By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Nov 03, 2026
लखनऊ, दो नवंबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या से यातायात जाम की समस्या पर चिंता जताते हुए सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर यह तय करे कि लखनऊ और अन्य शहरों में, जहां ई-रिक्शा की संख्या जरूरत से ज्यादा है, उनके नए पंजीकरण पर रोक लगाई जाए या नहीं। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति ए. के. चौधरी की पीठ ने अधिवक्ता सूरज सिंह बिसेन की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत को बताया गया कि लखनऊ में लगभग 1.33 लाख ई-रिक्शा चल रहे हैं जिनके कारण यातायात जाम की समस्या काफी बढ़ गई है।
पीठ ने कहा कि 12 मई, 2022 को जारी एक आदेश के तहत लखनऊ की कई सड़कों पर ई-रिक्शा के चलने पर पहले से प्रतिबंध है, लेकिन इन प्रतिबंधों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है। पीठ ने विशेष जांच दल (एसआईटी) को निर्देश दिया कि वह मौजूदा प्रतिबंधों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करे और अन्य उपयुक्त क्षेत्रों में भी इसी तरह के प्रतिबंध लगाने की संभावना पर विचार करे। हालांकि, अदालत ने कहा कि जहां भी प्रतिबंध लगाए जाएं, वहां यात्रियों को असुविधा से बचाने के लिए वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
अदालत ने अधिकारियों को अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई नौ दिसंबर को तय की। इसी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ ने कामता चौराहे और पॉलिटेक्निक-कामता-चिनहट मार्ग पर यातायात जाम की समस्या का स्थायी समाधान निकालने की जरूरत पर भी जोर दिया। अदालत को बताया गया कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-बीएचयू, वाराणसी अलग-अलग दिशाओं से आने-जाने वाले वाहनों की आवाजाही का स्वतंत्र आकलन करेगा, यातायात की स्थिति का कंप्यूटर आधारित अध्ययन करेगा और समस्या के समाधान के लिए कार्ययोजना तैयार करने के वास्ते तकनीकी एवं वित्तीय प्रस्ताव बनाएगा।
पीठ ने इस मामले में गठित समिति के प्रस्तावों और लखनऊ नगर निगम की ओर से उठाए गए कदमों की समीक्षा भी जारी रखी। अदालत ने संबंधित विभागों को निर्देश दिया कि वे इस क्षेत्र में यातायात व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए आपसी तालमेल से काम करें।