आखिर सेवा तीर्थ से उपजते सियासी सवालों के जवाब कब तक मिलेंगे?

By कमलेश पांडे | Feb 14, 2026

कहते हैं कि शब्द ब्रह्म है और हर शब्द अपने मंत्रमय भावमय अस्तित्व से आकार ग्रहण करते हुए देर-सबेर साकार होता है। इस दृष्टिकोण से दूरद्रष्टा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'नाम परिवर्तन' द्वारा जनमानस की सोच में बदलाव की जो मुहिम चलाई है, वह सुसंस्कृत भारत के निमित्त 'नाम/विचार परिवर्तन यात्रा' अनवरत रूप से जारी है। इसी कड़ी में हमारा 'गवर्नमेंट ऑफ भारत' अपने 'लोककल्याण मार्ग' (सेवन रेस कोर्स) व 'कर्तव्य पथ' (राजपथ) होते हुए अब 'सेवा तीर्थ' (पीएमओ) तक के अपने वैचारिक सफर को पूरा कर चुका है। 

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देखा जाए तो अमृत भारत और विकसित भारत के दृष्टिगत ये नाम, विचार व भवन बदलाव यात्रा गतिमान है, जिसके नीति आयोग (योजना आयोग) जैसे अहम सियासी व प्रशासनिक मायने हैं। लिहाजा, विपक्ष इस आधुनातन सोच-समझ की आलोचना अपने तरीके से कर रहा है, लेकिन यहां हम मीडिया यानी चौथे स्तम्भ के नाते इस अहम निर्णय से जुड़े जनपक्ष को लेकर कुछ सवाल उठाएंगे और जवाब भी मिले, इसकी प्रतीक्षा करेंगे। 

यह ठीक है कि प्रधानमंत्री कार्यालय का पता औपनिवेशिक दौर की साउथ ब्लॉक इमारत से बदलकर अब सेवा तीर्थ परिसर हो गया है। प्रधानमंत्री ने अपने नए ऑफिस से महिलाओं, किसानों और युवाओं से जुड़े कई अहम फैसले भी लिए। इससे मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि, "सेवा परमो धर्म की भावना ही नए सेवा तीर्थ परिसर की आत्मा है। यह केवल भवन नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण के संकल्प का प्रतीक है। आज का संकल्प और परिश्रम ही आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करेगा। चूंकि शासन का केंद्र अब नागरिक हैं। इस भवन में लिया गया हर निर्णय 140 करोड़ देशवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से होना चाहिए।"

इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक कहा कि "आजादी के बाद नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक जैसी इमारतों से देश के लिए नीतियां बनीं, कई निर्णय हुए। यह भी सच है कि ये पुरानी इमारतें ब्रिटिश हुकूमत का, गुलामी का प्रतीक थी। गुलामी की इस मानसिकता से बाहर निकलना जरूरी था। साल 2014 में देश ने यह तय किया कि गुलामी की मानसिकता और नहीं चलेगी। हमारे इन फैसलों के पीछे हमारी सेवा भावना है।" 

यदि उनके नजरिए से देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेवा तीर्थ जैसे लोकतांत्रिक तीर्थ के उद्घाटन के मौके पर यह कहकर बौद्धिक हलचल मचा दी है कि "पुरानी इमारतें ब्रिटिश हुकूमत का, गुलामी का प्रतीक थी। गुलामी की इस मानसिकता से बाहर निकलना जरूरी था। साल 2014 में देश ने यह तय किया कि गुलामी की मानसिकता और नहीं चलेगी। हमारे इन फैसलों के पीछे हमारी सेवा भावना है।"

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुलामी के किन-किन प्रतीकों को बदलेंगे और कब तक बदलेंगे? और क्या इसकी कोई समय सारणी तय हुई है या फिर इनमें भी वह ईसाइयों द्वारा निर्मित भवन को पहले और मुस्लिम शासकों द्वारा निर्मित भवन को बाद में बदलेंगे? क्योंकि बहुमत प्राप्ति के दृष्टिगत सियासत भी जरूरी है और गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति भी! क्योंकि भारत तो इस्लामिक आक्रमणकारियों और ईसाई कारोबारियों दोनों का 800 वर्षों तक गुलाम रहा है। 

वहीं खास बात तो यह कि देश को गुलाम बनाए रखने का बौद्धिक हथियार यानी फूट डालो और शासन करो (डिवाइड एंड रूल) जैसे गुलामी मंत्र " जाति आधारित आरक्षण" और " धर्म आधारित अल्पसंख्यक" वाले सोच को प्रधानमंत्री कब तक बदलेंगे? या फिर हिंदुओं व मुस्लिमों में कभी फूट डालने और कभी एक जुट करने के ये हथियार अकसर नया धार पाते रहेंगे? 

