UP-Maharashtra में Aadhaar अब जन्म प्रमाणपत्र के रूप में मान्य नहीं होगा, दोनों सरकारों ने जारी किए नए दिशा-निर्देश

By नीरज कुमार दुबे | Nov 28, 2025

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में अब आधार कार्ड को जन्म प्रमाणपत्र या जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। हम आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश में योजना विभाग ने सभी विभागों को निर्देश जारी किए हैं कि आधार कार्ड को जन्म प्रमाणपत्र मानने की प्रक्रिया तुरंत रोकी जाए, क्योंकि आधार में जन्म प्रमाणपत्र संलग्न नहीं होता और इसलिए इसे कानूनी रूप से जन्मतिथि का प्रमाण नहीं माना जा सकता। योजना विभाग के विशेष सचिव अमित सिंह बंसल ने सभी विभागों को यह आदेश भेजा है। इस आदेश के बाद आधार कार्ड को जन्म प्रमाणपत्र के रूप में स्वीकार करना अवैध हो गया है।

इसी तरह महाराष्ट्र सरकार ने भी आदेश जारी करते हुए कहा है कि आधार कार्ड के आधार पर विलंबित जन्म प्रमाणपत्र (Delayed Birth Certificate) जारी नहीं किए जाएंगे। राज्य के राजस्व विभाग की सूचना के अनुसार, जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) अधिनियम 2023 लागू होने के बाद केवल आधार के आधार पर बने सभी जन्म प्रमाणपत्र रद्द कर दिए जाएंगे। साथ ही, ऐसे प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं।

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राजस्व विभाग की 16-बिंदु सत्यापन गाइडलाइन में कहा गया है कि 11 अगस्त 2023 के संशोधन के बाद डिप्टी तहसीलदारों द्वारा जारी आदेशों को वापस लिया जाए और उन्हें जिला कलेक्टर या सक्षम प्राधिकारी स्तर पर पुनः सत्यापित किया जाए।

हम आपको बता दें कि यह निर्णय ऐसे समय आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग संदर्भ में, बिहार की मतदाता सूची में शामिल करने के लिए आधार को पहचान पत्र के रूप में स्वीकार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष की मांग पर चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि विशेष तीव्र संशोधन (SIR) प्रक्रिया के दौरान आधार को अन्य 11 अनुमत दस्तावेजों के साथ पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाए।

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभी जिलाधिकारियों को अवैध प्रवासियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताएँ हैं और किसी भी अवैध गतिविधि को सहन नहीं किया जाएगा। सरकारी बयान के अनुसार, सभी जिलों को अपने क्षेत्र में रहने वाले अवैध प्रवासियों की पहचान कर नियमों के अनुसार कार्रवाई करने को कहा गया है। साथ ही हर जिले में अस्थायी निरुद्ध केंद्र (Detention Centres) बनाने के निर्देश दिए गए हैं, जहाँ विदेशी नागरिकता वाले अवैध प्रवासियों को सत्यापन पूरा होने तक रखा जाएगा। सत्यापन के बाद उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उनके मूल देश भेज दिया जाएगा।

उत्तर प्रदेश की नेपाल से खुली सीमा होने के कारण नेपाली नागरिकों का आवागमन बिना प्रतिबंध के है, जबकि अन्य देशों के नागरिकों के लिए जांच आवश्यक है। यह निर्देश ऐसे समय दिए गए हैं जब देशभर में चल रही SIR प्रक्रिया के तहत 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष संशोधन का काम चल रहा है, जिसकी अंतिम सूची 7 फरवरी 2026 को जारी होगी।

देखा जाये तो आधार कार्ड को जन्म प्रमाणपत्र के स्थान पर अस्वीकार करने का उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार का निर्णय प्रशासनिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण लेकिन आवश्यक सुधार की ओर संकेत करता है। पिछले कई वर्षों में आधार को अनेक दस्तावेजों के लिए ‘सर्वस्वीकृत’ प्रमाण की तरह इस्तेमाल किया गया, लेकिन यह तथ्य नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि आधार केवल पहचान का साधन है, जन्म का प्रमाण नहीं। जन्म प्रमाणपत्र एक कानूनी दस्तावेज है, जिसका आधार अभिलेखीय सत्यापन होता है, न कि स्वयं घोषित या अप्रमाणित जानकारी। इसलिए इन राज्यों का निर्णय तकनीकी रूप से सही और प्रक्रियागत स्पष्टता की दिशा में उचित कदम कहा जा सकता है।

हालाँकि यह भी सच है कि इस निर्णय से लाखों नागरिकों को दस्तावेज़ी प्रक्रियाओं में कठिनाइयाँ आ सकती हैं— विशेषकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को, जिनमें कई लोग केवल आधार कार्ड को ही अपनी जन्मतिथि का मुख्य प्रमाण मानते आए हैं। इसलिए सरकारों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि विकल्पों की जानकारी, प्रमाणपत्र बनवाने की सरल प्रक्रिया और समयबद्ध सहायता उपलब्ध हो।

महाराष्ट्र सरकार द्वारा पहले से जारी आधार-आधारित जन्म प्रमाणपत्रों को रद्द करना और अधिकारियों पर कार्रवाई की चेतावनी यह दर्शाती है कि प्रशासन अब गंभीरता से रिकॉर्ड की शुद्धता सुनिश्चित करना चाहता है। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि आम नागरिकों पर इसका अनावश्यक बोझ न पड़े।

बहरहाल, आधार को जन्म प्रमाणपत्र के रूप में अस्वीकार करने का निर्णय प्रशासनिक शुद्धता की दृष्टि से उचित है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में नागरिकों की सुविधा, दस्तावेज़ों की सुलभता और अधिकारों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी ही होगी, तभी यह कदम वास्तव में सार्थक कहा जा सकेगा।

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