By नीरज कुमार दुबे | Feb 05, 2026
भारत और अमेरिका के बीच हाल में हुए व्यापार समझौते के बाद दोनों देश अब रणनीतिक संसाधनों के मोर्चे पर भी कदमताल तेज करते दिख रहे हैं। बदलती वैश्विक व्यवस्था में अति महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर जिस तरह प्रतिस्पर्धा और चिंता बढ़ी है, उसने बड़े देशों को नई साझेदारियां गढ़ने पर मजबूर कर दिया है। ऐसे समय में भारत की सक्रिय भागीदारी यह संकेत देती है कि वह भविष्य की प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और औद्योगिक ढांचे से जुड़े संसाधनों की दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता, बल्कि नियम बनाने वालों में शामिल होना चाहता है।
बैठक की मेजबानी अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने की। इसमें 55 देशों के प्रतिनिधि जुटे, जिससे यह साफ हुआ कि खनिज अब केवल औद्योगिक जरूरत नहीं, बल्कि सामरिक शक्ति का आधार बन चुके हैं। जयशंकर ने कहा कि अत्यधिक केंद्रीकरण और असंतुलित आपूर्ति व्यवस्था आने वाले समय में दुनिया को असुरक्षित बना सकती है, इसलिए साझेदारी आधारित ढांचा जरूरी है। भारत ने अपने कदम भी गिनाए। विदेश मंत्री ने बताया कि देश ने राष्ट्रीय अति महत्वपूर्ण खनिज अभियान शुरू किया है, दुर्लभ मृदा तत्व गलियारों के विकास पर काम हो रहा है और जिम्मेदार व्यापार को बढ़ावा दिया जा रहा है। भारत ने खनिज आपूर्ति सहयोग से जुड़ी एक बहुपक्षीय पहल का भी समर्थन जताया, जिसका लक्ष्य सहभागी देशों के बीच खोज, खनन और प्रसंस्करण में तालमेल बढ़ाना है।
वाशिंगटन प्रवास के दौरान जयशंकर ने मार्को रुबियो से अलग मुलाकात कर खनिज खोज, खनन और प्रसंस्करण में द्विपक्षीय सहयोग को औपचारिक रूप देने पर चर्चा की। दोनों पक्षों ने व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, रक्षा, अति महत्वपूर्ण खनिज और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। साझा हितों को गति देने के लिए विभिन्न तंत्रों की जल्द बैठक कराने पर भी सहमति बनी।
अमेरिकी पक्ष ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुए व्यापार समझौते का दोनों मंत्रियों ने स्वागत किया। इस समझौते के तहत पारस्परिक शुल्क में कमी का रास्ता खुला है, जिससे व्यापारिक माहौल को बल मिलने की उम्मीद है। दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक देश मिलकर नई आर्थिक संभावनाएं खोल सकते हैं और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं।
मुलाकात के अंत में दोनों देशों ने चार मंचों के माध्यम से द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। हिंद प्रशांत क्षेत्र को समृद्ध और स्थिर बनाए रखना साझा हितों के लिए अनिवार्य बताया गया। जयशंकर ने कनाडा, सिंगापुर, नीदरलैंड, इटली, मलेशिया, बहरीन, मंगोलिया, पोलैंड, रोमानिया, इसराइल और उजबेकिस्तान के अपने समकक्षों से भी बातचीत की, जिससे साफ है कि भारत खनिज कूटनीति को बहुआयामी दिशा दे रहा है।
हम आपको बता दें कि अति महत्वपूर्ण खनिज जैसे लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्व स्वच्छ ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, सूचना उपकरण और रक्षा प्रणालियों की रीढ़ हैं। इनकी आपूर्ति पर पकड़ का मतलब है भविष्य की अर्थव्यवस्था और युद्ध क्षमता पर पकड़। ऐसे में भारत का सक्रिय रुख यह दर्शाता है कि नई वैश्विक व्यवस्था में खनिज कूटनीति शक्ति संतुलन का प्रमुख औजार बनने जा रही है।
खनिजों की इस दौड़ को केवल व्यापार की नजर से देखना भूल होगी। यह असल में नई सदी की सामरिक शतरंज है। जिसने लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्वों की नस पकड़ी, वही ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और रक्षा के भविष्य को दिशा देगा। अब तक कुछ देशों ने इन संसाधनों और उनके प्रसंस्करण पर ऐसा प्रभुत्व बनाया कि पूरी दुनिया उनकी ओर ताकती रही। यह स्थिति किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए असहज है।
भारत का हालिया रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह निर्भर उपभोक्ता की छवि से बाहर निकलकर निर्णायक भागीदार बनना चाहता है। अगर भारत समय रहते खोज, खनन, प्रसंस्करण और भंडारण का सशक्त ढांचा खड़ा कर लेता है, तो वह न केवल अपनी जरूरतें सुरक्षित करेगा बल्कि मित्र देशों के लिए भरोसेमंद स्रोत भी बन सकता है। इससे उसकी भू राजनैतिक हैसियत भी बढ़ेगी। पर चुनौती आसान नहीं है। खनन में पर्यावरण, स्थानीय समुदाय और लागत जैसे सवाल हैं। साथ ही वैश्विक शक्ति संघर्ष भी है, जहां संसाधन अक्सर दबाव के औजार बनते हैं। भारत को आक्रामक लेकिन संतुलित नीति अपनानी होगी, जिसमें राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हों और दीर्घकालिक रणनीति स्पष्ट हो। इसमें कोई दो राय नहीं कि आने वाले दशकों की ताकत तेल से नहीं, खनिजों से मापी जाएगी। जो आज तैयारी करेगा, वही कल नियम बनाएगा। भारत ने इरादा दिखाया है, अब उसे रफ्तार और दृढ़ता भी दिखानी होगी।
बहरहाल, कुल मिलाकर यह साफ है कि अति महत्वपूर्ण खनिज अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रहे, बल्कि कूटनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन के केंद्र में आ चुके हैं। भारत और अमेरिका के बीच इस विषय पर बढ़ता सहयोग आने वाले वर्षों में नई रणनीतिक धुरी बना सकता है, जिसका असर हिंद प्रशांत से लेकर यूरोप और पश्चिम एशिया तक दिखेगा। यदि यह साझेदारी ठोस परियोजनाओं और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलती है, तो यह न केवल दोनों देशों बल्कि व्यापक वैश्विक बाजार की दिशा भी तय कर सकती है।