अखिलेश अच्छे इंजीनियर और अच्छे मुख्यमंत्री नहीं बन पाये...कम से कम अच्छा इंसान तो बन जायें

By संजय सक्सेना | Dec 17, 2021

एक बार फिर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हिन्दुओं की आस्था को ठेस पहुंचाने वाला गैर-जरूरी बयान दिया है। मोदी और योगी को घेरने के चक्कर में अखिलेश यादव जाने-अनजाने प्रदेश की जनता को भी अपमानित कर रहे हैं। कभी वह सीता-राम और राधा-कृष्ण की जोड़ी के बहाने पूछते हैं कि मोदी-योगी की जोड़ी कहां है तो कभी संतों को चिलमजीवी बता देते हैं। अबकी से उन्होंने मोदी-योगी के काशी जाने और बाबा विश्वनाथ के मंदिर का लोकार्पण करने पर यहां तक कह दिया कि अंतिम समय में लोग काशी ही जाते हैं, इसके बाद उन पर हर तरफ से निशाना साधा जा रहा है। दरअसल, हुआ यूं कि सैफई में सोमवार को पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात के बाद अखिलेश से जब पीएम मोदी और योगी के वाराणसी में कार्यक्रम को लेकर प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने कहा कि बहुत अच्छी बात है, वो जगह रहने वाली है, आखिरी समय में वहीं काशी में रहा जाता है। इसलिए प्रधानमंत्री को एक महीने की बजाय तीन महीने तक बनारस में रहना चाहिए। हालांकि विवाद बढ़ने के बाद अखिलेश ने सफाई देते हुए कहा है की उनका मतलब सरकार से था, उनकी बात को गलत ढंग से पेश किया गया। इसके साथ ही अखिलेश ने प्रधानमंत्री के दीर्घायु होने की कामना भी की।

उधर, राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि अखिलश यादव धीरे-धीरे अपनी शालीनता खोते जा रहे हैं। 2012 में जब उन्हें उनके पिता और पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव ने जब अपनी जगह बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया था, तब लोगों को लग रहा था कि प्रदेश को एक पढ़ा-लिखा और तकनीकी ज्ञान रखने वाला सीएम मिल रहा है, इससे प्रदेश का भला होगा, लेकिन कुछ ही समय में यह धारणा चूर-चूर हो गई। कौन भूल सकता है कि किस तरह से भरी सभा में अखिलेश ने अपने पिता मुलायम सिंह और चाचा शिवपाल यादव को अपमानित किया था। जिस तरह से अखिलेश की भाषा का स्तर गिर रहा है और वह मर्यादा खोते जा रहे हैं, उससे समाजवादी पार्टी का कुछ भला नहीं होगा, नुकसान जरूर उठाना पड़ सकता है।

बहरहाल, मोदी-योगी के लिए चुनौती बन रहे अखिलेश हों या अन्य नेता इन्हें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि प्रदेश की जनता मजबूत और मर्यादित विपक्ष चाहती है। यही लोकतंत्र को मजबूती देता है। अखिलेश ऐसे नेता हैं जो कुछ समय पूर्व तक इस श्रेणी में खरे उतर रहे थे। लोगों को उनसे गंभीर राजनीति की अपेक्षा रहती है। इसलीए यह जरूरी हो गया था कि उन्हें भाषायी हल्केपन से दूर रहना चाहिए था। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब अखिलेश ने हिन्दुओं और साधु-संतों की भावनाओं से खिलवाड़ किया है। इससे पूर्व 19 नवंबर को पूर्वांचल के गाजीपुर में पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर अपनी विजय यात्रा के चौथे चरण के दौरान अखिलेश यादव ने संतों को चिलमजीवी और एक रंग वाले कहकर संबोधित किया था। इस पर वाराणसी अखिल भारतीय संत समिति ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश से माफी मांगने को कहा था। अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने अखिलेश यादव से कहा कि या तो वो संतों से माफी मांगें या संतों के गुस्से का सामना करने के लिए तैयार रहें। इसी तरह से 10 अक्टूबर को पश्चिमी यूपी के जिला सहारनपुर में उन्होंने एक रैली को संबोधित किया, जिसमें अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर विवादित बयान दिया और उन पर पर्सनल अटैक किया। राधा-कृष्ण, सीता-राम की जोड़ी का जिक्र करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि आदित्यनाथ की तो कोई जोड़ी ही नहीं है जबकि हिन्दू धर्म में योगी की पहचान ही यही होती है कि वह गृहस्थ आश्रम से दूर रहता है।

