By अभिनय आकाश | Oct 24, 2026
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा शनिवार को मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन स्थित SEM कोर्ट के सामने पेश हुईं। इससे एक दिन पहले, दिल्ली हाई कोर्ट ने बोरा की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने कोर्ट के उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें उनसे जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए ज़मानत के साथ 10,000 रुपये का बॉन्ड भरने को कहा गया था। कोर्ट की कार्यवाही के दौरान, SEM कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे नेहा बोरा के वकील को सभी दस्तावेज़ सौंप दें। स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने वकील को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर को तय की गई है। नेहा बोरा की ओर से पेश वकील अभिक चिमनी ने कहा कि उनकी कानूनी टीम आज मिले सभी दस्तावेज़ों का विश्लेषण करेगी और उसी के अनुसार आगे की कार्रवाई करेगी। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि जिसे भी हिरासत में लिया जाता है, उसे यह जानने का अधिकार है कि उसके खिलाफ क्या आरोप हैं। साथ ही, उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर भी मिलना चाहिए। हमने नेहा बोरा को मिले 'शो कॉज़ नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
इससे पहले शुक्रवार को, दिल्ली उच्च न्यायालय ने AISA अध्यक्ष के खिलाफ शुरू की गई निवारक (प्रिवेंटिव) कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) द्वारा बोरा को जारी किया गया 'शो-कॉज नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) कानून की आवश्यकताओं को पूरा करता है, और इस चरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किए गए सुरक्षा उपायों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है। जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद ने कहा कि यह नोटिस SEM द्वारा पुलिस रिपोर्ट, उससे जुड़े दस्तावेजों और संबंधित पुलिस अधिकारी के बयानों पर विचार करने के बाद जारी किया गया था। SEM ने यह राय बनाई कि 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। अदालत ने कहा कि 'मधु लिमये बनाम सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट, मुंगेर' मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का इस चरण में कोई उल्लंघन नहीं हुआ है। अदालत ने बोरा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने इस नोटिस को चुनौती दी थी। इस नोटिस में AISA अध्यक्ष से यह बताने को कहा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए उन्हें 10,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड और इतनी ही राशि की एक जमानत (श्योरिटी) क्यों नहीं देनी चाहिए। यह फैसला नोटिस के चरण में ही निवारक कार्यवाही शुरू करने को न्यायिक समर्थन देता है, जबकि यह तय करने का अधिकार SEM पर छोड़ देता है कि अंततः बॉन्ड की आवश्यकता है या नहीं। अदालत ने कहा, "यह नोटिस BNSS के अध्याय IX के तहत एक 'शो-कॉज नोटिस' की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है।" साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि आगे की कार्यवाही के दौरान SEM को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन किया जाए।