तीरथ सिंह रावत के बाद बंगाल में ममता बनर्जी की कुर्सी पर भी मंडरा रहा 'संवैधानिक संकट'

By अंकित सिंह | Jul 03, 2021

भले ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर तीरथ सिंह रावत के इस्तीफे को अलग-अलग तरह से देखा जा रहा हो। लेकिन यह बात भी सच है कि कहीं ना कहीं उनके इस्तीफे के पीछे संवैधानिक संकट भी था। तीरथ सिंह रावत किसी सदन के सदस्य नहीं थे और ऐसे में वर्तमान हालात को देखते हुए उपचुनाव होना भी मुश्किल लग रहा था। पौड़ी से लोकसभा सदस्य रावत ने इस वर्ष 10 मार्च को मुख्यमंत्री का पद संभाला था और संवैधानिक बाध्यता के तहत उन्हें छह माह के भीतर यानी 10 सितंबर से पहले विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होना था। जनप्रतिनिधित्‍व अधिनियम, 1951 की धारा 151ए के मुताबिक निर्वाचन आयोग संसद के दोनों सदनों और राज्‍यों के विधायी सदनों में खाली सीटों को रिक्ति होने की तिथि से छह माह के भीतर उपचुनावों के द्वारा भरने के लिए अधिकृत है, बशर्ते किसी रिक्ति से जुड़े किसी सदस्‍य का शेष कार्यकाल एक वर्ष अथवा उससे अधिक हो। 

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जब कराए जा रहे थे तब राजनीतिक दलों ने आरोप लगाया था कि आयोग लोगों की जान से खेल रहा है। अब जब तक कोविड-19 संकट कम नहीं हो जाता तब तक आयोग इस तरह का रिस्क लेता दिखाई नहीं दे रहा। ममता ने हालात को समझते हुए विधान परिषद वाला रास्ता निकालने की कोशिश की थी। उन्होंने विधानसभा के जरिए प्रस्ताव भी पास कराया लेकिन यह लोकसभा की मंजूरी के बगैर संभव नहीं है। केंद्र सरकार के साथ ममता बनर्जी के रिश्ते जगजाहिर है। ऐसे में विधान परिषद वाला रास्ता फिलहाल उनके लिए मुश्किल ही नजर आ रहा है। यह अलग बात है कि ममता ने रिश्तो में मिठास घोलने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा और केंद्र के बड़े मंत्रियों को बंगाल के मशहूर आम जरूर भेजे थे।

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