परमार के इस्तीफे के बाद हिमाचल भाजपा में असंतोष की चिंगारी सुलगने लगी

By विजयेन्दर शर्मा | Nov 25, 2021

शिमला। हिमाचल प्रदेश में सत्ताधारी दल भाजपा में इन दिनों सब ठीक नहीं चल रहा । पार्टी में उपचुनावों में मिली करारी हार के बाद कोर ग्रुप और राज्य कार्यकारिणी की बैठक शिमला में चल रही है। तो दूसरी और पार्टी के नेताओं का पार्टी से इस्तीफा देने का सिलसिला शुरू हो गया है।  हालांकि कोर ग्रुप व प्रदेश भाजपा की बैठक में पार्टी की हार के कारणों पर मंथन होना था। लेकिन इससे पहले ही भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष व राज्यसभा के पूर्व सांसद कृपाल परमार ने अपने पद से इस्तीफा देकर सभी को चौंका दिया। 

दरअसल, हाल ही में संपन्न उपचुनावों में पार्टी के प्रमुख दावेदार परमार थे। लेकिन आखिरी समय में उनका टिकट कट गया। व पार्टी ने उनके धुर विरोधी रहे बलदेव सिंह को मैदान में उतारा। इससे परमार की नाराजगी का खमियाजा पार्टी को भुगतना पडा और भाजपा चुनाव हार गईं। चुनावों के दौरान ही परमार और संगठन मंत्री पवन राणा के बीच मनमुटाव की बातें सोशल मिडिया के जरिये सार्वजनिक हुई थीं। परमार के समर्थक आरोप लगाते रहे हैं कि उनके नेता का टिकट पवन राणा की वजह से ही कटा है। इसी के चलते परमार ने पार्टी नेतृत्व को तानाशाही करार देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 

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राष्ट्रीय भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के करीबी माने जाने वाले परमार, जिन्हें कांगड़ा के फतेहपुर से विधानसभा उपचुनाव के लिए टिकट से वंचित कर दिया गया था, ने पिछले महीने कहा था कि उनके जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेता वर्तमान व्यवस्था में अपमानित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने पार्टी के मंच पर इन मुद्दों को उठाने की कोशिश की, लेकिन कुछ नहीं कहा गया क्योंकि लोग सुनने को तैयार नहीं थे।

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इस्तीफे से पार्टी में संकट पैदा हो सकता है क्योंकि आशंका है कि कुछ और इस्तीफे आ सकते हैं। कोर ग्रुप और राज्य कार्यकारिणी की बैठक को उपचुनाव की हार का विश्लेषण करने और सुधारात्मक उपाय करने के लिए बुलाया गया था ताकि पार्टी 2022 के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पूरी तरह से तैयार हो सके। परमार का इस्तीफा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के एक वर्ग के बीच बढ़ते असंतोष को और बढ़ा सकता है, जिन्हें लगता है कि पार्टी के फैसलों में उनकी कोई भूमिका नहीं है क्योंकि वरिष्ठ नेतृत्व बहुत निरंकुश तरीके से व्यवहार करता है। 

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इससे पहले, पूर्व मंत्री और ज्वालामुखी से मौजूदा विधायक रमेश धवाला ने भी वरिष्ठ नेताओं के कामकाज की तानाशाही शैली और उनके निर्वाचन क्षेत्र में हस्तक्षेप के खिलाफ अपनी नाराजगी व्यक्त की थी।  उन्होंने खुलकर संगठन मंत्री पवन राणा को निशाने पर लिया था। व आरोप लगाया कि राणा इलाके में पार्टी को कमजोर कर रहे हैं।

परमार ने हालांकि कहा कि उन्होंने सिर्फ पार्टी के पद से इस्तीफा दिया है, पार्टी से नहीं। भाजपा के वरिष्ठ नेता कृपाल सिंह परमार ने कहा, “मुझे पिछले 6 महीनों से पार्टी में परेशान किया जा रहा है। मेरे लिए यही सही था कि इस्तीफा दे दूं। तो मैंने प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है।“ पार्टी का जिक्र करते हुए परमार ने यह भी कहा, “पिछले कुछ सालों से पार्टी में मेरी उपेक्षा की जा रही थी। हिमाचल प्रदेश में ऐसे मैं पार्टी के पद पर नहीं रह सकता।

भाजपा को उपचुनावों में कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा क्योंकि वह मंडी लोकसभा सीट और साथ ही पिछले महीने हुए तीन विधानसभा उपचुनावों में हार गई थी। जुब्बल-कोटखाई उपचुनाव में अपनी जमानत भी गंवा चुकीं नीलम सरेक ने उनसे सलाह किए बिना मंडल इकाई में पदाधिकारियों की नियुक्ति करने पर नाराजगी व्यक्त की है।

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इस बीच ,सोलन जिला भाजपा के अध्यक्ष रहे व सिरमौर जिला के प्रभारी एवं प्रदेश कार्यसमिति सदस्य पवन गुप्ता ने भी दोनों पदों से त्याग पत्र दे दिया है। उन्होंने छह माह से पार्टी में लगातार प्रताड़ित किए जाने का आरोप लगाया है। उन्होंने पार्टी प्रदेश अध्यक्ष सुरेश कश्यप को अपना इस्तीफा भेज दिया है। इसके अलावा इस्तीफे के कारण को लेकर अलग से पत्र लिखा है।

उधर , प्रदेश भाजपा प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने कहा की कुछ इस्तीफे सोशल मीडिया पर चल रहे है पर पार्टी तो अभी किसी भी व्यक्ति का इस्तीफा नही मिला है, हमारे कार्यकर्ताओं ने पद छोड़ा है पार्टी नहीं। उन्होंने कहा की पद तो समय के साथ आते जाते रहते है। उन्होंने कहा कि चुनावों में जीत हार तो एक प्रक्रिया है और भाजपा हर चुनाव के लिए तैयार है।  

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