युद्ध अचानक दरवाजे पर आया तो ताकत ही हमें बचायेगी, सिर्फ 2% के रक्षा बजट से काम नहीं चलेगाः GD Bakshi

By नीरज कुमार दुबे | Feb 02, 2026

केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए 7,84,678 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है जो पिछले वर्ष के आवंटन 6.81 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक है। मोदी सरकार का ध्यान खासकर चीन और पाकिस्तान से बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर सेना की लड़ाकू क्षमता को बढ़ाने पर है। लेकिन रक्षा क्षेत्र में किये गये बजटीय प्रावधान को लेकर पूर्व मेजर जनरल जीडी बख्शी ने जिस तेवर में अपनी बात रखी है उसने बहस को नई धार दे दी है। उन्होंने साफ कहा कि 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी स्वागत योग्य है, पर युद्ध इंतजार नहीं करता। उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा है कि संघर्ष अचानक दरवाजे पर आ सकता है और ताकत ही रक्षा करती है। उन्होंने कहा कि हमारा रक्षा व्यय सकल घरेलू उत्पाद के 1.9 प्रतिशत के आसपास अटका रहा है, जबकि कई यूरोपीय देश तीन प्रतिशत तक और रूस करीब पांच प्रतिशत तक खर्च कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत को कम से कम ढाई से तीन प्रतिशत तक तुरंत पहुंचना ही होगा, क्योंकि देश साढ़े तीन मोर्चों की चुनौती झेल रहा है। जीडी बख्शी ने कहा कि युद्ध अचानक आ सकता है। केवल ताकत ही हमें बचा सकती है। गांधीवादी दृष्टिकोण को तत्काल छोड़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा, ''हमें बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और बांग्लादेश में मिलने वाले क्षणिक अवसरों का लाभ उठाने की स्थिति में होना चाहिए। हम दस साल की आरामदेह पुनः शस्त्रीकरण योजना पर काम करने का जोखिम नहीं उठा सकते।''

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रक्षा मंत्रालय ने बताया है कि अगले वर्ष के लिए यह आवंटन सकल घरेलू उत्पाद के करीब दो प्रतिशत के बराबर है और कुल केंद्रीय नियोजित व्यय का लगभग 14.67 प्रतिशत रक्षा पर जाएगा, जो सभी मंत्रालयों में सबसे अधिक है। इसके अलावा, राजस्व व्यय 5,53,668 करोड़ रुपये रखा गया है, जिसमें 1,71,338 करोड़ रुपये पेंशन के लिए हैं। दिन प्रतिदिन संचालन, गोला बारूद, ईंधन, मरम्मत और सहयोगी कर्मियों के वेतन जैसे मदों के लिए राजस्व हिस्से में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है।

सबसे अहम बात यह है कि पूंजीगत खरीद बजट का लगभग 75 प्रतिशत, यानी 1.39 लाख करोड़ रुपये, देशी उद्योग से खरीद के लिए अलग रखा गया है। यही वह बिंदु है जहां आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य जमीन पर उतरता दिखता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विमान निर्माण तथा रखरखाव, मरम्मत और नवीनीकरण के लिए काम आने वाले पुर्जों और कच्चे माल पर मूल सीमा शुल्क में छूट की घोषणा की है। इससे देश में विमानन तथा रक्षा निर्माण शृंखला को बल मिलने की उम्मीद है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि सिंदूर अभियान की ऐतिहासिक सफलता के बाद यह बजट देश की रक्षा शक्ति को और सुदृढ़ करने के संकल्प को मजबूत करता है और सुरक्षा, विकास तथा आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन साधता है। देखा जाये तो ऑपरेशन सिंदूर को 1971 के बाद पाकिस्तान के साथ पहली बड़ी सैन्य टकराहट के रूप में देखा गया, इसलिए रक्षा व्यय में बढ़ोतरी की आशा पहले से थी। सूत्रों के अनुसार रक्षा मंत्रालय ने हालांकि बजट में बीस प्रतिशत बढ़ोतरी की मांग की थी।

दूसरी ओर, उद्योग जगत ने इस बजट का स्वागत किया है। कई देशी विदेशी रक्षा कंपनियों ने इसे भू रणनैतिक यथार्थ के अनुरूप बताया। थेल्स से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी अंकुर कनागलेकर ने कहा कि यह आवंटन सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण के प्रति प्रतिबद्धता दिखाता है और मेक इन इंडिया, नवाचार तथा निर्यात की दिशा में बल देता है। रोल्स रॉयस इंडिया से जुड़े शशि मुकुंदन ने रखरखाव और मरम्मत सेवाओं से जुड़े पुर्जों पर शुल्क छूट को उपयोगी बताया। भारत फोर्ज लिमिटेड के बाबा कल्याणी ने इसे नीतिगत निरंतरता और दीर्घकालिक राष्ट्रीय क्षमता निर्माण का संकेत कहा। वहीं अनुसंधान मोर्चे पर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के संयुक्त निदेशक बिनॉय कुमार दास ने कहा कि उनके लिए बजट कभी बाधा नहीं रहा। उनका कहना था कि सरकार से बिना शर्त सहयोग मिलता रहा है और अब उनसे ऐसी अगली पीढ़ी की तकनीक पर काम करने को कहा गया है जो दुनिया में किसी के पास न हो। उन्होंने साफ कहा कि बदलती भू-राजनीति में आयात का इंतजार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि देश ने गैलियम नाइट्राइड तकनीक में पकड़ बनाई है और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में पूर्ण आत्मनिर्भरता की दिशा में काम चल रहा है। उन्होंने दावा किया कि कुछ दशक पहले भारत को तकनीक देने से मना किया जाता था, परन्तु आज भारत खुद आयात से मना करने की स्थिति में है।

देखा जाये तो रक्षा बजट की यह छलांग केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, यह मनोवृत्ति के बदलाव का संकेत है। जब दुनिया अस्थिर हो, सीमाएं संवेदनशील हों और तकनीक ही शक्ति का नया रूप बन रही हो, तब आधे मन से रक्षा नहीं होती। पर केवल धन बढ़ाना काफी नहीं; उस धन का तेज, पारदर्शी और देशी उद्योग केंद्रित उपयोग जरूरी है। यदि 75 प्रतिशत खरीद सच में देश के भीतर से होती है, अनुसंधान को खुला समर्थन मिलता है और सेनाओं तक समय पर साधन पहुंचते हैं, तभी आत्मनिर्भरता नारा नहीं, ढाल बनेगी।

बहरहाल, अंत में यही कहा जा सकता है कि जीडी बख्शी ने जो सवाल उठाए हैं, उन पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि बदलते सुरक्षा माहौल में तैयारी का कोई विकल्प नहीं होता। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि मोदी सरकार के लिए देश की सीमाओं की रक्षा हमेशा सर्वोपरि रही है। जब जब सीमा पर संकट आया है, सरकार ने बजट की परवाह किए बिना सेनाओं को जरूरी संसाधन दिए हैं। सेनाओं के आधुनिकीकरण के लिए जिस तरह खजाने के द्वार खोले गए हैं और देशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दिया गया है, वह काफी हद तक भरोसा जगाता है कि भारत अपनी सुरक्षा और सामरिक शक्ति को लेकर अब पहले से कहीं ज्यादा सजग और सक्षम है।

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