By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | May 20, 2026
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पिछले दिनों देशवासियों से किये गए सात आग्रहों में से एक आग्रह रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत तक कमी लाने का आग्रह है। इसमें कोई दो राय नहीं कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुध उपयोग के दुष्परिणामों को लेकर गत कई सालों से गंभीर आग्रह किये जा रहे हैं। प्रति हैक्टेयर कृषि उत्पादन सेचुरेशन स्तर पर पहुंच गया है तो मिट्टी की उर्वरा शक्ति को नुकसान पहुंच रहा है, मिट्टी और जल प्रदूषण उच्च स्तर पर पहुंच गया है तो रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से केंसर जैसी बीमारियों का दायरा बहुत अधिक बढ़ गया है। होना तो यहां तक लग गया है कि अत्यधिक खाद्यान्न उत्पादन वाले किसान और प्रदेश अपने दैनिक उपभोग के लिए जैविक खाद्यान्न या अन्य प्रदेशों के खाद्यान्न के उपयोग पर जोर देने लगे हैं। इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि देश में लाख प्रयासों के बावजूद रासायनिक उर्वरकों का आयात लगातार बढ़ता जा रहा है। विदेशों से 979 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात में से ईंधन के बाद बहुत अधिक आयात राशि उर्वरकों पर भी व्यय होती है। देश में करीब 600 लाख टन उर्वरकों की खपत है तो 2030 तक 700 से 800 लाख टन तक पहुंचने की संभावना व्यक्त की जा रही है। तस्वीर का एक पक्ष यह है कि रासायनिक उर्वरकों में देश की मांग के शत-प्रतिशत पोटाश की विदेषों से आयात पर निर्भरता है तो फास्फेट के तकरीबन 90 प्रतिशत और यूरिया के करीब 25 प्रतिशत तक आयात पर निर्भरता है। मजे की बात यह भी है कि यूरिया की आयात निर्भरता तो करीब 25 प्रतिशत तक है पर यूरिया उत्पादन के लिए काम में आने वाली प्राकृतिक गैस की जरुरत करीब 80 प्रतिशत तक विदेशों से आयात से ही संभव हो पाती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार रासायनिक उर्वरकों पर दो लाख करोड़ के आसपास अनुदान राषि दी जा रही है।
एक बात तो लगभग सबके संज्ञान में आ गई है कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण खेतों की मिट्टी की उपजाउ क्षमता प्रभावित हो रही है तो भूजल का अत्यधिक दोहन होने से भू जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है वहीं रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के कारण खतरनाक स्तर पर प्रदूषित हो रहा है। जैविक विविधता प्रभावित हो रही है तो खेती के सहायक कीटनाशकों का अस्तित्व ही समाप्त होने को है। इसके अलावा खाद्यान्नों के विषैला होने व इन खाद्यान्नों के उपयोग से बीमारियों का दायरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इतना सबकुछ होने के बावजूद रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी ही हो रही है। 2025-26 के आंकड़़ों की ही बात करें तो यूरिया में 138 प्रतिशत, डीएपी के उपयोग में 94 प्रतिशत और एनपीके के उपयोग में 83 प्रतिशत के आसपास बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में प्रधानमंत्री के आग्रह के निहितार्थ को समझना होगा।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आग्रह इस मायने में बहस का मुद्दा नहीं होना चाहिए कि सरकार देश की जरुरतों को पूरा नहीं कर पा रही। अपितु गंभीर चिंतन की बात यह है कि हम परंपरागत खेती या जैविक खेती को बढ़ावा देकर आने वाली पीढ़ी और जल-मिट्टी, वायु के प्रदूषण को कम करने में भागीदार बन सकते हैं। केवल 10 प्रतिशत फर्मिंटेड खाद मिलाने से ही बहुत बड़ा सकारात्मक बदलाव देखा जा सकता है। 50 प्रतिशत तक आयात निर्भरता कम की जा सकती है। आज हम रुस, ओमान, सउदी अरब, मोरक्को, चीन आदि पर उर्वरकों के आयात के लिए निर्भर है। और अरबो डालर आयात पर खर्च करके भी प्रदूषण और सेहत से खिलवाड़ पा रहे हैं। हांलाकि आज अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आसन्न संकट को देखते हुए दूरदृष्टि पूर्ण 7 आग्रहों को प्रतिपक्ष आलोचना के स्तर पर ले रहा है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि पीएम प्रणाम कार्यक्रम जून 23 से चलाया जा रहा है तो पीएमबीजेयूआर कार्यक्रम जो कि खेत की मिट्टी की जांच से जुड़ा कार्यक्रम है वर्षों से जारी है। इसके साथ ही आज कृषि वैज्ञानिक बार बार आग्रह कर रहे हैं कि उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग घातक स्तर पर पहुंच रहा है। पंजाब और उससे सटते इलाकों में खेती के हालात बयां कर रहे हैं। ऐसे में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत कमी के आग्रह को सकारात्मक लिया जाना चाहिए। इस बहाने हमें खेती को सही दिशा देने का अवसर मिला है। खरीफ की बुवाई में ही इस पर अमल किया जा सकता है। खेती और पर्यावरण से जुड़े सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को प्रोएक्टिव रोल अपनाते हुए आगे आना होगा। यह एक अवसर मिला है और इस अवसर का सकारात्मक उपयोग को देश की खेती किसानी को नई दिशा दी जा सकती है।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा