By प्रज्ञा पांडेय | May 11, 2026
अपरा एकादशी व्रत ज्येष्ठ मास में आने वाली पहली एकादशी का नाम अपरा एकादशी है। हिन्दू धर्म में घर परिवार में भी सुख समृद्धि बनी रहती है तो आइए हम आपको अपरा एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
हिन्दू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 मई को दोपहर 2:52 बजे शुरू होगी और 13 मई को दोपहर 1:29 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत 13 मई 2026 को रखा जाएगा।
अपरा एकादशी व्रत में पारण (व्रत खोलना) का विशेष महत्व होता है। अपरा एकादशी का पारण 14 मई 2026 को किया जाएगा। पारण का सबसे अच्छा समय सुबह 6:04 से 8:41 बजे तक है।
पुराणों में अपरा एकादशी कथा को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं, इसमें एक कथा सबसे अधिक प्रचलित है। इस कथा के अनुसार महिध्वज नाम का एक शासक था, जो बहुत ही दयालु था। लेकिन, उसका छोटा भाई वज्रध्वज उससे एकदम विपरीत स्वभाव का था। उसने अपने मन में अपने भाई के खिलाफ द्वेष भर रखा था। उसे अपने भाई का व्यवहार पसंद नहीं आया। वह हमेशा ही इस फिराक में रहता था कि किस तरह से राज्य को हथिया लिया जाए। वह हमेशा अपने भाई को मारने और अपनी शक्ति और राज्य प्राप्त करने के अवसर की तलाश में रहता था। एक दिन मौका पाकर उसने अपने भाई को मार दिया और एक पीपल के पेड़ के नीचे दफना दिया। अकाल मृत्यु के कारण राजा की आत्मा भटकने लगी, वह उस पेड़ के पास से गुजरने वाले हर राहगीर को परेशान करने लगी। संयोगवश एक दिन एक ऋषि उसी रास्ते से गुजर रहे थे। जब उनका सामना उस आत्मा से हुआ, तो उन्होंने उस आत्मा से अब तक मोक्ष प्राप्ति न होने का कारण पूछा। राजा की आत्मा ने अपने साथ हुए विश्वासघात की सारी कहानी ऋषि को बता दी। इसके बाद उस ऋषि ने अपनी शक्ति से, आत्मा को मुक्त कर दिया और उसे जीवन के बारे में सिखाया।
राजा की मुक्ति के लिए, ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत रखा और उसे प्रेत योनि से छुटकारा पाने में मदद की। द्वादशी के दिन व्रत करने से प्राप्त पुण्य उन्होंने राजा की आत्मा को अर्पित कर दिया। अपरा एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो गई और प्रेत योनि से छुटकारा मिल गया।
हिंदू मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार इस एकादशी का महत्व भगवान कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को बताया था। जो व्यक्ति इस एकादशी व्रत और अनुष्ठान को करता है, वह अतीत और वर्तमान के पापों से छुटकारा पाता है और सकारात्मकता के मार्ग पर आगे बढ़ता है। इस एकादशी को करने का एक मुख्य कारण समाज में अपार धन, प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त करना है। यह भी माना जाता है कि जो व्यक्ति इस एकादशी के अनुष्ठान को अत्यंत भक्ति के साथ करके पुनर्जन्म और मृत्यु के इस चक्र से बाहर निकल सकता है और मोक्ष के अंतिम द्वार तक पहुंच सकता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग इस व्रत को करते हैं, उन्हें कार्तिक के महीने में गंगा में पवित्र डुबकी लगाने के बराबर लाभ मिलता है। अपरा एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा करने से जो पुण्य कर्म और कर्म होते हैं, वे एक हजार गायों का दान और यज्ञ करने के बराबर होते हैं। लेकिन इस एकादशी का लाभ प्राप्त करने के लिए इसे विधिपूर्वक करना जरूरी है क्योंकि अनुष्ठान और व्रत करना ही सफलता की कुंजी है।
