भगदड़ के बाद (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jul 03, 2025

कहीं भीड़ हो जाए और वक़्त की बदकिस्मती के कारण भगदड़ में परिवर्तित हो ले, कुछ लोग मर जाएं, काफी लोग नरक में चले जाएं, हो सकता है चुनिंदा लोग स्वर्ग में जगह पा लें लेकिन ऐसी दुर्घटना के बाद बैठक ज़रूरी हो जाती है। इत्तफाक की बात यह है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए समझदार लोग हों न हों लेकिन भीड़ के अनियंत्रित होने के बाद मची भगदड़ के बाद आयोजित हुई बैठक में कई बार भीड़ इक्कठी हो जाती है जहां हर कोई श्रद्धांजलि पकड़ाना चाहता है।

  

वैसे गलती तो भीड़ बनने वालों की है लेकिन एक बार मिली ज़िंदगी में, कुछ विशाल आयोजनों की भीड़ में शामिल नहीं हुए तो क्या किया। जब भीड़ भगदड़ में तब्दील हो जाएगी तो कुछ लोगों को मारेगी कुछ को घायल करेगी, उसके बाद ही तो प्रबंधन विचार कर सकता है कि क्या व्यवस्था होनी चाहिए। जो काम हो नहीं सकते उनके बारे सोच विचार किया जाता है कि होने चाहिए। कह रहे हैं कि प्रबंधन की विस्तृत रिहर्सल होनी चाहिए। मॉक ड्रिल होनी चाहिए। आयोजक, पुलिस और प्रशासन का समन्वय पहले से होना चाहिए। अभी तक पता नहीं चला कि सरकारी विभाग समन्वय क्या होता है जी।

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नैसर्गिक बुद्धि तो फेल हो चुकी है अब तो एआई ही बताए कि अमुक आयोजन में कितनी भीड़ हो सकती है और कितना तेज़ी से मूव कर सकती है। आसमान में खूब ड्रोन उडाएं जाएं जो रियल टाइम मानिटरिंग करें। स्पष्ट दिशा निदेश देने के इंतजाम हों। इलाके में चप्पे चप्पे पर सीसीटीवी लगाए जाएं जिनका स्वास्थ्य ठीक हो जो थोड़ा मुश्किल हो सकता है। प्रवेश बिंदु और क्रासिंग टर्न पर भीड़ की भगदड़ हो जाने की आशंका ज़्यादा होती है इसलिए वहां मेडिकल टीम तैनात हो ताकि चोट लगते ही सहायता मिल सके, यह सही सलाह है। कहते हैं बैरीकेड लगाए जाएं हालांकि भीड़ को ऐसी चीज़ें पसंद नहीं आती इसलिए इन्हें हटा देती हैं। भीड़ का मनोविज्ञान समझने वाले प्रशिक्षित वालंटियर खुद भीड़ का हिस्सा हो जाते हैं।  

एक दिलचस्प सुझाव आया कि प्रति वर्ग मीटर जगह में दो से ज्यादा लोग न हों। इनमें से ज्यादातर बातें हैं, बातों का क्या। हमारे यहां भीड़ जमा होने से पहले ही आसन, प्रशासन और अनुशासन सुरक्षित जगह पर शरण ले लेता है। मज़ेदार यह है कि भीड़ में हुई भगदड़ के बाद जो बैठक आयोजित होती है उसमें पेश किए जा रहे विभिन्न विचारों और सलाहों का प्रबंधन उग्र भीड़ प्रबंधन से कम कठिन नहीं होता। मीटिंग स्थल के बाहर भी वाहनों की भीड़ रेंगती रहती है। सिर्फ एक वाहन चालक, ट्रैफिक को परेशान कर देता है। कुछ दूरी पर ट्रैफिक कर्मचारी मोबाइल से रिलेक्स हो रहे होते हैं। 

बैठक में हम ऐसी बातों पर विचार नहीं कर सकते कि जहां जितनी जगह है उसके हिसाब से उचित अनुमान लगाकर, श्रद्धालुओं या खेल प्रेमियों को क्यूं नहीं भेज सकते, क्यूंकि हमारे यहां भीड़ की भगदड़ में, भीड़ की तरह तरह की भावनाओं की भीड़ भी तो होती है। 

- संतोष उत्सुक

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