साथ ही, मुगलिया दस्ता के प्रतीक और मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा निर्मित उस "लालकिला" परिसर को कब तक बदलेंगे, जहां पर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री हर वर्ष राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फ़हराते हैं और राष्ट्रीय हित व जनहित से जुड़े अपने महत्वपूर्ण सम्बोधन देते आये हैं। जी हां, देशवासी पूरी राम कथा जानना चाहते हैं! क्योंकि कुछ तो उनके शागिर्दों के सियासी हथियार तक बन चुके हैं।

यह ठीक है कि राम मंदिर निर्माण (कथित बाबरी मस्जिद के भग्नावशेष पर) करके और नया संसद भवन व कर्तव्य भवन 1 और 2 (ब्रिटिश शासकों द्वारा निर्मित भवनों के बगल में या उनकी जगह पर) का निर्माण करके, जिसमें सेवा तीर्थ भी शामिल है, प्रधानमंत्री ने यादगार शुरुआत कर दी है, लेकिन आगे कहां तक, कब तक यह प्रक्रिया जारी रहेगी, लोगों में जानने की उत्सुकता है, क्योंकि गुलामी की दासता के ढेर से प्रतीक अब भी हमारे शासन प्रतिष्ठान और जनमानस को मुंह चिढ़ाते प्रतीत हो रहे हैं, जिन्हें अविलंब बदला जाना चाहिए।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को पहले अपने नए पीएम ऑफिस 'सेवा तीर्थ' की शुरुआत की। फिर शाम को कर्तव्य भवन 1 और 2 का लोकार्पण किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री के साथ केंद्रीय मंत्रियों मनोहर लाल खट्टर और डॉ. जितेंद्र सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, प्रधान सचिव पी. के. मिश्रा और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति भी रही, जिनकी अहम मौजूदगी में प्रधानमंत्री ने इन नवनिर्मित परिसरों का लोकार्पण किया। 

अब यहां पर सरकार के कई बड़े दफ्तर और मंत्रालय एक ही जगह पर होंगे। चूंकि पहले ये दफ्तर अलग-अलग जगहों पर, पुराने भवनों में चलते थे। इसलिए काम में देरी होती थी, क्योंकि अफसरों को एक-दूसरे से मिलने में परेशानी होती थी और आम लोगों को भी अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे। लेकिन अब सेवा तीर्थ परिसर में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय एक साथ काम करेंगे। यानी देश के बड़े फैसलों से जुड़े दफ्तर एक ही जगह होगे, जिससे फैसले जल्दी होंगे और कामकाज में तालमेल बेहतर रहेगा। 

यही नहीं, चूंकि कर्तव्य भवन-1 और 2 में कई अहम मंत्रालयो को जगह दी गई है। इनमें वित्त, रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, कानून, सूचना एवं प्रसारण, संस्कृति, रसायन एवं उर्वरक, जनजातीय कार्य और कॉरपोरेट कार्य जैसे मंत्रालय शामिल है। इसका फायदा यह होगा कि लोगों को अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग जगह भटकना नहीं पड़ेगा। 

पीएम नरेंद्र मोदी ने सेवा तीर्थ के उद्घाटन के बाद महिलाओं, युवाओं, किसानों और कमजोर वर्गों के कल्याण से जुड़ी महत्वपूर्ण फाइलों पर हस्ताक्षर किए। उनके प्रमुख फैसले में पीएम राहत योजना के तहत दुर्घटना पीड़ितों को 1.5 लाख रुपये तक कैशलेस इलाज की सुविधा, ताकि तत्काल चिकित्सा सहायता से जान बचाई जा सके। और लखपति दीदी लक्ष्य के अंतर्गत महिलाओं के लिए लक्ष्य को दोगुना कर 6 करोड़ करना, आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देना शामिल है। 

वहीं अन्य निर्णय के तहत कृषि अवसंरचना निधि को दोगुना बढ़ाकर 2 लाख करोड़ रुपये करना, किसानों को मजबूत समर्थन देना शामिल है। जबकि स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0 को मंजूरी, युवाओं और उद्यमियों के लिए नई संभावनाएँ खोली जाएंगी। इस प्रकार ये फैसले सेवा तीर्थ के 'नागरिक देवो भव' मंत्र को साकार करते हैं, जो 12-13 फरवरी 2026 को लिए गए।

हालांकि कुछ आलोचक लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि सेवा तीर्थ द्वारा अब आरक्षण जैसे मेवा का प्रसाद मुंह देखकर बांटा जाएगा और कथित सामाजिक न्याय आधारित हिंदुत्व के जयकारे चटखारे पूर्वक लगते रहें, इसके मुकम्मल इंतजाम किए जाएंगे। इस प्रकार यह एक नया राजनीतिक-सामाजिक तीर्थ बना दिया जाएगा। शायद भारत इसी कोशिश से विश्व गुरु बन जाये।

- कमलेश। पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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