पंडितों के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत रखने से वही पुण्य मिलता है जो कार्तिक महीने में स्नान करने या गंगा किनारे पिंडदान करने से मिलता है। इसके अलावा, गोमती नदी में स्नान, कुंभ मेले के दौरान केदारनाथ के दर्शन, बद्रीनाथ में निवास और सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान करने जितना फल भी इस व्रत से प्राप्त होता है।
पंडितों के अनुसार अपरा एकादशी के दिन उपवास रखने से शरीर को अपने पापों से छुटकारा मिल जाएगा और वह खुद को ब्रह्मांडीय महासागरों के सामने आत्मसमर्पण कर देगा यानि उसे मत्यु और जीवन के चक्र के जीवन से छुटकारा मिल जाएगा। सभी एकादशी को करने की मूल बातें कुछ हद तक समान हैं। अपरा एकादशी करने वाले भक्त को सुबह जल्दी उठना होता है और पूजा के लिए कोई भी अनुष्ठान शुरू करने से पहले स्नान करना होता है।
भगवान विष्णु की पूजा और पूजा के लिए पूर्व दिशा में पीले रंग का कपड़ा या लकड़ी का स्टूल भी रखा जाता है। भगवान विष्णु की तस्वीर में एक मूर्ति को कपड़े या लकड़ी के स्टूल पर बैठाया जाता है, उसके बाद दीया और अगरबत्ती जलाई जाती है। यह पूजा की शुरुआत का प्रतीक है, और अत्यंत भक्ति के साथ भगवान विष्णु से प्रार्थना करनी चाहिए। चंदन, पान, सुपारी, लौंग, फल और गंगाजल के साथ तुलसी के पत्ते डाले बिना भगवान विष्णु की गई पूजा अधूरी है। पूजा के बाद भक्त को कोई भोजन नहीं करना चाहिए और अपरा एकादशी व्रत कथा का पाठ करना चाहिए। प्रसाद तैयार कर भगवान विष्णु को चढ़ाया जाता है और फिर भक्तों में वितरित किया जाता है। कुछ पर्यवेक्षक भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए विष्णु मंदिरों में भी जाते हैं।
पुराणों के अनुसार अपरा एकादशी का पालन करने वाले व्यक्ति को एकादशी के एक दिन पहले से ही विधि शुरू कर देनी चाहिए। एकादशी 11वें दिन पड़ती है, इसलिए दशमी को सूर्यास्त के बाद भक्त को कुछ भी नहीं खाना चाहिए। सोने से पहले भगवान की पूजा करनी चाहिए। एकादशी के दिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। उन्हें हाथ में पानी और फूल लेकर व्रत शुरू करने और पूरा करने का संकल्प लेना होता है।
पंडितों के अनुसार एकादशी व्रत को विधिपूर्वक करें। सुबह भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें। विष्णु जी को पीला चंदन, पीले फूल अर्पित करें। व्रत कथा का पाठ करें। भोग में तुलसी के पत्ते जरूर शामिल करें। विष्णु चालीसा का पाठ और मंत्रों का जप करें। सात्विक भोजन का सेवन करें। द्वादशी तिथि पर दान करें। दिन में भजन-कीर्तन करें और पीले कपड़े धारण करें। इस दिन जल का दान जरूर करें और घर और मंदिर में गंगाजल का छिड़काव कर शुद्ध करें।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन चावल का सेवन भूलकर भी न करें। किसी से बातचीत के दौरान अभद्र भाषा का प्रयोग न करें। किसी के बारे में गलत न सोचें। वाद- विवाद न करें। एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें। तामसिक चीजों के सेवन से दूर रहें। इसके अलावा बड़े बुर्जुगों और महिलाओं का अपमान न करें। सुबह की पूजा के बाद दिन में सोना वर्जित है। घर और मंदिर में गंदगी न होने दें। एकादशी के दिन बाल कटवाना, शेविंग करना या नाखून काटना वर्जित है। झूठ न बोलें और चुगली करने से बचें।
- प्रज्ञा पाण्डेय