22 अरब देशों के विदेश मंत्रियों को दिल्ली बुलाकर मोदी ने दुनिया हिला दी, अपना खेल बिगड़ते देख US-China-Pakistan हैरान

By नीरज कुमार दुबे | Jan 30, 2026

दिल्ली इन दिनों केवल भारत की राजधानी नहीं बल्कि एशिया, अफ्रीका और पश्चिम एशिया की कूटनीतिक धुरी बन चुकी है। दस वर्ष के लंबे अंतराल के बाद भारत में आयोजित हो रही भारत अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक ने यह साफ कर दिया है कि भारत अब वैश्विक शक्ति संतुलन को दिशा देने वाला देश बन चुका है। विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा अरब लीग के महासचिव अहमद अबुल गैत से हुई मुलाकात और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अरब देशों के विदेश मंत्रियों की मेजबानी गहरी रणनीतिक मंशा का स्पष्ट संकेत है।


अरब लीग के महासचिव अहमद अबुल गैत का नई दिल्ली आगमन और उनके सम्मान में उच्चस्तरीय वार्ताएं इस बात का प्रमाण हैं कि भारत और अरब जगत के रिश्ते अब ऊर्जा और व्यापार से आगे बढ़कर सुरक्षा, शिक्षा, तकनीक और वैश्विक राजनीति तक फैल चुके हैं। जयशंकर और गैत के बीच बातचीत में क्षेत्रीय हालात पर खुले और स्पष्ट विचारों का आदान प्रदान हुआ। पश्चिम एशिया में अस्थिरता, आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं की चुनौतियों पर भारत की भूमिका को अरब देशों ने गंभीरता से सुना।


हम आपको बता दें कि 31 जनवरी को होने वाली भारत, अरब विदेश मंत्रियों की बैठक की सह अध्यक्षता भारत और संयुक्त अरब अमीरात कर रहे हैं। यह अपने आप में कूटनीतिक संदेश है कि भारत अब खाड़ी क्षेत्र में भरोसेमंद, साझेदार और संतुलनकारी शक्ति के रूप में स्वीकार किया जा चुका है। यह पहली बार है जब यह बैठक भारत में हो रही है और सभी 22 अरब देशों की भागीदारी सुनिश्चित हुई है। इससे पहले 2016 में बहरीन में पहली बैठक हुई थी जिसमें अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति को सहयोग के पांच मुख्य स्तंभ माना गया था।

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इन दस वर्षों में दुनिया बदल चुकी है। ऊर्जा बाजारों में उथल पुथल है, समुद्री मार्गों पर खतरे हैं, आतंकवाद के नए स्वरूप सामने आए हैं और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था आकार ले रही है। ऐसे समय में भारत और अरब देशों का एक मंच पर आना वैश्विक राजनीति के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। हम आपको बता दें कि भारत अरब व्यापार 2400 अरब डालर से अधिक का हो चुका है। भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग आधी जरूरत और रसोई गैस की भारी मात्रा अरब देशों से आयात करता है।


दूसरी ओर अरब देशों में बसे नब्बे लाख से अधिक भारतीय प्रवासी वहां की अर्थव्यवस्था और समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। यह मानवीय सेतु भारत को अरब दुनिया से भावनात्मक और रणनीतिक रूप से जोड़ता है। यही कारण है कि जब भारत पर आतंकवादी हमले हुए तब अरब लीग ने खुलकर भारत के साथ एकजुटता दिखाई। पहलगाम आतंकी हमले की निंदा और भारत के प्रति समर्थन केवल औपचारिक बयान नहीं बल्कि भरोसे की मुहर थी।


हम आपको बता दें कि भारत और अरब लीग के बीच संस्थागत संवाद की नींव 2002 में रखी गई थी और 2008 में अरब भारत सहयोग मंच बना था। इसके बाद शिक्षा, ऊर्जा, मीडिया और संस्कृति के क्षेत्र में निरंतर पहल हुई। हाल ही में नई दिल्ली में अरब भारत विश्वविद्यालय प्रमुखों का सम्मेलन हुआ जिसमें उच्च शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी और जैव प्रौद्योगिकी जैसे विषयों पर गहन मंथन हुआ। यह दिखाता है कि रिश्ता केवल तेल और पैसे का नहीं बल्कि ज्ञान और भविष्य का भी है।


देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर द्वारा अरब देशों के विदेश मंत्रियों की अगवानी दरअसल भारत की नई वैश्विक सोच का ऐलान है। यह संदेश है कि भारत अब किसी एक धड़े का पिछलग्गू नहीं बल्कि अपने हितों और मूल्यों के साथ खड़ा स्वतंत्र शक्ति केंद्र है। पश्चिम एशिया में भारत की सक्रियता यह बताती है कि नई दिल्ली अब अपनी अलग कूटनीतिक लकीर खींच रही है। अरब देशों के लिए भारत स्थिरता का प्रतीक है। लोकतंत्र, आर्थिक विकास और आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट रुख भारत को भरोसेमंद बनाता है। वहीं भारत के लिए अरब जगत ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों और ग्लोबल साउथ की राजनीति में साझेदार है। इस मेल का सामरिक असर दूरगामी है। हिंद महासागर से भूमध्य सागर तक भारत की उपस्थिति मजबूत होगी तो चीन की एकाधिकारवादी चालों पर अंकुश लगेगा और आतंकवाद के खिलाफ साझा मोर्चा बनेगा।


इसके अलावा, अरब देशों के विदेश मंत्रियों की दिल्ली में हो रही बैठक का असर केवल भारत और अरब जगत तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी गूंज वाशिंगटन, बीजिंग और इस्लामाबाद तक साफ सुनाई दे रही है। अमेरिका के लिए यह संकेत है कि भारत अब पश्चिम एशिया में केवल उसका सहयोगी भर नहीं बल्कि एक स्वतंत्र और संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभर रहा है जो अरब देशों से सीधे संवाद कर क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। इससे अमेरिकी एकाधिकार वाली मध्य पूर्व नीति को चुनौती मिलती है और वाशिंगटन को भारत को बराबरी के रणनीतिक भागीदार के रूप में देखने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वहीं चीन के लिए दिल्ली की यह बैठक ज्यादा असहज करने वाली है क्योंकि अरब दुनिया में उसका प्रभाव अब तक निवेश और कर्ज कूटनीति के भरोसे बढ़ा है जबकि भारत भरोसे, संस्कृति, प्रवासी शक्ति और राजनीतिक संतुलन के साथ आगे बढ़ रहा है। यह भारत की उस रणनीति को मजबूत करता है जो हिंद महासागर से लेकर पश्चिम एशिया तक चीन की आक्रामक मौजूदगी पर लगाम लगाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। साथ ही पाकिस्तान के लिए यह बैठक खुला झटका है क्योंकि वह वर्षों से खुद को इस्लामी दुनिया का स्वाभाविक प्रतिनिधि बताता रहा है। अरब विदेश मंत्रियों की दिल्ली में मौजूदगी और भारत के साथ खुला संवाद यह साफ करता है कि कश्मीर और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान की कथा अब अरब देशों में प्रभावहीन हो चुकी है और नई दिल्ली को क्षेत्रीय स्थिरता और आतंकवाद विरोध की विश्वसनीय आवाज के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।


हम आपको यह भी बता दें कि इसी महीने यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान की भारत यात्रा ने भारत अरब रिश्तों को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया है, उसका प्रत्यक्ष विस्तार भी दिल्ली बैठक कही जा सकती है। उस यात्रा के दौरान ऊर्जा, निवेश, रक्षा सहयोग, खाद्य सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और भविष्य की अर्थव्यवस्था को लेकर जो ठोस सहमति बनी थी उसने भारत और यूएई को केवल मित्र नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदार के रूप में स्थापित कर दिया। यही कारण है कि भारत अरब विदेश मंत्रियों की बैठक की सह अध्यक्षता यूएई के साथ कर रहा है। देखा जाये तो यूएई की सक्रिय भूमिका ने अरब जगत को यह संदेश दिया है कि भारत के साथ साझेदारी सुरक्षित, लाभकारी और दीर्घकालिक है। शेख मोहम्मद बिन जायद की भारत यात्रा ने यह साबित कर दिया था कि नई दिल्ली अब केवल संवाद का मंच नहीं बल्कि फैसलों का केंद्र है और उसी सफलता की बुनियाद पर आज पूरी अरब दुनिया भारत के साथ एक साझा रणनीतिक भविष्य की ओर कदम बढ़ा रही है।


बहरहाल, मोदी और जयशंकर दुनिया को यह भी संदेश दे रहे हैं कि भारत संवाद में विश्वास करता है। अरब विदेश मंत्रियों की दिल्ली में मौजूदगी बताती है कि भारत की बात सुनी जा रही है। यह नया भारत है जो आत्मविश्वास से भरा है, आक्रामक भी है और संतुलित भी। यही कूटनीति आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक नेतृत्व प्रदान करेगी।

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