78 साल का इतिहास... इज़राइल में कभी किसी पार्टी को नहीं मिला पूर्ण बहुमत, क्या इस चुनाव में बदलेगा पुराना इतिहास?

By अभिनय आकाश | Oct 27, 2026

27 अक्टूबर 2026 यानी आज ही के दिन इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सबसे बड़ी परीक्षा है। 68 लाख इजरायली वोटर्स नई सरकार चुनने के लिए वोट डाल रहे हैं। गाजा और ईरान वॉर के बीच यह इजरायल का पहला चुनाव है। दोनों मोर्चों पर नेतन्याहू कहीं ना कहीं असफल रहे हैं। पहले वो हमास का हमला रोकने में नाकाम रहे। फिर ईरान की बारी आई। लेकिन वो ना तो तख्ता पलट करा आ पाए और ना ही न्यूक्लियर प्रोग्राम बंद हुआ। उल्टा ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ताला लगा दिया है। इसके अलावा नेतन्याहू पर घूसखोरी और पद के दुरुपयोग से जुड़े मुकदमे चल रहे हैं। उनके कई अफसर जांच के दायरे में हैं। कई पुराने अफसरों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। नेतन्याहू की विरोधी पार्टियों ने आपस में हाथ मिल लिया है। जबकि सहयोगी पार्टियां उनसे किनारा करने लगी हैं। इलेक्शन पोल्स में नेतन्याहू की हार तय बताई जा रही है। चर्चा है कि इस बार उनका करियर खत्म हो सकता है। लेकिन इन दावों में कुछ भी नया नहीं है। नेतन्याहू पिछले 30 वर्षों में से 20 बरस प्रधानमंत्री रहे हैं। पहली बार 1996 से 1999 तक दूसरी बार 2009 से 2021 तक और उनका तीसरा कार्यकाल दिसंबर 2022 में शुरू हुआ था। जब-जब उनको कुर्सी छोड़नी पड़ी तब-तब कहा गया कि उनकी वापसी नहीं होगी। मगर नेतन्याहू हर बार फिनिक्स की तरह राख से उगाए हैं। इसी वजह से लोग उनको किंग बीबी भी कहते हैं। लेकिन नेतन्याहू इतने ताकतवर बने कैसे? इजरायल की पॉलिटिक्स को उन्होंने कैसे बदला? नेतन्याहू का पावर पैटर्न क्या कहता है? इस चुनाव में उनकी पोजीशन कमजोर क्यों है? और क्या यह चुनाव उनका करियर खत्म कर सकता है? तमाम सवालों का एमआरआई स्कैन करते हैं।

सत्तारूढ़ गठबंधन और दक्षिणपंथी गुट

लिकुड: प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली पार्टी, जो गिदोन सार की 'न्यू होप' के साथ विलय कर एक संयुक्त राष्ट्रीय-रूढ़िवादी (national-conservative) सूची के तहत चुनाव लड़ रही है।

ओत्ज़्मा येहुदित: इतामार बेन-ग्विर के नेतृत्व वाली एक धुर-दक्षिणपंथी पार्टी सूची।

रिलिजियस ज़ायनिस्ट पार्टी – ज़ेहुत: बेज़लेल स्मोट्रिच (रिलिजियस ज़ायनिज्म) और मोशे फेग्लिन (ज़ेहुत) के नेतृत्व वाली एक संयुक्त सूची।

शास : आर्य देहरी के नेतृत्व वाली अति-रूढ़िवादी (अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स) सेफार्डिक पार्टी सूची।

यूनाइटेड टोरा जुडाइज्म : डेगेल हातोराह और अगुदत यिसराएल के बीच एक अति-रूढ़िवादी अश्केनाज़ी संयुक्त सूची, जिसका नेतृत्व याकोव अशर कर रहे हैं।

अमचा यिसराएल: इज़राइल रक्षा बलों (IDF) के पूर्व जनरल ओफ़र विंटर और कार्यकर्ता यूसुफ हद्दाद द्वारा गठित एक नई दक्षिणपंथी सूची।

नोआम: एवी माओज़ के नेतृत्व वाली एक धुर-दक्षिणपंथी और धार्मिक रूप से रूढ़िवादी सूची।

विपक्ष और मध्य-वामपंथी गुट

टुगेदर - बेयाचाद: नफ्ताली बेनेट के नए आंदोलन और यायर लापिड की 'येश अतिद' पार्टी को मिलाकर बनी एक मध्य-दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी संयुक्त सूची।

याशर!: पूर्व आईडीएफ (IDF) चीफ ऑफ स्टाफ गादी ईसेनकोट और पूर्व शिन बेट प्रमुख योरम कोहेन के नेतृत्व वाली एक व्यापक मध्यमार्गी सूची।

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अरब समुदाय की पार्टियां

द जॉइंट लिस्ट: यह एक संयुक्त चुनावी सूची है, जिसमें हदाश, ताअल और बलाद गुट शामिल हैं। इसका नेतृत्व यूसुफ जबरीन और अहमद तिबी करते हैं।

