By अभिनय आकाश | Nov 05, 2026
साल 1967 भारत का मद्रास राज्य जो वर्तमान में तमिलनाडु के नाम से जाना जाता है। प्रदेश में सूखे के कारण अनाज की भारी कमी थी और कीमतें बहुत अधिक थीं। विधानसभा चुनाव अपने चरम पर थे। तभी इस संकट के बीच डीएमके के संस्थापक सी. एन अन्नादुरई ने एक चुनावी नारा दिया- मूंड्रू पडी लट्चियम, ओरू पडी निचयम। मतलब तीन पडी चावल हमारा लक्ष्य है, लेकिन एक पडी चावल निश्चित रूप से दिया जाएगा। एक रुपये में 3 माप (लगभग 4.5 किलोग्राम) के इस लोक-लुभावन वादे ने जनता को आकर्षित किया और डीएमके ने कांग्रेस को हराकर पहली बार भारी बहुमत से सत्ता हासिल की। ये और बात है कि भले ही अन्नादुरई अपने समय में इसे पूरी तरह लागू नहीं कर पाए, लेकिन उनके इस विचार ने तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा के लिए सस्ते अनाज और राशन की नींव रख दी। लगभग छह दशक बाद और आधी दुनिया दूर, चुनावी लोकतंत्र का यह खेल आज भी नहीं बदला है। जब महंगाई और आर्थिक दबाव से जूझते अमेरिकी नागरिकों को रिझाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप हर नागरिक के खाते में $5,000 भेजने जैसा लुभावना दांव चलते हैं, तो यह अन्नादुरई के उसी 1967 वाले प्रयोग की आधुनिक और हाई-टेक पुनरावृत्ति जैसा दिखता है। अमेरिका में जब कभी भी चुनाव होते हैं तो उसके रिजल्ट का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। खासकर की जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हो और मिड टर्म के नतीजे इतने पाथ ब्रेकिंग हो। मतलब जो दशकों में नहीं देखा गया था। जो बाइडेन के जाने के बाद जब ट्रंप की वापसी हो गई तो लगता था कि अमेरिका अब कई दशक तक रेड वेब की ही चपेट में रहेगा। भारत, कनाडा, यूरोप जैसे जो ट्रंप पीड़ित थे, इस बात की भी तैयारी करने लगे थे कि ट्रंप का रिप्लेसमेंट अगर ट्रंप का ही मानस पुत्र या पुत्री निकला तो फिर कहां जाएंगे। लेकिन मिड टर्म में वो फटका पड़ा है कि आने वाले दो साल हिचकोले खाते हुए बीतने वाले हैं। ट्रंप की हरकतों के चलते रिपब्लिकन पार्टी ने सेनेट और हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव दोनों जगह अपना बहुमत खो दिया है। डेमोक्रेट्स के पास अब सीनेट में 54 सीटें और हाउस में 228 सीट है। जिन अब्दुल अल सईद को ट्रंप ने जिहादी कह दिया था। कहा था कि मेटल डिटेक्टर से निकलवाऊंगा, अब जेडी वेंस उन्हीं को शपथ दिलवाएंगे। हाउस को हफीम जेफरीज के रूप में पहला ब्लैक स्पीकर भी मिल गया है। गवर्नरशिप के मामले में भी डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिककंस को पछाड़ा है। 28 सूबों में डेमोक्रेट्स के गवर्नर जीते हैं। 2009 के बाद पहली बार डेमोक्रेट्स ने ये रिकॉर्ड तोड़ा है।
कम से कम 47 बार ट्रंप ने बयान दिया था कि अमेरिका को ऐसे वोट डालना चाहिए जैसे मैं ही चुनाव लड़ रहा हूं। उन्हें लगा कि इसका फायदा पार्टी को होगा, लेकिन इसका उल्टा ही हो गया। ट्रंप की पिछली दो साल की गलतियों का खामियाजा रिपब्लिकन पार्टी को भुगतना पड़ा। टेक्सस, साउथ कैरोलिना, ट्रांसिस, आयोवा और ओहायो जैसे कट्टर रिपब्लिकन स्टेट्स में ब्लू वेब आ गई है। नेतन्याहू के साथ मिलकर डोनाल्ड ट्रंप ने सोचा था कि ईरान में हम रिजीम चेंज कर लाएंगे और नोबेल प्राइज मिल जाएगा। पूरी दुनिया का नक्शा ही बदल देंगे। लेकिन रिजीम चेंज डोनाल्ड ट्रंप को मिल तो गया वो भी अपने ही देश में मिल गया। रिजीम चेंज से मतलब ऐसा बिल्कुल नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप अपना ऑफिस छोड़कर जा रहे हैं। लेकिन रिजीम चेंज से मतलब ये कि अमेरिकन