ईरान को सबक सिखाने के लिए साम दाम दंड भेद की नीति अपना रहे हैं ट्रंप

By नीरज कुमार दुबे | Feb 07, 2026

अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी चरम पर होने के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया कार्यकारी आदेश जारी कर उन सभी देशों पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की चेतावनी दी है जो ईरान के साथ किसी भी तरह का व्यापार जारी रखेंगे। आदेश में शुल्क की दर तय नहीं की गई है, पर उदाहरण के तौर पर पच्चीस प्रतिशत का जिक्र है। साफ कहा गया है कि जो भी देश सीधे या परोक्ष रूप से ईरान से सामान या सेवा खरीदेगा, उस पर यह शुल्क लगाया जा सकता है। ट्रंप ने अलग से बयान देते हुए दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं मिलना चाहिए।

अमेरिका का कहना है कि वह केवल परमाणु कार्यक्रम नहीं, बल्कि ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, सशस्त्र समूहों को समर्थन और अपने नागरिकों के साथ व्यवहार जैसे मुद्दे भी बातचीत में शामिल करना चाहता है। दूसरी ओर तेहरान का रुख साफ है कि चर्चा केवल परमाणु कार्यक्रम पर होगी और उसे यूरेनियम संवर्धन का अधिकार मिलना चाहिए। ईरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और वह हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा।

हम आपको बता दें कि इस तनातनी की जड़ें पिछले एक दशक में लिए गए फैसलों में हैं। वर्ष 2015 के परमाणु समझौते के तहत ईरान को सीमित स्तर तक यूरेनियम संवर्धन की अनुमति थी और उस पर सख्त निगरानी थी। बदले में उस पर लगे कई प्रतिबंध हटाए गए थे। लेकिन ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में वर्ष 2018 में इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया था और कठोर प्रतिबंध फिर लगा दिए थे। तेल निर्यात, जहाजरानी और बैंक तंत्र पर पाबंदियों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी चोट दी। जवाब में ईरान ने समझौते की कई शर्तों से आगे बढ़ कर संवर्धन करना शुरू कर दिया।

बीते वर्षों में हालात और बिगड़े। वर्ष 2020 में ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी अमेरिकी हमले में मारे गए, जिससे टकराव खतरनाक स्तर पर पहुंच गया। फिर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध फिर लगाने की कोशिशें हुईं। वर्ष 2025 में अमेरिका ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया, जिसके बाद ईरान ने कतर में एक अमेरिकी ठिकाने पर मिसाइल दागी, हालांकि जान का नुकसान नहीं हुआ। पिछले वर्ष पश्चिमी देशों के प्रयास से संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सैन्य प्रतिबंध फिर लागू हुए।

अब ताजा कदम के तहत अमेरिका ने ईरानी तेल और पेट्रो रसायन से जुड़े पंद्रह संस्थानों और कई जहाजों पर भी प्रतिबंध लगाए हैं। उधर इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सुरक्षा मंत्रिमंडल की बैठक बुलाकर ईरान को चेताया कि किसी भी हमले का जोरदार जवाब मिलेगा। उनका कहना है कि अमेरिका के साथ तालमेल बहुत गहरा है, इसलिए अंतिम फैसला ट्रंप ही करेंगे। ट्रंप ने भी कहा है कि ईरान बातचीत इसलिए कर रहा है क्योंकि वह अमेरिकी हमले से बचना चाहता है और अमेरिकी नौसैनिक बेड़ा इलाके में आगे बढ़ रहा है।

सवाल यह है कि क्या यह पूरी कवायद शांति की राह है या दबाव की राजनीति का नया दौर? ट्रंप का शुल्क हथियार दरअसल आर्थिक घेराबंदी का विस्तार है। संदेश साफ है कि जो ईरान से नाता रखेगा, वह अमेरिकी बाजार से हाथ धो सकता है। यह नीति कई देशों को कठिन दुविधा में डालेगी, खासकर वे देश जो ऊर्जा जरूरतों के लिए ईरानी तेल पर निर्भर हैं। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री रास्तों की सुरक्षा और पश्चिम एशिया की सामरिक स्थिरता पर सीधा असर पड़ेगा।

सामरिक दृष्टि से यह रस्साकशी खतरनाक है। एक ओर बातचीत चल रही है, दूसरी ओर युद्ध की तैयारी जैसे संकेत दिए जा रहे हैं। बेड़े की तैनाती, मिसाइल की चर्चा और प्रतिबंधों की बौछार मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं जहां एक छोटी चिंगारी भी बड़े संघर्ष में बदल सकती है। ईरान भी झुकने के मूड़ में नहीं दिखता और वह बार बार अपने अधिकार की बात दोहरा रहा है।

बहरहाल, हकीकत यह है कि न तो केवल दबाव से समाधान निकलेगा, न केवल बयान से। यदि दोनों पक्ष सच में टकराव टालना चाहते हैं तो उन्हें भरोसे की बहाली, चरणबद्ध रियायत और स्पष्ट लक्ष्यों की राह पकड़नी होगी। वरना शुल्क, प्रतिबंध और हमले का यह चक्र पूरे इलाके को अस्थिर कर देगा और इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर दूर तक जाएगा। अभी भी समय है कि शक्ति प्रदर्शन की जगह समझदारी दिखाई जाए, नहीं तो आने वाले दिन और ज्यादा उथल पुथल लेकर आ सकते हैं।

-नीरज कुमार दुबे

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