By नीरज कुमार दुबे | Aug 01, 2026
फिल्म 'धुरंधर' का पर्दा उठता है। कैमरा कराची के कुख्यात लियारी की तंग गलियों में दौड़ता है। सड़क किनारे बैठा एक शख्स, चारों तरफ सन्नाटा, तभी अचानक मोटरसाइकिल पर सवार दो नकाबपोश आते हैं। गोलियों की तड़तड़ाहट से खामोशी चकनाचूर हो जाती है। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागते हैं, हमलावर हवा में धुआं छोड़ते हुए फरार हो जाते हैं और सड़क पर खून से लथपथ पड़ा शख्स अपनी जिंदगी की जंग लड़ रहा होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि पाकिस्तान के सबसे बदनाम गैंगस्टर परिवारों में से एक की असल कहानी है, जिसने एक बार फिर लियारी की खूनी विरासत को सुर्खियों में ला दिया है।
घटना के तुरंत बाद जुबैर और दोनों घायलों को सिविल हॉस्पिटल कराची ले जाया गया, जहां जुबैर की आपातकालीन सर्जरी की गई। पुलिस के मुताबिक हमलावर उस समय भाग निकले, जब पास के एक दुकानदार ने जवाबी फायरिंग कर दी। घटना के बाद सामने आए सीसीटीवी फुटेज में सड़क पर अफरा-तफरी और हमलावरों के फरार होने का दृश्य साफ दिखाई देता है।
चाकीवाड़ा पुलिस और दक्षिण कराची के डीआईजी सैयद असद रजा के अनुसार मामले की कई कोणों से जांच की जा रही है। शुरुआती जांच में व्यक्तिगत दुश्मनी, पुरानी गैंगवार और आपराधिक रंजिश जैसे पहलुओं को खंगाला जा रहा है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या यह हमला जुबैर के पुराने आपराधिक इतिहास से जुड़ा है या किसी नए विवाद का नतीजा।
हम आपको बता दें कि जुबैर बलोच का आपराधिक रिकॉर्ड भी कम चर्चित नहीं रहा है। वर्ष 2012 में उसे सात आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किया गया था। लंबे समय तक जेल में रहने के बाद जनवरी 2025 में उसकी रिहाई हुई थी। पुलिस अब यह जांच कर रही है कि जेल से बाहर आने के बाद उसकी गतिविधियां किन लोगों के निशाने पर आ गई थीं।
दूसरी ओर, इस हमले ने एक बार फिर पाकिस्तान के कुख्यात गैंगस्टर उजैर बलोच की यादें ताजा कर दी हैं। उजैर वही शख्स है जिसने अपने चचेरे भाई और लियारी के खूंखार डॉन रहमान डकैत की 2009 में पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद पूरे गैंग की कमान संभाल ली थी। उसके नेतृत्व में लियारी लंबे समय तक खून-खराबे, रंगदारी, ड्रग तस्करी और राजनीतिक संरक्षण के दम पर चलने वाले संगठित अपराध का सबसे बड़ा अड्डा बना रहा।
उजैर बलोच पर हत्या, पुलिस पर हमले, विस्फोटक रखने और संगठित अपराध सहित कई गंभीर मामले दर्ज हैं। मार्च 2026 में आतंकवाद निरोधी अदालत ने 2012 में कानून-व्यवस्था बलों पर हथियारों और विस्फोटकों से किए गए हमले से जुड़े सात मामलों में उसकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इससे पहले अप्रैल 2020 में एक सैन्य अदालत ने उसे जासूसी के आरोप में दोषी ठहराते हुए 12 साल की सजा सुनाई थी। वह फिलहाल जेल में बंद है।
दरअसल, लियारी की कहानी केवल अपराध की नहीं, बल्कि सत्ता, राजनीति और गैंगस्टरों के गठजोड़ की भी रही है। दशकों तक यह इलाका ड्रग तस्करी के रास्तों और रंगदारी के धंधे को लेकर खूनी गैंगवार का केंद्र बना रहा। रहमान डकैत और उसके कट्टर प्रतिद्वंद्वी अरशद पप्पू के बीच चली हिंसक लड़ाइयों ने लियारी की गलियों को युद्धक्षेत्र में बदल दिया था। बाद में विभिन्न राजनीतिक समूहों के संरक्षण ने इन गैंगों को और ताकत दी, जिससे पुलिस के लिए कार्रवाई करना बेहद मुश्किल हो गया।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि जुबैर बलोच पिछले कुछ महीनों से एक राजनीतिक दल से जुड़ा था और इलाके में उस पार्टी के झंडे भी लगाए गए थे। वहीं, लियारी में यह चर्चा भी तेज है कि कराची ऑपरेशन के दौरान दुबई और ईरान भागे कई पुराने गैंगस्टर अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद फिर लौट आए हैं। इन खबरों ने स्थानीय लोगों के बीच डर पैदा कर दिया है कि कहीं लियारी एक बार फिर पुराने खूनी दौर में न लौट जाए।
फिलहाल पुलिस हमलावरों की तलाश में छापेमारी कर रही है, लेकिन जुबैर बलोच पर हुआ यह हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं माना जा रहा। यह उस लियारी की दहशतभरी यादों को फिर जिंदा कर रहा है, जिसने कभी पाकिस्तान के सबसे खूनी गैंगवार का चेहरा देखा था। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत दुश्मनी का मामला है या फिर लियारी में अंडरवर्ल्ड का वह खौफनाक अध्याय दोबारा खुलने वाला है, जिसकी गूंज आज भी कराची की तंग गलियों में सुनाई देती है?