By ललित गर्ग | Oct 27, 2026
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे के विरोधी अवश्य होते हैं, लेकिन उनकी भाषा शत्रुता की नहीं, वैचारिक प्रतिस्पर्धा की होनी चाहिए। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की शक्ति हैं, पर जब ये मतभेद व्यक्तिगत कटाक्ष, पारिवारिक टिप्पणियों और अपमानजनक शब्दों में बदलने लगते हैं, तब राजनीति का स्तर गिरता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा प्रभावित होती है। भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति कांग्रेस के अनेक नेताओं की आक्रामक टिप्पणियों और अब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पटना में दिए गए विवादास्पद बयान ने एक बार फिर भाषाई मर्यादा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 25 अक्टूबर 2026 को पटना में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में खड़गे की एक टिप्पणी राजनीतिक विवाद का कारण बन गई। कार्यक्रम में उपस्थित एक व्यक्ति की टिप्पणी के जवाब में उन्होंने कहा, “मोदी का बाप भी जाएगा।” इस बयान की भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तीखी आलोचना की। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस टिप्पणी को वैचारिक संदर्भ में समझाने का प्रयास किया। समाचारों के अनुसार संबंधित व्यक्ति ने भी बाद में कहा कि उसकी पूरी बात नहीं सुनी गई थी। इस घटनाक्रम के विभिन्न पक्ष अपनी-अपनी व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं, लेकिन विवाद से अलग एक बुनियादी प्रश्न अपनी जगह कायम है-क्या देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर आसीन व्यक्ति के प्रति विरोध जताने का यही तरीका होना चाहिए?
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प्रियंका गांधी सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी मोदी और उनकी सरकार के विरुद्ध कई अवसरों पर तीखे राजनीतिक हमले किए हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि तीखी आलोचना अपने आप में अमर्यादित नहीं होती। सरकार की नीतियों, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक सद्भाव, लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रशासनिक निर्णयों पर कठोर सवाल उठाना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब नीतिगत असहमति को व्यक्तिगत अपमान से जोड़ दिया जाता है और तर्क के स्थान पर कटाक्ष को राजनीतिक प्रभाव का माध्यम बनाया जाने लगता है। किसी नेता के प्रत्येक बयान को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं, लेकिन बार-बार होने वाले विवादों से राजनीतिक भाषा के स्तर पर विचार करने की आवश्यकता अवश्य पैदा होती है। यहां कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती है। विपक्ष के रूप में उसकी सार्थकता इस बात से तय होगी कि वह जनता के जीवन से जुड़े प्रश्नों पर कितना प्रभावी विमर्श खड़ा करती है। किसानों की समस्याएं, युवाओं के रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक असमानता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर ठोस विकल्प प्रस्तुत करना उसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। यदि सार्वजनिक चर्चा बार-बार प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत टिप्पणियों तक सिमट जाती है, तो नीतिगत बहस पीछे छूटने का खतरा रहता है। इससे विपक्ष की आलोचना का वास्तविक आधार भी कमजोर पड़ सकता है। राजनीतिक विमर्श में मुद्दों की जगह व्यक्तियों को केंद्र में रख देने से लोकतंत्र को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता।
दूसरी ओर नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व और उनकी वैश्विक सक्रियता भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण पहलू हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी विदेश यात्राएं, विभिन्न देशों के नेतृत्व के साथ संवाद, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भागीदारी और आर्थिक एवं रणनीतिक साझेदारियों को आगे बढ़ाने के प्रयास देश की वैश्विक भूमिका से जुड़े हैं। उनके समर्थक इन गतिविधियों को भारत की प्रतिष्ठा और प्रभाव में वृद्धि के रूप में देखते हैं। साथ ही, किसी भी प्रधानमंत्री के कार्यकाल का निष्पक्ष आकलन केवल अंतरराष्ट्रीय छवि से नहीं, बल्कि घरेलू नीतियों, आर्थिक परिणामों, सामाजिक समावेशन और शासन के रिकॉर्ड से भी किया जाना चाहिए। लोकतंत्र की सुंदरता इसी में है कि नेतृत्व की उपलब्धियों का सम्मान हो और उसके निर्णयों की आलोचनात्मक समीक्षा भी संभव बनी रहे। यह भी विचारणीय है कि किसी नेता के विरुद्ध जितनी अधिक व्यक्तिगत और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल होता है, उतना ही उसके समर्थकों में प्रतिक्रिया की भावना पैदा हो सकती है। नरेंद्र मोदी के संदर्भ में कांग्रेस की आलोचना का राजनीतिक असर हमेशा एक जैसा रहा हो, ऐसा निष्कर्ष निकालना तथ्यों से परे होगा। चुनावी परिणाम अनेक कारणों से प्रभावित होते हैं-नेतृत्व, संगठन, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, गठबंधन और मतदाताओं की अपेक्षाएं। फिर भी, यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जोखिम है कि यदि विपक्ष अपनी आलोचना को प्रमाण और नीतिगत विकल्पों के बजाय व्यक्तिगत टिप्पणियों पर आधारित करता है, तो वह अपनी बात जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अवसर खो सकता है। इसके विपरीत भाजपा को भी केवल विरोधियों के विवादास्पद बयानों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय अपने कामकाज और नीतियों के आधार पर जनता के सामने जवाबदेह रहना चाहिए।
राजनीति की भाषा समाज के व्यवहार को प्रभावित करती है। जब शीर्ष नेता सार्वजनिक मंचों पर संयम खोते हैं, तब उनके समर्थकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच भी कटुता बढ़ने की आशंका रहती है। सोशल मीडिया इस प्रवृत्ति को और तेज कर देता है, जहां किसी बयान का छोटा-सा अंश पूरे विमर्श पर हावी हो सकता है। इसलिए नेताओं को बोलने से पहले शब्दों के सामाजिक प्रभाव और पद की गरिमा पर विचार करना चाहिए। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को अपमानित करना और उसके तर्क को पराजित करना दो अलग बातें हैं, लोकतंत्र में दूसरी बात अधिक महत्वपूर्ण है। अंततः कांग्रेस हो या भाजपा, किसी भी दल की वास्तविक राजनीतिक शक्ति उसकी भाषा की आक्रामकता से नहीं, बल्कि उसके विचारों, नीतियों, जनसेवा और जनता के विश्वास से निर्धारित होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना तथ्यों और तर्कों पर आधारित होनी चाहिए। इसी प्रकार कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे हों या सत्तापक्ष के अन्य नेता सभी से अपेक्षा है कि वे असहमति को अपमान में न बदलें। राजनीति में शब्दों की मर्यादा कोई औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। सत्ता बदलेगी, नेता बदलेंगे और दलों की स्थितियां बदलेंगी, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बोले गए शब्द लंबे समय तक समाज की स्मृति में रहते हैं। इसलिए राजनीति को कटुता की नहीं, संवाद की भाषा चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में विचारों की विजय होनी चाहिए, व्यक्तिगत अपमान की नहीं।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार