वास्तुकला का अनूठा नमूना है ऐतिहासिक पिंजौर गार्डन

By संतोष उत्सुक | Jul 27, 2019

कभी ‘प्लांड सिटी आफ एशिया’ चंडीगढ़ जाना हो और गर्म दोपहर से बेहाल हो जाएं तो शाम के वक़्त चंडीगढ़ शिमला मार्ग पर पंचकूला से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर शिवालिक पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसे खूबसूरत विश्वप्रसिद्ध पिंजौर गार्डन में टहलकर आपकी शाम बाग बाग हो सकती है।

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ऐतिहासिकता और कुदरती खूबसूरती  

पिंजौर क्षेत्र में लगभग डेढ करोड़ वर्ष पहले के मानव की उपस्थिति मानी गई है। पिंजौर स्थित बाग जिसे यादवेन्द्रा गार्डन भी कहते हैं, की बाहरी दीवारें पुराने किले सी लगती है लेकिन बाग में पहुंचते ही दृश्य बदल जाता है। हरियाली की गोद में बसा हसीन ख्वाब। ऊंचाई से इठलाकर गिरकर, फिर फव्वारों के साथ नाचता और ठुमककर बहता पानी। पड़ोसन हरी मखमली घास पर बिखरी बूंदों को मोतियों सी दमकाती धूप। क्यारियों में यहां बनाया शीश महल राजस्थानी मुगल वास्तु शैली का उत्कृष्ट नमूना है। रंगमहल से सामने फैला बाग़ आत्मसात होता है। कैमरा अपना रोल खूब निभाता है। क्यारियों में पौधे, खुश्बू बिखेरते दर्जनों किस्म के रंग बिरंगे फूल और फुदकती नाचती तितलियां। बॉटल पाम व अन्य वृक्ष तन मन को सौम्य बना देते हैं। बहते पानी के साथ सुकून देता संगीत भी प्रवाहित हो रहा होता है। जल महल कैफे का खाना चाहे स्वाद न लगे मगर सफेद रंग में पुते क्लासिक आयरन फर्नीचर पर बैठ कर लुत्फ आ जाता है। सात तलों में बना यह बाग वास्तुकला का अनूठा नमूना है। 

 

जवां होती रात  

रात जवां होने लगती है तो रोशनियों में नहा उठा यह बाग अलग ही छटा बिखेर देता है। वस्तुतः यहां उग आए निर्मल आनंद के पहलू में दिल खो जाता है। आंखों को सुख पहुंचाते बहते पानी में खिल उठा सतरंगी प्रकाश यहां उत्सव के माहौल की रचना कर देता है। बाग़ के अंतिम भाग में ओपन एअर थिएटर बनाया गया है जहां प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रम वक़्त को और मनोरंजक व यादगार बना देते है। प्रिय साथी के सानिध्य में फोटोग्राफी में मशगूल हो लेना, ज़िंदगी में रोमांस ले आता है।

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मुगलकालीन प्रभाव और महाराजा पटियाला 

अनेक फिल्मों व वीडियोज़ शूटिंग के लिए प्रसिद्ध इस जगह की नींव संगीत से नफरत करने वाले सम्राट औरंगजेब के माध्यम से पड़ी। सत्रहवीं शताब्दी में औरंगजेब के नाम पर लाहौर जीत कर, सेनापति फिदाई खां  दिल्ली वापस लौटे, औरंगजेब ने शिवालिक पहाड़ियों में बसा जंगलनुमा गांव पंचपुरा उपहारस्वरूप दिया। फिदाई खां वास्तुकार व दार्शनिक भी थे सो उन्होंने जंगल को मनमोहक मनोरम स्थल में बदल दिया। वे कुछ बरस वहां रहे। बादशाह औरंगजेब की बेगमें यहां आकर रहा करती। तत्कालीन रियासत सिरमौर के महाराज से फिदाई के टकराव के चलते 1675 ई. में यह क्षेत्र सिरमौर में पहुंच गया। बरसों यह जगह उजड़ी रही और यूं वास्तुकार प्रकृति प्रेमी फिदाई का ख्वाब पतझड़ हो गया, हां नाम पंचपुरा से पिंजौर ज़रूर हो गया। महाराजा पटियाला ने मौका मिलते ही यह क्षेत्र सिरमौर से झटक लिया। उनकी शौकीनमिज़ाजी के कारण जगह फिर हरीभरी, सजने संवरने लगी। हरियाणा को 1966 में स्वायत्तता मिली तो पर्यटन विभाग ने इसे पर्यटकीय नजरिए से तैयार किया और आम जनता बाग की लाजवाब खूबसूरती की जानिब मुखातिब होने लगी। भूतपूर्व महाराजा पटियाला यादविन्द्र सिंह जिन्होंने उद्यान का जीर्णोदार किया था की याद में नाम ‘यादवेन्द्र गार्डन’ रखा गया। 

 

पुरातत्व 

यह क्षेत्र ईसा पूर्व 9वीं से 12वीं शताब्दी के पनपने का साक्षी भी रहा। पुरातत्व प्रेमी पर्यटकों के लिए यहां भीमा देवी मंदिर व धारा मंडल के अवशेष जिज्ञासा जगाते हैं। जनश्रुति अनुसार पांडव अज्ञातवास में यहां रहे व दुश्मनों द्वारा पानी में जहर मिलाने की आशंका से रोजाना नई बावड़ी खोद कर जलप्रबंध किया तभी पिंजौर क्षेत्र को 360 बावड़ियों वाला भी कहते हैं जिनमें से अधिकांश विकास की भेंट चढ़ गई हैं।  

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बैसाखी, आम का मेला और फल 

बैसाखी के दिन यहां महामेला लगता है। बाग़ के टैरेस के दोनों तरफ  आम के बागीचे हैं। यहां हर बरस जून जुलाई के दौरान ‘मैंगो फैस्टिवल’ का ज़ायकेदार आयोजन होता है जिसमें उत्तर भारत में उगाए जा रहे किस्म किस्म के आम पेश किए जाते हैं। दिलचस्प है कि इस बाग में ‘गदा’ आम होता है जिसके एक फल का वज़न दो किलो भी हो सकता है। आम की अन्य किस्मों के इलावा केले, लीची, आड़ू, चीकू, अमरूद, नाश्पाती, लोकाट, बीज रहित जामुन, हरा बादाम व कटहल के काफी पेड़ हैं। किसी भी मौसम में जाएं कोई न कोई फल उपलब्ध रहता है। 

 

पिकनिक स्थल 

यहां रोज ही पर्यटक उमड़ते हैं मगर रविवार व अवकाश के दिन मेले सा माहौल होता है। चंडीगढ़वासियों व अन्य पड़ोसियों के लिए यह पिकनिक डे ही होता है। गर्मियों की शाम और सर्दियों की धूप में हर किसी की थकान यहां छूट जाती है।

 

कब कैसे पहुंचे 

जब चाहे आएं, चंडीगढ़ पहुंचने के लिए हवाई, रेल व सड़क मार्ग है। अधिकांश पर्यटक पिंजौर गार्डन ज़रूर आते हैं और कश्मीर, मैसूर के बागों से ज़्यादा आनंदित होकर जाते हैं। यहां मुगलगार्डन, जापानी बाग, प्लांट नर्सरी के साथसाथ मोटेल, गोल्डनओरिएंट रेस्तरां, शापिंग आर्केड, मिनी चिड़ियाघर, ऊंट की सवारी, व्यू गैलरी, कान्फ्रैंस रूम व बैकिंग सुविधा भी उपलब्ध है। बाग़ में आकर मुगल सांस्कृतिक विरासत का खुशनुमा एहसास होता है। 

 

इस बार ‘मैंगो फेयर’ में तशरीफ लाइएगा आपकी यात्रा स्वादिष्ट रहेगी।

 

- संतोष उत्सुक

 

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