नीतीश ने नहीं दिया साथ, RJD ने भी नहीं लिया हाथों-हाथ, अब अखिलेश की शरण में निषाद!

By अभिनय आकाश | Mar 30, 2022

वीआईपी सुप्रीमो मुकेश सहनी ने शायद 2020 में ये सोचा भी नहीं होगा कि वो जब मंत्री बन रहे थे तो केवल 496 दिनों के लिए ही इस पद पर रहेंगे और उसके बाद उनकी हैसियत पूर्व मंत्री की हो जाएगी। दर्शन ऐसा ही कुछ हुआ है और पिछले 1 हफ्ते में बिहार में तेजी से घटनाक्रम बदल रहे हैं। मुकेश सहनी को बीते दिनों राज्यपाल के द्वारा नीतीश मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया है। जिसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए विकासशील इंसान पार्टी के मुखिया मुकेश सहनी ने कहा कि मैं आज फिर से संघर्ष करने के रास्ते पर निकला हूं। 

मुकेश सहनी ने कहा था कि वह मंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगे। उन्होंने सारा फैसला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर छोड़ दिया था कि वही फैसला करें कि उन्हें मंत्री पद पर बनाए रखना चाहते हैं या बर्खास्त करना चाहते हैं। मुकेश सहनी को लगा कि नीतीश अपने को मजबूत करने की चाहत से उनका साथ नहीं छोड़ेंगे। लेकिन बदलती भी परिस्थिति में नीतीश बीजेपी से किसी भी तरह का पंगा लेने की स्थिति में नहीं है। नतीजतन जैसे ही बीजेपी ने दबाव बढ़ाया नीतीश ने सहनी को बाहर का रास्ता दिखाया।

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आरजेडी ने भी सुनाई खरी-खोटी

पूर्व में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले महागठबंधन के साथ रहते हुए सहनी ने चुनाव की घोषणा के बाद विपक्षी खेमा छोड़ दिया था। दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठक के बाद सहनी की पार्टी राजग में शामिल हो गई।   बिहार में विधानसभा चुनाव में सहनी की पार्टी को चार सीटों पर सफलता मिली लेकिन वह खुद चुनाव हार गए। लेकिन सहनी को मंत्री बनाया गया और वह विधान परिषद के लिए चुने गए। लेकिन इसके बावजूद भी मुकेश सहनी बीजेपी को ही आंखे दिखाने लगे। मुकेश सैनी को लगा था कि वह जब बीजेपी के खिलाफ अभियान बुलंद करेंगे तो उन्हें राष्ट्रीय जनता दल का साथ मिलेगा लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। राबड़ी देवी ने मुकेश सहनी को खूब खरी-खोटी भी सुनाते हुए कहा कि मुकेश सहनी को अब लालू प्रसाद क्यों याद आ रहे हैं? राजद में मुकेश सहनी के लिए कोई जगह नहीं है। पार्टी में पहले ही कई बड़े निषाद नेता मौजूद हैं। कहा तो ये भी जा रहा है कि तेजस्वी ने तो सहनी का फोन उठाना भी बंद कर दिया है। 

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अखिलेश देंगे साथ 

यूपी चुनाव में बीजेपी के हाथों एक बार फिर पराजित होने के बाद अखिलेश प्रदेश की अति पिछड़ी जातियों की गोलबंदी में लगे हुए हैं। एक वक्त निषाद वोट बैंक पर सपा का अच्छा खासा दबदबा रहता था। कभी निषाद समुदाय से आने वाली फूलन देवी सपा में ही हुआ करती थी। बाद में जब योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने से खाली हुई गोरखपुर सीट से अखिलेश ने निषाद पार्टी के प्रवीण निषाद को गोरखपुर से चुनाव लड़वाया और उनकी जीत भी हुई। लेकिन बाद के बदलते घटनाक्रम के बाद अब आलम ये है कि निषाद समुदाय के नेता संजय निषाद बीजेपी के साथ है। उनके बेटे को बीजेपी ने अपने सिंबल पर सांसद भी बनाया हुआ है। ऐसे में राज्य में अखिलेश को एक बड़े निषाद चेहरे की तलाश है। कहा जा रहा है कि बिहार के नेताओं से निराश मुकेश सहनी अब अखिलेश यादव की शरण में जाने की तैयारी है। 

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