनानी और मुंबई के तत्कालीन मेयर यूसुफ मेहर अली ने 1942 में 'भारत छोड़ो' के नारे के साथ ही 'साइमन गो बैक' का क्रन्तिकारी नारा दिया था। आज की पीढ़ी के लोग उन्हें नहीं जानते। मगर यह सत्य है की वे जेपी और लोहिया के साथ अग्रिम पंक्ति के नेताओं में वे शुमार किये जाते थे। स्वतंत्रता आंदोलन में उनका बहुत बड़ा योगदान था जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। बिजनेस घराने से जुड़े युसूफ ने गरीबों और मजदूरों के लिए संघर्ष किया। यूसुफ मेहर अली जाने माने स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे।

कालेज में फीस वृद्धि और बेंगलौर में छात्रों पर पुलिस की गोलीबारी के विरोध तथा हड़ताली मिल मजदूरों के समर्थन में जनसभाएं आयोजित कर यूसुफ ने अपनी संगठन क्षमता का परिचय दिया। उनकी क्षमताओं से घबराई ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने तक से रोक दिया। जब भारत को कुछ अधिकार दिए जाने की बात सामने आई तो उसके लिए साइमन की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया गया। यूसुफ इस आयोग के एकमात्र भारतीय सदस्य थे। दिसंबर 1927 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साइमन कमीशन के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया। 3 फरवरी, 1928 की रात में बंबई के मोल बंदरगाह पर पानी के जहाज से साइमन कमीशन के सदस्य उतरे। तभी समाजवादी नौजवान यूसुफ मेहर अली ने नारा लगाया साइमन गो बैक का नारा दिया। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने प्रदर्शनकारियों पर जमकर लाठी बरसाईं।

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1942 में जब ये लाहौर की जेल में थे तब इनको बॉम्बे मेयर चुनाव के लिए मनोनीत किया। चुनाव में भाग लेने के लिए युसूफ को रिहा किया गया और इन्होंने बड़ी आसानी से बॉम्बे नगरपालिका का चुनाव जीत लिया। स्वतंत्रता के लिए भारत के अंतिम राष्ट्रव्यापी अभियान के लिए उन्होंने 'भारत छोड़ो' नारा दिया था। युसूफ मेहर अली ने 'भारत छोड़ो' के नारे के साथ ही 'साइमन गो बैक' का भी नारा दिया था।  

'भारत छोड़ो आंदोलन' देश का सबसे बड़ा आंदोलन था जिसकी वजह से अंग्रेज भारत छोड़ने पर मजबूर हो गए थे। यह आंदोलन ऐसे समय प्रारंभ किया गया जब दुनिया काफी बदलावों के दौर से गुजर रही थी। यही नहीं उन्होंने मजदूर व किसानों के संगठनों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद नमक आंदोलन (दांडी सत्याग्रह) शुरू हुआ, जिसमें युसूफ बड़ी जोश खरोश के साथ कूद पड़े।  इस आन्दोलन में कई कांग्रेस नेताओं को जेल हो चुकी थी, लेकिन युसूफ ने लगातार तब तक इस आंदोलन को जारी रखा, जब तक की वह जेल नहीं चले गए। फिर 1930 में इनको गिरफ्तार किया गया और 4 माह की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

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