By दिव्यांशी भदौरिया | Nov 01, 2026
आज यानी 1 नवंबर 2026 को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जा रहा है। इस दिन महिलाएं अपने संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं। इस व्रत के रखने से अहोई माता से बच्चों की दीर्घायु का आशीर्वाद पाने के लिए यह व्रत निर्जला रखा जाता है।
अहोई माता कौन हैं?
हिंदू धर्म में अहोई माता को मां पार्वती का स्वरुप मानकर पूजा जाता है। इन्हें खासतौर पर संतान की की रक्षा करने वाली माता माना जाता है। इनकी पूजा से बच्चों का भाग्य अच्छा होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अहोई माता का स्वरुप सही जैसा दिखाया जाता है और माना जाता है कि प्राचीन समय में एक महिला थी जिसके पुत्र थे।
एक दिन वह खेत में पौधों के लिए मिट्टी खोद रही थी और उसी समय उसने गलती से साही के बच्चों को मार दिया। वो महिला अपनी गलती पर बहुत दुखी हुई और उसने माता पार्वती से क्षमा प्रार्थना की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता ने उसे आशीर्वाद दिया कि उसकी संतान सुरक्षित रहेगी। उस समय माता पार्वती ने जिस स्वरूप में महिला को दर्शन दिए उसे ही अहोई माता के रूप में पूजा जाता है और उन्हें स्याहु माता के नाम से भी जाना जाता है।
अहोई माता का स्वरूप कैसा है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, अहोई माता को मां पार्वती का अवतार माना जाता है। इनके स्वरुप को पुतली के आकार में दीवार पर गेरू से या कागज के चित्र में उकेरा जाता है। माता चित्र ऐसे बनाया जाता है जिसमें आठ कोनों वाला घर की एक पुतली बनाई जाती है। माता अहोई के चित्र के साथ ही साही और उसके बच्चों की आकृतियां बनाई जाती है, इनका संबंध इससे जुड़ी पौराणिक कथा से हैं। वहीं, माता के चित्रण में सूर्य, चंद्रमा भी दिखाई देते हैं।
अहोई अष्टमी का व्रत का महत्व
अहोई अष्टमी का व्रत रखने के पीछे साही के बच्चों की कहानी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अहोई अष्टमी व्रत करने से अहोई माता संतान को दीर्घायु प्रदान करती हैं और उन्हें अच्छी सेहत का आशीर्वाद देती हैं। धार्मिक मान्यता है कि व्रती महिला के बच्चों सहित पूरे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। यहीं नहीं ऐसा माना जाता है कि यदि नि:संतान महिला भी इस व्रत को करती हैं, तो उसे संतानसुख की प्राप्ति होती है।