International Yoga day 2025: योग के साथ ब्रह्मचर्य का पालन भी जरूरी

By बृजनन्दन राजू | Jun 20, 2025

आज सुख की खोज में है। दुनिया में अगर शांति स्थापित करना है और संपूर्ण मानवता को आरोग्य प्रदान करना है तो योग को अपनाना होगा। योग भारत की प्राचीन विद्या है। योग अनादि है। भारत के ऋषि मुनि व तपस्वियों ने मानव जाति के कल्याण के लिए योग को आवश्यक माना है। संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मने। अर्थात जीवात्मा का परमात्मा का मेल ही योग है। योग साधना द्वारा ही दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। योगधर्म जगत का एक मात्र पथ है। विश्वगुरू भारत पूरी दुनिया को योग के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहा है।  

भारत में हजारों वर्ष पूर्व से ऋग्वेद जैसा अकूत ज्ञान का भंडार और योग और आयुर्वेद जैसी प्राचीन विधा विद्यमान थी। अंग्रेजों के भारत में आने से पूर्व यहां की शिक्षा उत्तम थी। गांव-गांव गुरुकुल चलते थे। गुरुकुल में योग और आयुर्वेद के साथ-साथ 64 कलाओं की शिक्षा दी जाती थी। गुरू का जीवन भी आदर्श चरित्रवान व तपस्वी होता था। बालकों को कठोर परिश्रम करना पड़ता था। गुरू सेवा, गौ सेवा, अतिथि सेवा करते—करते सेवा, श्रम, संयम, पवित्रता, आज्ञापालन आदि बातें स्वत: आ जाती थी। वे शरीर व मन से बलवान, निर्भय एवं चरित्र और आत्मबल संपन्न होकर निकलते थे। उनकी बुद्धि भी प्रखर व निर्मल हो जाती थी। शास्त्रों का ज्ञान भी हो जाता था। ओजस्वी एवं तेजस्वी होकर ही ग्रस्थाश्रम में प्रवेश करते थे। वे संयम व सदाचार का पालन करते थे।

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यही कारण था कि योग, आयुर्वेद, घुड़सवारी, व अस्त्र शस्त्रों के संचालन के अलावा युद्ध कौशल की बारीकियों से आम जनमानस भली भांति परिचित था।

अंग्रेजों को लगा कि ऐसे बात बनने वाली नहीं है। अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था को नष्ट किया। यहां की परंपरा, संस्कृत व संस्कृति के प्रति अनास्था पैदा करने की चेष्टा की गयी। कुछ हद तक वह इसमें सफल भी रहे। लेकिन भारत की जनता को वह अपनी संस्कृति और संस्कारों से पूर्णतया काट नहीं सके। दुर्भाग्य से भारत जब आजाद हुआ तो देश की सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में गई जो विदेशी संस्कृति में पले बढ़े थे। उन्हें भारत की गौरवशाली परंपरा का ज्ञान नहीं था। इसलिए उन्होंने भारत को पश्चिमी राष्ट्रों की तरह विकसित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने भारत के ज्ञान विज्ञान योग आयुर्वेद और संस्कृति परंपरा की उपेक्षा की। इसका दंश आज भी भारत झेल रहा है। लेकिन भारत को आजादी मिलने के बाद योग व आयुर्वेद को सरकार ने भले उपेक्षा की हो लेकिन देश के संत महात्माओं ने योग को विश्वव्यापी बनाया। अंग्रेजी मानसिकता में पले बढ़े लोगों ने ना तो योग को विज्ञान माना और ना ही स्वस्थ रहने का बेहतरीन तरीका। लिहाजा योग पर ना तो कोई संस्थागत कार्य हुआ और ना ही इसकी जन स्वीकार्यता हुई। योग गुरू बाबा रामदेव ने योग को विश्वव्यापी बनाया। बाबा रामदेव ने योग से आमजन को जोड़ने का काम किया। 

गीता में कहा गया है योग: कर्मसु कौशलम। योग का अर्थ होता है जोड़ना। नर का नारायण के साथ एक हो जाने के लिए सनातनधर्म में जो साधन या साधन सामग्री बतलायी है उसी का नाम है योग। नर से नारायण बनने की साक्षात विधि योग है। योग स्वस्थ जीवन जीने की कला है। योग शरीर मन बुद्धि के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है। योग में अपार शक्ति निहित है। योग से शरीर सर्वसमर्थ हो सकता है।

 योग के बल पर दुनिया में सब कुछ हासिल किया जा सकता है। यहां तक कि अनेक सिद्धियां भी योग के द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं।

नियमित योगाभ्यास से सामान्य व्यक्ति भी 100 साल तक स्वस्थ जीवन जी सकता है। लेकिन केवल शारीरिक अभ्यास ही योग नहीं है। योग में आहार,विहार के साथ-साथ यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि भी जरूरी है। इन सब के साथ जो सबसे महत्वपूर्ण है योगासन के साथ ब्रह्मचर्य का पालन। योग के साथ। ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया तो सब बेकार है। आप को कोई सिद्धि नहीं मिलेगी। न शारीरिक न मानसिक न आध्यात्मिक। वर्तमान में शारीरिक अभ्यास को ही योग मान लेते हैं। वीर्य रक्षा परम उपयोगी है। ब्रह्मचर्य से बल, बुद्धि, तेज एवं आयु की वृद्धि, आरोग्य एवं सुख शान्ति मिलती है। वीर्य रक्षा ही जीवन है और वीर्यका नाश ही मृत्यु है। वीर्यहीन पुरुष संसार में कुछ भी नहीं कर सकता। शरीर की सात धातुओं में वीर्य ही सर्वोपरि है। वीर्य ही जीवन का सार है। वीर्य का अपव्यय करने वाला मनुष्य कभी स्वस्थ एवं सुखी नहीं रह सकता। वीर्य की मात्रा कम हो जाने पर शरीर की सारी क्रियाएँ अस्त-व्यस्त हो जाती हैं मस्तिष्क कमजोर हो जाता है, स्मृति शक्ति क्षीण हो जाती है, स्नायु निर्बल हो जाते हैं, रक्तका संचार कम हो जाता है, इन्द्रियों शिथिल हो जाती हैं।

