यूपी की राजनीति में पहले बाहुबली थे हरिशंकर तिवारी, चिल्लूपार में आज भी चलता है उनका सिक्का

यूपी की राजनीति में पहले बाहुबली थे हरिशंकर तिवारी, चिल्लूपार में आज भी चलता है उनका सिक्का

साल 2012 में मिली हार के बाद से हरिशंकर तिवारी ने चुनाव नहीं लड़ा। उनकी आयु भी काफी अधिक हो चुकी है। वर्तमान में उनकी उम्र 85 वर्ष हो चुकी है। लेकिन आज भी चिल्लूपार में उनका प्रभाव है। वे अपने क्षेत्र के लोगों के यहां शादी ब्याह में दिख जाते हैं।

1980 के दशक में पूर्वांचल के गोरखपुर से माफिया की शुरुआत होती है। हम बात कर रहे हैं हरिशंकर तिवारी (Hari Shankar Tiwari) की। ये वही हरिशंकर तिवारी हैं जिन्हें राजनीति के अपराधीकरण के लिए जाना जाता है। यूपी की राजनीति में हरिशंकर तिवारी उस वक्त चर्चा में आ जाते हैं जब 1985 में वे गोरखपुर की चिल्लूपार सीट से विधानसभा चुनाव लड़ते हैं और जेल की चारदीवारी के अंदर रहते हुए चुनाव जीत जाते हैं। इसके बाद हरिशंकर तिवारी के लिए राजनीति का दरवाजा खुल जाता है। बता दें कि लोग हरिशंकर तिवारी को प्यार से बाबूजी कहकर बुलाते हैं। यूपी विधानसभा चुनाव ज्यों-ज्यों करीब आ रहे हैं प्रदेश में राजनीतिक उठापटक तेज होती जा रही है।

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पूर्वांचल की राजनीति में उठा पठक चालू हो गई है। पूर्वांचल के बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी के विधायक बेटे विनय शंकर तिवारी की अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने उनके पूरे कुनबे को (भाई कुशल तिवारी और रिश्तेदार गणेश पांडेय सहित) पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। माना जा रहा है कि यह कुनबा जल्द ही समाजवादी पार्टी में शामिल हो सकता है लेकिन यदि ऐसा होता है तो यह बसपा के साथ-साथ भाजपा के लिए चिंता का विषय हो सकता है। लिहाजा दोनों पार्टियों के रणनीतिकार तिवारी परिवार के अगले कदम पर नज़र रखे हुए हैं। 

राजनीति में एक समय ऐसा था जब इंदिरा गांधी के खिलाफ जय प्रकाश नारायण मोर्चा खोले हुए थे। इस दौरान छात्र जेपी के साथ और इंदिरा के खिलाफ विरोध कर रहे थे। लेकिन पूर्वांचल में अलग ही कहानी चल रही थी। पूर्वांचल में माफिया, शक्ति और सत्ता की लड़ाई शुरू हो चुकी थी। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के छात्र यहां बंदूकों की नाल साफ कर रहे थे। यही वह पल है जब हरिशंकर तिवारी की राजनीति में एंट्री होती है। लंबे समय से मूलभूत सुविधाओं से वंचित इस क्षेत्र के युवाओं की दिलचस्पी कट्टों और खतरनाक हथियारों में आ गई। जेल में रहते हुए हरिशंकर तिवारी चुनाव जीते और साल 1997 से लेकर 2007 तक वे लगातार यूपी में मंत्री बने रहे। वह 22 सालों तक चिल्लूपार सीट से विधायक रहे। तिवारी को केवल 2 बार हार मिली। वह पहली बार साल 2007 में और दूसरी बार साल 2012 में चुनाव हारे। भाजपा, सपा, बसपा सभी सरकारों में वे कई मंत्रालयों को संभालते रहे।

वैसे तो सीधे तौर पर हरिशंकर तिवारी पर लगे आरोप अभी तक साबित नहीं हुए हैं लेकिन कहते हैं कि उन्होंने ही क्षेत्र में माफिया राज की शुरुआत की। कॉलेज के दौरान से ही छात्रों पर नजर रखी जाने लगी। जो छात्र जितना अव्वल और तेज तर्रार होते उन्हें उतनी ही जल्दी माफियाओं की शरण मिल जाती थी। इन्हीं छात्रों में एक था श्रीप्रकाश शुक्ला जिसे पूरा उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि उत्तर भारत जानता है।

