By रेनू तिवारी | Oct 31, 2026
अदालत परिसरों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और न्यायिक कामकाज में डाली जा रही बाधाओं के बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण और सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि युवा अधिवक्ताओं को सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट और वीडियो पर ‘लाइक’ बटोरने के बजाय अपनी कानूनी पढ़ाई, मुकदमों की गहरी तैयारी और अपने पेशेवर जीवन (करियर) को संवारने पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।
अदालत ने यह टिप्पणी राजेश नाम के एक व्यक्ति की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन से इस मुद्दे पर विचार करने और उच्च न्यायालय की गरिमा बनाए रखने के लिए उचित कदम उठाने को कहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिवक्ताओं की गरिमा में निजी और सरकारी, दोनों क्षेत्रों में कार्यरत वकील शामिल हैं। यह मामला सुनवाई के दौरान उस समय सामने आया, जब विरोध प्रदर्शन कर रहे कुछ अधिवक्ताओं ने अन्य वकीलों को न्यायमूर्ति देशवाल के अदालत कक्ष में जाने से रोक दिया। इस दौरान अदालत ने एक महिला अधिवक्ता की आवाज सुनी, जो अपने मुकदमे की सुनवाई के लिए अदालत कक्ष में प्रवेश करना चाहती थी।
अदालत ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही केवल इसलिए नहीं रोकी जा सकती कि अधिवक्ताओं का एक वर्ग नहीं चाहता कि अदालत में कामकाज हो, जबकि अधिकांश वकील अपने मुकदमों की पैरवी करना चाहते हैं। अदालत ने कहा, ‘‘युवा अधिवक्ताओं को सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट पर लाइक बढ़ाने के बजाय पढ़ाई और अपने मुकदमों की तैयारी पर ध्यान देना चाहिए, ताकि वे अपना करियर बना सकें।’’ अदालत ने कहा, ‘‘कुछ अधिवक्ताओं का ऐसा आचरण बार और अदालत की प्रतिष्ठा तथा गरिमा के अनुकूल नहीं है।’’