ब्रह्मपुत्र पर प्रोजेक्ट बनाने वाले चीन को मोदी ने दिया जवाब, नदी के नीचे सुरंग बनाने का किया ऐलान

By नीरज कुमार दुबे | Feb 14, 2026

मोदी सरकार पूर्वोत्तर को सामरिक और आर्थिक शक्ति का केंद्र मानकर योजनाएं बनाती है और स्वयं प्रधानमंत्री जिस तरह लगातार पूर्वोत्तर क्षेत्र के दौरों के माध्यम से इस क्षेत्र के विकास की गति को रफ्तार देते हैं उसकी बदौलत हाल के वर्षों में यहां की दशा दिशा में बड़ा बदलाव आया है। आज भी असम के डिब्रुगढ़ के पास मोरान बाइपास पर चीन सीमा के करीब बनी आपात लैंडिंग सुविधा पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उतर कर बड़ा सामरिक संदेश दिया। साथ ही गोहपुर से नुमालीगढ़ तक प्रस्तावित चार लेन हरित मार्ग और ब्रह्मपुत्र के नीचे सड़क और रेल सुरंग परियोजना मिलकर सुरक्षा, संपर्क और समृद्धि की नई कहानी लिख रहे हैं। यह संयोग नहीं, स्पष्ट रणनीति है।

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यह सुविधा चीन सीमा से लगभग 300 किमी दूरी पर है। यदि किसी हालात में मुख्य हवाई अड्डे निशाने पर आएं, तो ऐसी पट्टियां वायु सेना को संचालन जारी रखने का विकल्प देती हैं। अलग अलग राजमार्गों पर ऐसे बिंदु बनाकर भारत एक तरह का फैलाव आधारित वायु रक्षा जाल तैयार कर रहा है, जिसे निष्क्रिय करना किसी भी विरोधी के लिए कठिन होगा।

इसका महत्व केवल युद्ध तक सीमित नहीं है। बाढ़, भूकंप या किसी आपदा के समय यही पट्टियां राहत का जीवन मार्ग बन सकती हैं। भारी विमान सीधे राहत सामग्री, बचाव दल और चिकित्सा सहायता लेकर दूर दराज इलाकों तक पहुंच सकते हैं। पूर्वोत्तर जैसे संवेदनशील और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में यह क्षमता अमूल्य है।

अब बात दूसरी बड़ी पहल की। केंद्र सरकार ने गोहपुर से नुमालीगढ़ तक लगभग 33.7 किमी लंबे चार लेन नियंत्रित हरित मार्ग को मंजूरी दी है। इसकी लागत 18,662 करोड़ रुपए है। इस परियोजना का सबसे साहसिक हिस्सा है ब्रह्मपुत्र के नीचे 15.79 किमी लंबी टिवन ट्यूब सड़क और रेल सुरंग। यह केवल इंजीनियरिंग का कमाल नहीं, रणनीतिक सोच का उदाहरण है।

अभी गोहपुर से नुमालीगढ़ पहुंचने में करीब 240 किमी और छह घंटे लगते हैं। नया मार्ग समय और दूरी दोनों घटाएगा। इससे असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और अन्य राज्यों में माल ढुलाई तेज होगी, लागत घटेगी और व्यापार बढ़ेगा। यह मार्ग कई आर्थिक केंद्र, पर्यटन स्थल, रसद बिंदु, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे और जलमार्ग टर्मिनल को जोड़ेगा। अनुमान है कि इससे लाखों मानव दिवस का रोजगार बनेगा।

इस परियोजना का सामरिक अर्थ भी गहरा है। चीन अक्सर ब्रह्मपुत्र पर या उसके आसपास नई जल और ढांचा परियोजनाओं की घोषणा करता रहा है, जिससे निचले क्षेत्रों में चिंता पैदा होती है। ऐसे माहौल में भारत का ब्रह्मपुत्र के नीचे टिवन ट्यूब सुरंग बनाना एक मजबूत संदेश है। भारत दिखा रहा है कि वह नदी को डर या विवाद का विषय नहीं, बल्कि विकास और संपर्क का माध्यम मानता है। नदी के ऊपर ही नहीं, नीचे से भी संपर्क मजबूत किया जा सकता है।

यह कदम यह भी बताता है कि भारत पूर्वोत्तर को स्थायी रूप से देश की मुख्यधारा के ढांचे से जोड़ना चाहता है। तेज सैनिक आवाजाही, बेहतर रसद, मजबूत आर्थिक संपर्क और पर्यटन को बढ़ावा, सब एक साथ साधे जा रहे हैं। यह बहुस्तरीय सोच ही किसी क्षेत्र को हाशिये से केंद्र में लाती है।

सच यह है कि लंबे समय तक पूर्वोत्तर को नीति में उतनी प्राथमिकता नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी। कठिन भूगोल और कम आबादी को बहाना बनाया गया। पर अब ढांचा निर्माण की रफ्तार बदली है। सड़क, रेल, हवाई संपर्क और डिजिटल ढांचा, हर दिशा में काम दिखता है। यह बदलाव केवल कागज पर नहीं, जमीन पर दिख रहा है।

मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर को रणनीतिक नजर से देखने की नीति अपनाई है। सुरक्षा और विकास को अलग अलग खाने में नहीं, एक साथ रखा गया है। यही कारण है कि रनवे बनी सड़क और नदी के नीचे सुरंग एक ही दौर में दिखती है। यह सोच बताती है कि आने वाले समय में पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा ढाल भी होगा और आर्थिक द्वार भी।

-नीरज कुमार दुबे

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