टर्मनलॉजी में कहे तो एक लेम डक प्रेसिडेंट बनकर ही रहेंगे। डेमोक्रेट्स की आंधी ने ट्रंप के किले को हरा कर रख दिया है। लेकिन इसके बावजूद ट्रंप का अहंकार वो जस का तस है। वो डेमोक्रेट्स के हर नेहले पर दहला फेंकने की तैयारी कर रहे हैं। इसका दावा कर रहे हैं। कई हफ्तों तक ट्रंप अपने समर्थकों से अपील करते रहे कि वे ऐसे वोट करें जैसे राष्ट्रपति पद के लिए खुद ट्रंप खड़े हो। उन्हें उम्मीद थी कि इससे रिपब्लिकन उम्मीदवारों को फायदा होगा। लेकिन जब नतीजे खराब आए तो उन्होंने इस बात को मानने से ही इंकार कर दिया कि मिड टर्म चुनावों का नतीजा उनके खिलाफ जनमत का किसी तरह का कोई संकेत है। आमतौर पर ट्रंप के समर्थन वाले उम्मीदवारों को चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करते देखा गया है। लेकिन इस बार वो वोटरों को अपने पक्ष में करने में नाकाम रहे। टेक्सस के सेनेट चुनाव में पैक्स्टन को हार का सामना करना पड़ा। जबकि ट्रंप ने उनका समर्थन किया था। नॉर्थ कैरोलना के सेनेट चुनाव में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रॉय कूपर को हराने के लिए ट्रंप ने माइकल वाटली को चुना था। लेकिन वाइटली यह मुकाबला हार गए। ओहायो में भी ट्रंप ने विवेक रामास्वामी के लिए रास्ता लगभग साफ कर दिया था।
अमेरिका के कई हिस्सों से आए ऐसे ही चौंकाने वाले नतीजों के लिए ट्रंप ने ईरान युद्ध को भी जिम्मेदार मानने से इंकार किया है। जबकि इसी युद्ध के बाद से ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग में सबसे बड़ी गिरावट आई है। अमेरिकी अखबार है, नाम है वॉल स्ट्रीट जनरल। से बातचीत में डोनल्ड ट्रंप ने कहा कि नतीजे खराब आने की वजहों में युद्ध महज एक छोटा हिस्सा है। उन्होंने बढ़ती कीमतों के लिए जिम्मेदार अपनी टेरिफ नीति को भी मानने से इंकार किया। जब बल्कि नतीजों के बाद भी उन्होंने यही कहा कि उनकी सरकार का एजेंडा पहले की तरह ही आगे बढ़ता रहेगा। तो क्या ऐसे में यह मान लिया जाए कि मिड टर्म चुनाव में हार के बावजूद डॉनल्ड ट्रंप ने अभी कोई सबक नहीं सीखा है।
भारत के लिए सबसे बड़ा लाभ कम कच्चे तेल की कीमतों के रूप में सामने आ सकता है। इससे आयात बिल घटेगा, रुपये पर दबाव कम होगा और महंगाई को नियंत्रण में रखने में मदद मिलेगी। साथ ही कमजोर डॉलर और नरम ट्रेजरी यील्ड विदेशी निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता बढ़ा सकते है, जिससे भारतीय बाजारों में निवेश प्रवाह को समर्थन मिल सकता है।
विधायी व्यवस्था के अनुसार, राष्ट्रपति का वीटो पूरी तरह से अंतिम नहीं होता। अगर अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनो हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोबारा दो-तिहाई बहुमत से उस विधेयक को पारित कर देते है तो राष्ट्रपति का वीटो बेअसर हो जाता है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बिना भी विधेयक कानून बन जाता है।
हकीम जेफ्रीज ने हाउस के शुरुआती 100 घंटों में आम लोगों के खर्च का बोझ कम करने के लिए बड़ा कानूनी कदम उठाने का वादा किया है। उनकी प्राथमिकताओं में एक्सपायर हो चुकी अफोर्डेबल केयर एक्ट की हेल्थ इंश्योरेंस सब्सिडी बहाल करना, ट्रंप के कार्यकाल में मेडिकेड में की गई करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की कटौती वापस लेना और टैरिफ हटाना शामिल है। डेमोक्रेट्स ईरान में लड़ाई खत्म करने पर भी जोर देंगे, जिससे ईंधन की कीमतें बढ़ी है।दोनों सदनों में बहुमत के साथ वे अपने प्रस्तावों पर वोट करा सकते है हालांकि, बजट को लेकर टकराव से सरकारी शटडाउन का खतरा भी है।