हरिशंकर तिवारी के मुताबिक वे राजनीति में इसलिए आए क्योंकि उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने उन पर झूठे केस लगाकर जेल भेज दिया था। हरिशंकर तिवारी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह पहले प्रदेश कांग्रेस के सदस्य थे। इंदिरा गांधी के साथ काम कर चुके हैं, लेकिन चुनाव कभी नहीं लड़ा। तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा किए गए उत्पीड़न के कारण उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया। 1980 के दशक में हरिशंकर तिवारी के खिलाफ गोरखपुर जिले में 26 मामले दर्ज किए गए। इन मामलों में हत्या करवाना, हत्या की कोशिश, किडनैपिंग, छिनैती, रंगदारी, वसूली, सरकारी काम में बाधा डालने जैसे न जाने कितने ही मामले थे। लेकिन हरिशंकर तिवारी आज तक किसी भी आरोप में दोषी नहीं पाए गए हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे खुद जुर्म नहीं करते थे। बता दें कि गोरखपुर में राजपूतों के नेता माने जाने वाले वीरेंद्र शाही की हत्या भी उस समय श्रीप्रकाश शुक्ला ने की थी। हालांकि बाद में श्रीप्रकाश शुक्ला और हरिशंकर तिवारी के बीच मनमुटाव भी देखने को मिला था। कहते हैं कि इसी हत्या के बाद पूर्वांचल और यूपी की किस्मत में अपराध और माफियाराज स्थापित हो गया।

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पूर्वांचल में 1980 के दशक में विकास कार्यों हेतु सरकारी परियोजनाओं का आगमन हुआ। लेकिन सरकारी परियोजनों पर भी वर्चस्व हमेशा बाहुबलियों का रहा है। ऐसे में हरिशंकर तिवारी के पाले में पूरे पूर्वांचल का ठेका जाने लगा। पूर्वांचल में एक समय ऐसा भी था, जब सभी ठेके खुद ब खुद तिवारी को मिलने लगे क्योंकि उनके खिलाफ खड़ा होने के लिए कोई नहीं था। ऐसे में पूर्वांचल के रेलवे, कोयले सप्लाई, खनन, शराब इत्यादि अन्य तरह के सभी ठेकों पर हरिशंकर तिवारी और उनके लोगों का कब्जा रहा। अगर पूर्वांचल और बिहार के कुछ हिस्सों को देखे तो ऐसा अमूमन पाया जाता है कि जो शख्स किसी के लिए माफिया, बाहुबली या दंगाई होता है, वही किसी और के लिए रॉबिनहुड और भगवान भी होता है। पूर्वांचल में ऐसा हर बाहुबली, माफिया के साथ है। ऐसा ही कुछ हरिशंकर तिवारी के लिए भी कहा जा सकता है क्योंकि इतने आरोप के बावजूद चिल्लूपार की जनता उन्हें बार-बार जिताती रही और विधानसभा भेजती रही।

साल 2012 में मिली हार के बाद से हरिशंकर तिवारी ने चुनाव नहीं लड़ा। उनकी आयु भी काफी अधिक हो चुकी है। वर्तमान में उनकी उम्र 85 वर्ष हो चुकी है। लेकिन आज भी चिल्लूपार में उनका प्रभाव है। वे अपने क्षेत्र के लोगों के यहां शादी ब्याह में दिख जाते हैं। साल 2017 से बसपा के टिकट पर उनके बेटे विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार सीट से विधायक चुने गये। हरिशंकर तिवारी के लिए कहा जाता है कि यूपी और पूर्वांचल की राजनीति में अगर आपको दिलचस्पी है तो आप हरिशंकर तिवारी से प्यार या नफरत कर सकते हैं, उन्हें अपराधी या रॉबिनहुड मान सकते हैं लेकिन उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। बता दें कि हरिशंकर तिवारी फिलहाल अपने गोरखपुर के जटाशंकर मुहल्ले में किलेनुमे घर में रहते हैं। इस घर को तिवारी हाता के नाम से पूरे गोरखपुर व पूर्वांचल में जाना जाता है।