अखाड़ों में पहलवानी करने वाले ब्रह्मचर्य तथा दुग्ध-सेवन पर अधिक जोर देते हैं। आजकल शहरों में जिम जाने का चलन बढ़ रहा है लेकिन वहां पर केवल व्यायाम पर ही फोकस दिया जाता है। ब्रह्मचर्य के पालन की सीख नहीं दी जाती है। ऐसे में अगर ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करेंगे तो शारीरिक श्रम करने का कोई लाभ नहीं है। ब्रह्मचर्य के बिना मन की एकाग्रता भी सम्भव नहीं है। ब्रह्मचर्य के बिना मनुष्य के न तो लौकिक कार्य सुचारु रूप से सिद्ध होते हैं और न वह परमार्थ में ही अग्रसर हो सकता है। तंत्र साधना, भक्ति मार्ग और ज्ञान प्राप्ति में भी ब्रह्मचर्य को आवश्यक माना गया है। आजकल युवा असमय नपुंशकता के शिकार हो रहे हैं। संतान उत्पन्न करने की क्षमता नष्ट हो रही है। यदि संतान होती भी है तो वह दुर्बल, क्षीणकार्य, रोगग्रस्त व अल्पायु होती है। युवा ही हमारे राष्ट्र के आधारस्तम्भ हैं। इसलिए समस्त समस्याओं का समाधान योग में है। 

योग भारत के ऋषि महर्षि की और से दुनिया को अनुपम देन है। योग व आयुर्वेद के माध्यम से हम दुनिया को मार्ग दिखा सकते हैं। आज पूरी दुनिया योग के प्रति तेजी से आकर्षित हो रही है। इसका श्रेय योग गुरु बाबा रामदेव को जाता है। उन्होंने योग व आयुर्वेद का परिचय पूरे विश्व में लहराया। आज हम गर्व के साथ दुनिया के सामने सर उठाकर कह सकते हैं कि योग भारत से दुनिया भर में गया।

वैसे योग की उत्पत्ति भारत में हजारों वर्ष पूर्व हुई थी। भगवान शिव को आदियोगी कहा जाता है। भगवान शिव ने योग को सप्त ऋषि को प्रदान किया। सप्त ऋषियों द्वारा योग आगे बढ़ा। भगवद गीता के अनुसार, भगवान कृष्ण ने योग का ज्ञान सबसे पहले सूर्य को दिया था, और सूर्य ने यह ज्ञान मनु को दिया, और मनु ने इक्ष्वाकु को । इस प्रकार, योग का ज्ञान सूर्य से होते हुए मनु और फिर इक्ष्वाकु तक पहुंचा। इसके बाद महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र की रचना की। हमारे वेद उपनिषद स्मृतियों वह पुराणों में योग से संबंधित अपार ज्ञान भरा है। अनेक ऋषि महर्षि वह संत महात्माओं ने योग का प्रचार प्रसार दुनिया में किया लेकिन बाबा रामदेव ने थोड़े ही समय में योग को जितनी लोकप्रियता दी है उतनी पहले कभी शायद ही मिली हो। बाबा रामदेव ने योग को सरल रूप में लोगों के समक्ष रखा। बाबा रामदेव द्वारा स्थापित पतंजलि योगपीठ स्वदेशी के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही है। बाबा रामदेव ने देशवासियों के मन में स्वदेशी के प्रति सम्मान का भाव जगाने और उसके लिए आग्रह पैदा करने का ही काम नहीं किया बल्कि पतंजलि ने बड़े पैमाने पर स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन कर विदेशी कंपनियों को मात दी। उन्होंने विदेशी कंपनियों के मुकाबले स्वदेशी का विकल्प प्रस्तुत किया। स्वदेशी का केवल रट लगाने से काम नहीं चलेगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सद्प्रयासों से 21 जून 2014 को "अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस" घोषित किया गया लेकिन इसका सर्वाधिक श्रेय बाबा रामदेव को जाता है। 

योग के महत्व से आज पूरी दुनिया परिचित हो गई है। मानव को शारीरिक व मानसिक रूप से मजबूत करने का काम योग करता है। अगर व्यक्ति नियमित योग करता है तो रक्तचाप, तनाव व मधुमेह जैसी जीवन शैली पर आधारित बीमारियों से बच सकता है। नियमित योगाभ्यास से शरीर में श्वेत रक्त कणिकाओं की वृद्धि होती है। इसके कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। इस भागदौड़ की जिंदगी में जरूरी है कि हम योग से जुड़ें और इसे अपने और अपने परिजनों की दिनचर्या में शामिल कराएं। तभी सुखी और समृद्ध परिवार की कल्पना की जा सकती है। आजकल फेसयोग काफी चलन में है। योग शरीर और मन की विकृतियों को दूर कर व्यक्ति को ऊर्जावान बनाता है। उसकी प्राण ऊर्जा को प्रबल करता है जिससे या तो बीमारियां पनपती नहीं है और अगर होती भी है तो शरीर में टिक नहीं पाती। योग द्वारा आरोग्य और दीर्घायु दोनों को प्राप्त किया जा सकता है।

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