यूनाइटेड अरब लिस्ट (राआम): यह मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली एक इस्लामी अरब-इजरायली पार्टी है।

संसदीय व्यवस्था

इजरायल एक संसदीय लोकतंत्र है, जिसमें सत्ता के तीन मुख्य अंग हैं: विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका।

देश में एक-सदनीय संसद है, जिसमें 120 सदस्य होते हैं। नेसेट (इजरायली संसद) के सदस्यों (MKs) को पूरे देश से चार साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है।

कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास होती हैं। सरकार सीधे तौर पर नेसेट के विश्वास पर टिकी होती है और शासन चलाने के लिए उसे बहुमत (कम से कम 61 सीटें) बनाए रखना जरूरी होता है। न्यायपालिका, जिसका नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट करता है, स्वतंत्र रूप से काम करती है। यह बुनियादी कानूनों की व्याख्या करती है और कानूनों की समीक्षा करती है। इजरायल में राष्ट्रीय चुनावों का संचालन और देखरेख CEC (केंद्रीय चुनाव आयोग) द्वारा की जाती है। 

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चुनावी थ्रेशोल्ड


इज़राइल की 'पार्टी-लिस्ट आनुपातिक प्रतिनिधित्व' प्रणाली में 'चुनावी थ्रेशोल्ड' वह न्यूनतम प्रतिशत है जो किसी राजनीतिक दल को संसद में प्रवेश करने के लिए कुल राष्ट्रीय वोटों में से हासिल करना होता है। वर्तमान में यह सीमा 3.25% तय की गई है — यह मानक 2014 में नेसेट (इज़राइली संसद) के कानून द्वारा स्थापित किया गया था। इस सीमा को पार करने पर, किसी दल को नेसेट की कुल 120 सीटों में से कम से कम 4 सीटें मिल जाती हैं। यदि कोई दल 3.25% के इस आंकड़े तक नहीं पहुँच पाता है, तो उसे मिले सभी वोट रद्द कर दिए जाते हैं। इस तरह ये वोट 'बेकार' हो जाते हैं और इन्हें उन दलों के बीच फिर से बांट दिया जाता है जो सफल रहे हैं। इस थ्रेशोल्ड (सीमा) का मुख्य उद्देश्य संसद के अत्यधिक बिखराव को रोकना और बहुत छोटे दलों को बाहर रखकर, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाना है। इज़रायली डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता प्रो. ओफ़र केनिग बताते हैं कि 1951 में यह सीमा केवल 1% थी, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 1.5% (1992), 2% (2003) और अंततः 3.25% (2014) कर दिया गया। यह ऊँची सीमा छोटे वैचारिक समूहों या विशिष्ट दलों को चुनाव के दिन से पहले आपस में मिलकर एक साझा चुनावी सूची (इलेक्टोरल स्लेट) बनाने के लिए प्रेरित करती है, ताकि वे मिलकर इस थ्रेशोल्ड को पार कर सकें। वे आगे कहते हैं कि इस वजह से, 3.25% का यह नियम गठबंधन के समीकरण तय करने और यह निर्धारित करने में निर्णायक भूमिका निभाता है कि कौन-सा राजनीतिक गुट सरकार बना सकता है।

इज़राइल में कैसे बनती है सरकार? समझिए पूरी प्रक्रिया

इज़राइल के राजनीतिक इतिहास में आज तक किसी भी पार्टी को अपने दम पर 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। यही वजह है कि वहां हमेशा गठबंधन सरकार ही बनती आई है। ऐसे में पुराने और नए सहयोगियों को साधकर सरकार बनाने की प्रक्रिया में अक्सर काफी समय लगता है। मतदान के बाद केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) अंतिम परिणाम और सीटों के वितरण को प्रमाणित करती है। इसके बाद राष्ट्रपति उन सभी दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत करते हैं जिन्होंने चुनावी सीमा (इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड) पार की है। इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवारों पर राय लेना होता है।  दलों से विचार-विमर्श के बाद राष्ट्रपति उस उम्मीदवार को सरकार बनाने का न्योता (जनादेश) सौंपते हैं, जिसके पास 61 सीटों का जादुई आंकड़ा जुटाने की सबसे अधिक संभावना होती है। नामित उम्मीदवार को गठबंधन तैयार करने के लिए शुरुआत में 28 दिनों का समय दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति इसे 14 दिनों के लिए और बढ़ा सकते हैं। यदि पहला उम्मीदवार तय समय में बहुमत जुटाने में असमर्थ रहता है, तो राष्ट्रपति यह जनादेश किसी दूसरे उम्मीदवार को सौंप सकते हैं, जिसे 28 दिनों का समय मिलता है। गठबंधन समझौता तय होने के बाद, नामित प्रधानमंत्री अपनी नई सरकार, नीतिगत दिशा-निर्देशों और कैबिनेट मंत्रियों की सूची को संसद (नेसेट) के सामने औपचारिक विश्वास मत के लिए पेश करते हैं। संसद में कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन हासिल होते ही नई सरकार और उसके मंत्री पद की शपथ लेते हैं।

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