कोयल से हुई बात (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 08, 2026

इंसान का इंसान से ईमानदार संवाद मुश्किल में है। पक्षी और जानवर से संवाद हमेशा सहज रहा। कोयल से पूछा, आप हर साल आम को मीठा करने आती हैं, इतनी तन्मयता, ईमानदारी व समयबद्धता कैसे रखती हैं। कोयल ने कहा, हम कुदरत की बेटियां हैं, हमारा कर्तव्य आम के वृक्षों के साथ समन्वय बना कर रखना है।

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इंसान का इंसान से ईमानदार संवाद मुश्किल में है। पक्षी और जानवर से संवाद हमेशा सहज रहा। कोयल से पूछा, आप हर साल आम को मीठा करने आती हैं, इतनी तन्मयता, ईमानदारी व समयबद्धता कैसे रखती हैं। कोयल ने कहा, हम कुदरत की बेटियां हैं, हमारा कर्तव्य आम के वृक्षों के साथ समन्वय बना कर रखना है। कुछ भी बदलाव लाना असंतुलन की तरफ ले जाएगा। मिठास आप घोलती हैं, हमने पूछा? बोली, मिठास तो मां प्रकृति घोलती है हमारा काम तो आवाज़ निकालना है और वह भी ठीक वैसी ही जैसा बचपन से सिखाया गया है। हमें आम के वृक्षों पर बैठकर समय और नियमबद्ध तरीके से यह पारिवारिक पारम्परिक कर्तव्य निभाना होता है।  

हमने कोयल से कहा, आपको पता है आम को फलों का राजा माना जाता है। कोयल ने कहा, हम तो साधारण कार्यकर्ता हैं, हमारे यहां सब एक जैसे होते हैं, ऊंच नीच नहीं होता सभी को एक जैसे घोंसले बनाकर रहना होता है। एक जैसा खाना पीना होता है तभी अनुशासन रहता है। इतनी समानता, समरसता, एकरूपता, एकात्मता हमारे जीवन में है कि पता नहीं कि राजा क्या होता है। अगला सवाल था, कोई बागवाला आपको पाल पोसकर, अच्छा खिला पिलाकर, आपको अपने आम के बागीचे में ज्यादा कूकने को कहे, तो कोयल ने कहा, हमें ऐसा व्यवहार करना नहीं सिखाया गया। प्रकृति के नियम पारदर्शी और न बदलने वाले हैं। 

हमने कहा दुनिया कितनी बदल गई लेकिन आपकी तान वैसी ही है। हमें यही सिखाया गया है कि कभी अपना अच्छा चरित्र न बदलो, प्रतिस्पर्द्धा या लालच यहां तक कि मजबूरी में भी अडिग रहो। इसी गुण से आपके व्यक्तित्व की पहचान बनती है, कोयल बोली। झिझकते हुए मैंने जानना चाहा, आपको नहीं लगता आपका रंग काला न होकर, भूरा, लाल या कोई और... । जवाब आया, हमारे पूर्वजों ने हमें यही शिक्षा दी कि रंग से कुछ नहीं होता, सब आपके ढंग से होता है। हमारा रंग यदि उजला, पीला होता तो आप हमें पसंद करते मगर हमारी आवाज़ सुरीली न होती तो कितना देर तक सुन पाते। तब क्या अपने बच्चों को हमारी तरह बोलने को कहते। हमारे सवाल खत्म हो गए थे। 

कोयल के कूकने का समय हो गया था। वह आम के अन्य वृक्षों की ओर उड़ चली। पक्षी इंसानों की तरह हो जाएं, बोली बदल लें, नए रंग का चोगा पहन लें, मुंह फेरना सीख लें तो प्रकृति का अंदरूनी संतुलन बिगड़ जाएगा। दुनिया के किसी कोने में शायद कोई तो ऐसा करवाने की कोशिश कर रहा होगा मगर कुदरत ऐसा होने तो नहीं देगी । काली कोयल ने अनेक सच उजले कर दिए। 

- संतोष उत्सुक

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