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सपा प्रमुख विवादित बयानबाजी तो लम्बे समय से कर रहे हैं, लेकिन अबकी से उनके बयान को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव बीजेपी के निशाने पर हैं। उनके अंतिम समय वाले बयान पर हंगामा मच गया है। यह विवादित टिप्पणी उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए की है। पीएम मोदी के काशी दौरे पर उन्होंने तंज कसा है। जब सपा अध्यक्ष से इस पर प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने बड़ी अटपटी बात कही। वह बोले कि अंतिम समय में काशी से अच्छी जगह कोई और नहीं है। ऐसे में प्रधानमंत्री को एक महीने के बजाय तीन महीने तक बनारस में रहना चाहिए। अखिलेश क्या बोल गए इसका मतलब तो शायद उन्हें खुद नहीं समझ आया होगा। हालांकि, इसने बीजेपी को उन पर बरसने का मौका जरूर दे दिया।

    

लब्बोलुआब यह है कि यूपी में 2017 के चुनाव से पहले तक अखिलेश यादव की छवि बहुत शालीन नेता की रही है। सपा को वोट नहीं देने वाले लोग भी अखिलेश के लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखते थे। इसके पीछे वजह थीं। वह युवाओं को प्रेरित करते थे। उनकी बातें करते और उठाते थे। कम लेकिन धारदार तरीके से अपनी बात रखते थे। जो लोग देश में मजबूत विपक्ष देखना चाहते हैं, अखिलेश उन्हें उम्मीद देते थे। आज भी उनसे लोग गंभीर राजनीति की अपेक्षा करते हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या वह शालीन युवा नेता वाली छवि गंवा रहे हैं?

     

नहीं भूलना चाहिए कि अखिलेश उन युवा नेताओं में से एक हैं जिनकी योग्यता और शख्सियत पर कुछ समय पूर्व तक सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता था। सार्वजनिक जीवन में वह बड़ी सादगी से रहते हैं। बातचीत का लहजा भी उतना ही सॉफ्ट था। इसके कारण उनकी कड़वी बातें भी कड़वी नहीं लगतीं थी। यह बात उन्हें दूसरे नेताओं से अलग करती थीं। अखिलेश की अलग सोच के चलते ही उनकी पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल से किसी समय तकरार बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। पहले मुलायम, अखिलेश की मुफ्त लैपटॉप वितरण योजना और लखनऊ मेट्रो रेल परियोजना से काफी नाखुश थे। उन्होंने इसके लिए खुले मंचों पर अखिलेश सरकार की आलोचना की थी। हालांकि, बाद में मुलायम का नजरिया भी बदल गया था, लेकिन पारिवारिक कलह के चलते तो अखिलेश की गरिमा लगातार गिरती रही। जो सार्वजनिक जीवन जीने वाले किसी शख्स के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।

    

सपा प्रमुख में जो बदलाव दिख रहे हैं, संभवतः उसकी बुनियाद 2.017 में समाजवादी पार्टी को विधान सभा चुनाव में मिली हार के साथ ही पड़ गई थी। पारिवारिक कलह के बीच सपा 2017 के चुनावी मैदान में उतरी। उस समय तक बीजेपी का प्रदेश में डंका बजने लगा था। बीजेपी ने प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। सपा सत्ता से बेदखल हो गई। इसके बाद से ही अखिलेश में भी बदलाव दिखने लगे। वह गैर-जरूरी और उटपटांग भाषण देने के कारण सुर्खियों में आने लगे। अखिलेश ने कोरोना वैक्सीन पर भी बेवजह का बयान दिया। इसके कारण वह सुर्खियों में आए। अखिलेश ने कहा था कि वह वैक्सीन नहीं लगवाएंगे क्योंकि उन्हें बीजेपी पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा था कि मैं बीजेपी की वैक्सीन पर कैसे भरोसा कर सकता हूं। जब हमारी सरकार बनेगी तो सभी को मुफ्त वैक्सीन मिलेगी। हम बीजेपी की वैक्सीन नहीं लगवा सकते हैं। बाद में उन्होंने न केवल खुद वैक्सीन लगवाई बल्कि सभी से ऐसा करने की अपील भी की थी।

-संजय सक्सेना

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