West Bengal की सत्ता के बाद Mamata Banerjee के हाथ से पार्टी भी गई! 60 विधायकों वाला विद्रोही गुट अब TMC के चुनाव चिह्न पर ठोंक सकता है दावा

By नीरज कुमार दुबे | Jun 03, 2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज उस समय बड़ा भूचाल आ गया जब तृणमूल कांग्रेस में विभाजन हो गया और कोलकाता के मेयर पद से फिरहाद हकीम के इस्तीफे के साथ ही देश के एक बड़े नगर निकाय से तृणमूल कांग्रेस का वर्षों पुराना शासन खत्म हो गया। जहां तक पार्टी में विभाजन की बात है तो हम आपको बता दें कि निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी ने विधानसभा पहुंचकर नेता प्रतिपक्ष पद पर दावा ठोक दिया और अपने साथ 59 विधायकों के समर्थन का दावा किया। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने उनके दावे को स्वीकार करते हुए उनके गुट को मान्यता दे दी साथ ही उन्हें नेता प्रतिपक्ष कक्ष की चाबियां भी सौंप दीं। 

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हम आपको बता दें कि तृणमूल नेतृत्व ने वरिष्ठ नेता सोवंदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने का फैसला किया था, लेकिन विद्रोही खेमे ने इसे मानने से इंकार कर दिया। विद्रोही विधायकों ने एक पत्र सौंपा है जिसमें ममता बनर्जी को दल का नेता, रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष तथा शेउली साहा, जावेद खान, संदीपन साहा और सबीना यासमीन को उपनेता घोषित किया गया। गौरतलब है कि 294 सदस्यीय विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के पास कुल 80 विधायक हैं। विद्रोही गुट का दावा है कि उनके पास दो तिहाई से अधिक विधायकों का समर्थन है, जिससे यदि भविष्य में दल बदल की स्थिति बनती है तो वे दलबदल विरोधी कानून से बच सकें।

यह पूरा विवाद चुनाव परिणाम आने के बाद तेजी से बढ़ा। भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी की सरकार बनने के बाद तृणमूल कांग्रेस में बैठकों से विधायकों की गैरहाजिरी चर्चा का विषय बनने लगी। छह मई को ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक में 80 में से 71 विधायक पहुंचे थे। 19 मई को यह संख्या घटकर 65 रह गई और 31 मई तक केवल 20 विधायक ही बैठक में उपस्थित हुए। इससे साफ संकेत मिला कि पार्टी के भीतर असंतोष गहराता जा रहा है।

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संकट तब और बढ़ गया जब रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से शिकायत की कि नेता प्रतिपक्ष नियुक्ति संबंधी पत्र में उनके हस्ताक्षर जाली तरीके से इस्तेमाल किए गए हैं। दोनों नेताओं का आरोप था कि जिस बैठक में प्रस्ताव पारित होने का दावा किया गया, वैसी कोई प्रक्रिया हुई ही नहीं। उनका कहना था कि उपस्थिति पंजिका में किए गए हस्ताक्षरों को प्रस्ताव पत्र पर दिखा दिया गया। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने दोनों विधायकों को दल विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया।

निष्कासन के बाद संदीपन साहा ने पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि पार्टी अनैतिक काम करने वालों का समर्थन करती है और नैतिक बात उठाने वालों को बाहर निकाल देती है। वहीं रितब्रत बनर्जी ने आरोप लगाया कि चुनाव हार के बाद भी पार्टी आत्ममंथन करने की बजाय अभिषेक बनर्जी के लिए तालियां बजवाने में लगी रही। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी में फैसले अब लोकतांत्रिक तरीके से नहीं हो रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विद्रोही गुट ने ममता बनर्जी पर सीधा हमला नहीं किया है। उनका निशाना मुख्य रूप से अभिषेक बनर्जी और उनके बढ़ते प्रभाव को माना जा रहा है। विद्रोही विधायकों के पत्र में भी ममता बनर्जी को ही नेता स्वीकार किया गया है। रितब्रत बनर्जी ने साफ कहा कि ममता बनर्जी अब भी उनकी नेता हैं और उनके प्रति सम्मान बना हुआ है। लेकिन उन्होंने अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि विधानसभा में उनकी कोई संवैधानिक हैसियत नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संघर्ष केवल नेता प्रतिपक्ष पद का विवाद नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर उत्तराधिकार की लड़ाई का संकेत है। पिछले कुछ वर्षों में अभिषेक बनर्जी पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में उभरे हैं। वे रणनीतिकार, प्रचारक और संगठन के प्रमुख चेहरे बन गए हैं। लेकिन पार्टी के पुराने नेताओं का एक वर्ग खुद को लगातार किनारे किया हुआ महसूस कर रहा है। चुनावी हार के बाद यह असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है।

इस बीच, विश्लेषकों ने इस पूरे घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र की राजनीति से की है। वहां शिवसेना में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में दो तिहाई विधायकों के विद्रोह ने पार्टी को तोड़ दिया था। तृणमूल नेताओं का आरोप है कि कुछ विधायक बंगाल में भी वैसा ही मॉडल लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने भी इस संकट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पुलिस विधायकों को डराकर पार्टी तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने विद्रोहियों की तुलना मीर जाफर से की और कहा कि कुछ लोग नई तृणमूल बनाने का सपना देख रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा ने इसे तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक संकट बताया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने कहा कि उनकी पार्टी तृणमूल नेताओं के लिए अपने दरवाजे नहीं खोलेगी और भाजपा का तृणमूलीकरण कभी नहीं होगा।

इस बीच, हस्ताक्षर विवाद की जांच भी तेज हो गई है। कई विधायकों ने जांच दल को बताया कि प्रस्ताव पत्र पर बने हस्ताक्षर उनके नहीं हैं। इस मामले में अभिषेक बनर्जी को भी पूछताछ के लिए बुलाया गया है। वहीं तृणमूल कांग्रेस ने एक नया पत्र भेजकर फिर से सोवंदेब चट्टोपाध्याय के नाम का समर्थन किया, लेकिन इस पर भी कानूनी सवाल उठ रहे हैं। देखा जाये तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह संकट आने वाले दिनों में और गंभीर रूप ले सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तृणमूल कांग्रेस इस विद्रोह को संभाल पाएगी या फिर महाराष्ट्र की तरह पार्टी में स्थायी विभाजन देखने को मिलेगा। यहां सवाल यह भी है कि विधायक दल में विभाजन के बाद अब क्या तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके चुनाव चिह्न पर भी विद्रोही गुट अपना दावा ठोंकेगा?

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