By डॉ. अनिमेष शर्मा | Jan 27, 2026
स्मार्टफोन के दौर में अनजान कॉल्स और स्पैम से राहत दिलाने वाला ट्रूकॉलर कभी लोगों की जरूरत बन चुका था। लेकिन अब भारत में सरकार और टेलीकॉम कंपनियों की नई पहल CNAP (Calling Name Presentation) ने इस मशहूर ऐप के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या वाकई CNAP ट्रूकॉलर की उपयोगिता खत्म कर देगा? आइए, पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
ट्रूकॉलर की कहानी साल 2009 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम से शुरू होती है। रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पढ़ने वाले दो छात्र, एलन ममेदी और नामी जारिंगलम, लगातार आने वाली अनजान कॉल्स से परेशान थे। इसी समस्या का हल खोजते हुए उन्होंने एक ऐसा सिस्टम बनाने का सोचा, जो कॉल करने वाले की पहचान बता सके। शुरुआत में यह सेवा केवल ब्लैकबेरी फोन तक सीमित थी, लेकिन जैसे-जैसे एंड्रॉइड और आईफोन का चलन बढ़ा, ट्रूकॉलर भी तेजी से फैलता गया। देखते ही देखते यह एक छोटे से स्टूडेंट प्रोजेक्ट से ग्लोबल टेक ब्रांड में बदल गया और आगे चलकर शेयर बाजार तक पहुंच गया।
ट्रूकॉलर की असली ताकत उसकी क्राउडसोर्सिंग रणनीति रही। यूजर्स जब स्पैम कॉल्स को रिपोर्ट करने लगे, तो इसका डेटाबेस लगातार मजबूत होता गया। करीब 2014 के बाद भारत में स्पैम और प्रमोशनल कॉल्स की बाढ़ आ गई। ऐसे में ट्रूकॉलर भारतीय मोबाइल यूजर्स का भरोसेमंद साथी बन गया। आज भारत इसके लिए सबसे बड़ा बाजार है, जहां 25 करोड़ से ज्यादा लोग इस ऐप का इस्तेमाल करते हैं। भारतीय यूजर्स के महत्व को समझते हुए कंपनी ने 2018 से भारत का डेटा देश में ही स्टोर करना शुरू किया। इतना ही नहीं, नवंबर 2024 में संस्थापकों के हटने के बाद कंपनी की कमान भारतीय मूल के ऋषित झुनझुनवाला को सौंप दी गई।
अब ट्रूकॉलर के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है CNAP सिस्टम। यह भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) की पहल है, जिसे टेलीकॉम कंपनियां जैसे जियो, एयरटेल और वीआई लागू कर रही हैं। CNAP की खास बात यह है कि यह किसी थर्ड-पार्टी ऐप पर निर्भर नहीं करता। कॉल आने पर कॉलर का नाम सीधे टेलीकॉम नेटवर्क के जरिए आपकी स्क्रीन पर दिखेगा, जो KYC दस्तावेजों पर आधारित होगा। यानी यूजर को न तो कोई अलग ऐप डाउनलोड करना पड़ेगा और न ही कॉन्टैक्ट एक्सेस जैसी परमिशन देनी होगी।
CNAP की सबसे बड़ी ताकत इसकी विश्वसनीयता और गोपनीयता है। जब नाम की जानकारी सीधे नेटवर्क से आएगी, तो गलत या फर्जी पहचान की संभावना कम होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे यह सिस्टम पूरी तरह लागू होगा, यूजर्स ट्रूकॉलर जैसे ऐप्स पर निर्भर रहना कम कर सकते हैं। इसका सीधा असर ट्रूकॉलर के विज्ञापन आधारित रेवेन्यू और प्रीमियम सब्सक्रिप्शन मॉडल पर पड़ सकता है।
आज ट्रूकॉलर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे अपनी पहचान दोबारा गढ़नी होगी। अगर CNAP आम यूजर्स के लिए पर्याप्त साबित हुआ, तो केवल कॉलर का नाम बताने वाला ऐप बने रहना ट्रूकॉलर के लिए काफी नहीं होगा।
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि कंपनी को अब AI आधारित फ्रॉड डिटेक्शन, स्पैम से आगे बढ़कर डिजिटल सुरक्षा और बिजनेस कम्युनिकेशन टूल्स पर ध्यान देना होगा। फिलहाल कंपनी ने CNAP पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन यह साफ है कि बदलाव के बिना टिके रहना मुश्किल होगा।
CNAP भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। अगर यह सिस्टम सफल रहा, तो ट्रूकॉलर जैसे ऐप्स की भूमिका सीमित हो सकती है। अब देखना यह है कि ट्रूकॉलर खुद को कितनी तेजी से नए दौर के अनुसार ढाल पाता है, क्योंकि टेक की दुनिया में वही टिकता है, जो समय के साथ बदलता है।
- डॉ. अनिमेष शर्मा