By अभिनय आकाश | Oct 08, 2026
रजिस्ट्रार (मध्यस्थता) भागीरथ वर्मा ने गुरुवार को कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट, उसकी लखनऊ बेंच और निचली अदालतों में लंबित मामलों वाले पक्षकार, चल रहे मीडिएशन फॉर द नेशन 3.0 अभियान के तहत मध्यस्थता के ज़रिए अपने विवाद सुलझा सकते हैं। यह अभियान 1 अक्टूबर को शुरू हुआ और 31 दिसंबर तक चलेगा। इससे पक्षकारों को लंबी कानूनी लड़ाई में पड़े बिना आपसी सहमति से विवाद सुलझाने का मौका मिलेगा। वर्मा ने कहा कि पक्षकार मध्यस्थता के लिए आगे आ सकते हैं और समझौते की संभावना तलाश सकते हैं। निचली अदालतों में चल रहे मामलों से जुड़े लोग संबंधित जिले के सिविल कोर्ट परिसर में काम करने वाली 'डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी' से संपर्क कर सकते हैं। वर्मा ने बताया कि जिन लोगों के मामले प्रयागराज में इलाहाबाद हाई कोर्ट या उसकी लखनऊ बेंच में चल रहे हैं, वे प्रयागराज में 'हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज़ कमिटी' या लखनऊ में उसकी सब-कमिटी से संपर्क कर सकते हैं।
इस कैंपेन में मध्यस्थता (mediation) के लिए उपयुक्त माने जाने वाले विवादों की 15 कैटेगरी शामिल हैं। इनमें शादी और परिवार से जुड़े विवाद, मोटर दुर्घटना के क्लेम केस, चेक-बाउंस के मामले, समझौता-योग्य आपराधिक मामले, कंज्यूमर विवाद, कर्ज वसूली और SARFAESI मामले, फैसले को लागू करने की कार्यवाही, आर्बिट्रेशन विवाद, कमर्शियल विवाद, सर्विस से जुड़े मामले, बंटवारे के केस, बेदखली के मामले, जमीन अधिग्रहण के केस और लेबर विवाद शामिल हैं। साथ ही, इसमें ऐसे अन्य सिविल मामले भी शामिल हैं जिनमें कानूनी तौर पर समझौता किया जा सकता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में मध्यस्थता समिति के चेयरमैन जस्टिस राजन रॉय ने बताया कि मध्यस्थता से विवादों के नतीजे पर पक्षकारों का ज्यादा कंट्रोल रहता है। पारंपरिक अदालती कार्यवाही के उलट, जिसमें कोर्ट दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद उनके अधिकारों पर फैसला करता है, मध्यस्थता में पक्षकारों को एक निष्पक्ष मध्यस्थ की मदद से समझौते की शर्तों पर बातचीत करने का मौका मिलता है। जस्टिस रॉय ने कहा कि इससे काफी समय, पैसा और तनाव बच सकता है, साथ ही अदालतों पर बोझ भी कम हो सकता है। उन्होंने कहा कि आपसी सहमति से हुआ समझौता रिश्तों को बनाए रखने और उससे जुड़े अन्य विवादों को सुलझाने में भी मदद कर सकता है।