वैसे यूपी की मौजूदा राजनीति में काफी समय से यह परिवार चर्चा में नहीं रहा है लेकिन पूर्वांचल के जातिगत समीकरणों में इसकी दखल से कोई भी इंकार नहीं करता। 80 के दशक में हरिशंकर तिवारी और वीरेन्द्र प्रताप शाही के बीच वर्चस्व की जंग ने ब्राह्मण बनाम ठाकुर का रूप ले लिया था। माना जाता है कि इन्हीं दो बाहुबलियों के विधायक बनने के बाद यूपी की सियासत में बाहुबलियों की एंट्री शुरू हुई। हरिशंकर तिवारी चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र से लगातार छह बार विधायक रहे। कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और मुलायम सिंह यादव की सरकारों में कैबिनेट मंत्री रहे लेकिन 2007 के चुनाव में बसपा के राजेश त्रिपाठी ने उन्हें चुनाव हरा दिया।

इसके बाद भी यूपी की सियासत में तिवारी परिवार का रसूख कम नहीं हुआ। उनके बड़े बेटे कुशल तिवारी संतकबीरनगर से दो बार सांसद रहे तो छोटे बेटे विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार सीट से विधायक हैं। जबकि हरिशंकर तिवारी के भांजे गणेश शंकर पांडेय बसपा सरकार में विधान परिषद सभापति रहे हैं। अब कहा जा रहा है कि ये सभी नेता सपा में शामिल हो सकते हैं। 

तिवारी परिवार यदि सपा का दामन थामता है तो यह बसपा के साथ-साथ भाजपा के लिए भी चिंता का विषय हो सकता है। इसे जहां बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को झटका माना जा रहा है वहीं राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में ब्राह्मणों की नाराजगी भाजपा के लिए भी कुछ सीटों पर मुश्किल खड़ी कर सकती है। सपा-बसपा-कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दल ब्राह्मणों को लुभाने में जुटे हैं। भाजपा का कोर वोटर माना जाने वाला यह वर्ग यदि उससे दूर जाने के साथ ही किसी एक पार्टी के साथ लामबंद होता है तो यह परेशानी का कारण बन सकता है। 

पूर्व मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी के दोनों बेटे व भांजे पिछले डेढ़ दशक से बसपा में थे। जुलाई 2007 में उन्होंने बसपा ज्वाइन की थी। हालांकि पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी ने कभी बसपा की सदस्यता ग्रहण नहीं की। वह निर्दलीय ही चुनाव लड़ते रहे। विनय शंकर तिवारी ने बसपा के टिकट पर बलिया लोकसभा उप चुनाव से राजनीति में कदम रखा। वहां से चुनाव हार गए। वहीं 2008 में खलीलाबाद लोकसभा उप चुनाव में उनके बड़े भाई कुशल तिवारी बसपा से मैदान में उतरे और सांसद बने। 2009 में दोनों भाइयों को बसपा ने एक बार फिर प्रत्याशी बनाया। विनय शंकर गोरखपुर लोकसभा से तो वहीं खलीलाबाद से कुशल तथा महराजगंज लोकसभा सीट से गणेश शंकर पांडेय चुनाव मैदान में उतरे। इनमें कुशल अपनी सीट बचाने में कामयाब हुए तो वहीं बाकी दोनों लोग चुनाव हार गए। 2010 में गोरखपुर महराजगंज स्थानीय निकाय चुनाव में बसपा से गणेश शंकर पांडेय ने जीत हासिल की। उसके बाद उन्हें विधान परिषद का सभापति निर्वाचित किया गया। 2012 में विनय को बसपा ने सिद्धार्थनगर के बांसी से प्रत्याशी बनाया हालांकि वह चुनाव जीत नहीं पाए। चिल्लूपार विधानसभा से 2017 में चुनाव लड़ने के बाद विनय विधायक बने। जबकि गणेश शंकर पांडेय 2017 में बसपा से पनियरा से चुनाव लड़े लेकिन जीत नहीं मिली।

-गंगा मणि दीक्षित






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