पति की मौत के बाद नहीं तोड़नी होंगी चूड़ियां, न हटाना होगा माथे का कुमकुम, विधवा अनुष्ठान पर लगाया गया प्रतिबंध

By रेनू तिवारी | May 09, 2022

पुणे। भारत में आज भी अगर औरत का पति नहीं है तो उसे श्रृंगार करने का हक भी नहीं है खात तौर पर विधवा महिला को। महिला का श्रृंगार उसके पति से होता है और उसके पति पर ही खत्म होता है। पति के मरने पर रिवाजों के अनुसार मांग का सिंदूर पोंछ दिया जाता है। चूड़ियां तोड़ दी जाती है सफेद लिबास उढ़ा दिया जाता है और इसके बाद ऐसी ही जीवन पत्नी का बना दिया जाता है। यही भारत में सामाजिक परंपरा है। पर अब चीजें बदलेंगी। इसकी शुरूआत महाराष्ट्र के कोहलापुर के एक गांव से हुई है। कोल्हापुर जिले की शिरोल तहसील के हेरवाड़ गांव ने 4 मई को महिलाओं के चूड़ियां तोड़ने, माथे से 'कुमकुम' (सिंदूर) पोंछने और एक विधवा के मंगलसूत्र को हटाने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। इसकी ग्राम पंचायत सरपंच सुरगोंडा पाटिल ने इस बात की जानकारी दी है।

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पाटिल ने कहा, हमें इस प्रस्ताव पर बहुत गर्व महसूस हो रहा है क्योंकि इसने हेरवाड़ को अन्य ग्राम पंचायतों के लिए एक मिसाल के तौर पर पेश किया, खासकर जब हम साहू महाराज की 100वीं पुण्यतिथि मना रहे हैं, जिन्होंने महिलाओं के उद्धार के लिए काम किया। ज़िंजादे ने पीटीआई- से बात करते हुए कहा, कोविड-19 की पहली लहर में, हमारे एक सहयोगी की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई। उनके अंतिम संस्कार के दौरान, मैंने देखा कि कैसे उनकी पत्नी को चूड़ियां तोड़ने, मंगलसूत्र हटाने और सिंदूर पोंछने के लिए मजबूर किया गया था। इससे महिला का दुख और अधिक बढ़ गया। यह दृश्य हृदयविदारक था।

ज़िंजादे ने बताया कि इस तरह की प्रथा को रोकने का फैसला करते हुए उन्होंने इस पर एक पोस्ट लिखने के बाद गांव के नेताओं और पंचायतों से संपर्क किया और कई विधवाओं से इस पर अच्छी प्रतिक्रिया मिलने पर उन्हें खुशी हुई। ज़िंजादे ने कहा, अपनी ओर से एक उदाहरण स्थापित करने के लिए, मैंने स्टाम्प पेपर पर घोषणा की कि मेरी मृत्यु के बाद, मेरी पत्नी को इस प्रथा के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। दो दर्जन से अधिक पुरुषों ने मेरी इस घोषणा का समर्थन किया। तब हेरवाड़ ग्राम पंचायत मेरे पास पहुंची और कहा कि वे इस पर एक प्रस्ताव पारित करेंगे।

महिला स्वयं सहायता समूह के साथ कार्यरत अंजलि पेलवान (35) का कहना है कि विधवा होने के बावजूद वे समाज में स्वतंत्र रूप से गहने पहनकर घूमती हैं। उन्होंने बताया हमने राज्य के मंत्री राजेंद्र यद्राकर को विधवाओं के हस्ताक्षर वाला एक ज्ञापन सौंपा है, जिसमें इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाने की मांग की गई है।

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