By एकता | Mar 29, 2026
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि नैतिक जिम्मेदारी को कानूनी जिम्मेदारी के तौर पर लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक बुजुर्ग दंपति की उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने अपने बेटे की मृत्यु के बाद अपनी बहू से गुजारा भत्ता दिलाने की मांग की थी।
जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने 4 फरवरी को दिए अपने फैसले में कहा कि समाज में बहू का अपने सास-ससुर की सेवा करना एक नैतिक जिम्मेदारी मानी जा सकती है, लेकिन कानून में इसका कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक कानून में लिखित आदेश न हो, तब तक किसी भी नैतिक भावना को कानूनी रूप से थोपा नहीं जा सकता।
बुजुर्ग दंपति ने 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' की धारा 144 के तहत राहत मांगी थी। कोर्ट ने इस पर गौर करते हुए कहा, 'यह धारा केवल पत्नी, बच्चों और माता-पिता को गुजारा भत्ता दिलाने का अधिकार देती है। कानून बनाने वालों ने सोच-समझकर 'सास-ससुर' को इस सूची से बाहर रखा है। इसलिए, इस कानून के तहत बहू को सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए आदेश नहीं दिया जा सकता।'
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पुराने फैसले को सही ठहराते हुए बुजुर्गों की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि बहू को नौकरी 'अनुकंपा' (बेटे की जगह) के आधार पर मिली थी। कोर्ट ने अंत में दोहराया कि गुजारा भत्ता केवल वही लोग मांग सकते हैं जो कानून द्वारा निर्धारित विशेष श्रेणियों में आते हैं।